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Thursday, October 5, 2017

सफेदपोशों की पूंछ कातिलों ने पकड़ी है-दीपकबापूवाणी (Safedposhon ki poonch katiolon ne pakdi ha9i-DeepakBapuWani)

मन के गुलाम पर स्वामित्व का बोध करें, लाचारी में फंसे पराये दर्द पर शोध करें।
‘दीपकबापू’ दरियादिली का रचाते स्वांग, अक्ल के दावेदार चुनौती पर क्रोध करें।।
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बाज़ार के सामान में दिल कहीं खो गये, संपन्न अर्थी पर प्रेम के भाव सो गये।
‘दीपकबापू’ ढूंढे नहीं मिले जज़्बाती रिश्ते, लालची ख्याल चिंता के बीज बो गये।।
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सफेदपोशों की पूंछ कातिलों ने पकड़ी है, चेहरे सजे सामने नीयत पाप ने पकड़ी है।
‘दीपकबापू’ नहीं जानते शब्दों का सौंदर्य, जुबान खड़ी ऐसी जैसे बांस की लकड़ी है।।

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घडी की सुई के साथ हाल बदलते,
दरबारी नर्तक आम मंच पर ताल बदलते।
‘दीपकबापू’ चौराहे पर खड़े देखें
राहों के साथ लोग कदम चाल बदलते।
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प्रचार के पर्द पर दिखने की
बीमारी ज़माने में छा गयी है।
पैसे से प्रसिद्धि का खेल जारी है
शब्दों में चीखें छा गयी हैं।
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नाटकीय खेल में न जीत न हार
फिर भी नतीजा पहले से तय है।
‘दीपकबापू’ ईमानदार भूमिकाओं में
अभिनेताओं की गजब बेईमान लय है।
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Friday, February 24, 2017

सेवक बनकर सामान ले जाते हैं-दीपकबापूवाणी (Sewak banakar saman le jaate hain-DeepakbapuWani)

राजपद का मोह अंधा बना देता है, लाचार अब गद्दारी धंधा बना लेता है।
‘दीपकबापू’ ईमानदारी कांच में सजा ली, बेईमान लूट को चंदा बना लेता है।।
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भलाई का झंडा वह हाथ में लिये हैं, जिन्होंने कभी कोई काम नहीं किये हैं।
‘दीपकबापू’ स्वयंभू उदारमना बन गये, पूरी जिंदगी जो स्वार्थी बनकर जिये हैं।।

मन बहलाकर जेब खाली कर जाते, संगीत के साथ कटु स्वर चलाते।
‘दीपकबापू’ प्रणय कहानी के नायक, असुर का भी अभिनय कर जाते।।
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सेवक बनकर सामान ले जाते हैं, हिसाब पूछो स्वामीपन दिखाते हैं।
‘दीपकबापू’ मुखौटे के पीछे छिपते, हर बार नयी पहचान लिखाते हैं।।
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कभी प्रेम कभी मित्र दिवस मनायें, चलो कुछ बाज़ार भी सजायें।
‘दीपकबापू’ दिल को बना दिया नादान, कैसे दुनियांदारी समझायें।।
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समय स्वतः घाव भर देता है, समंदर लहरों से स्वतः पार नाव कर देता है।
‘दीपकबापू’ स्वांग रचने के आदी, इंसानों में भ्रम घमंड का भाव भर देता है।।
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बंदर की तरह उछलकूद किये जाते, पहले बारदाना फाड़ते फिर सिये जाते।
‘दीपकबापू’ भय का किया विनिवेश, अब अपनी ही पूजा का रस पिये जाते।।
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प्रेम शब्द बाचें सभी करे कोई नहीं,
हृदय के स्पंदन में बना ली
ताजा मांस की चाहत ने जगह कहीं।।
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Sunday, September 25, 2016

समंदर जैसी चौड़ी सड़क पर कारों का झुंड खड़ा है-दीपकबापूवाणी (Samandar jaise chodi Sadak pa karon ka jhund khada hai-DeepakBapuwani)

जाने पहचाने कहें या दोस्त कुछ पल तो दिल बहला देते हैं।
लिख बोल कर क्या कहें, कैसे हमारे धाव वह सहला देते हैं।
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दिल से चाहते तो हर बंदे के नखरे भी उठा लेते हम।
मुश्किल यह रही वह जुबां से हक मांग कर देते हैं गम।
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जमा कर ली धन संपति, प्रेम का खाता कभी कहीं खोला नहीं।
चाटुकारों की फौज बनाई, जंग में हथियार कोई खोला नहीं।
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समंदर जैसी चौड़ी सड़क पर कारों का झुंड खड़ा है।
गोया विकास के रथ में विनाश का पहिया जड़ा है।
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सड़क स्मार्टफोन और इश्क-हिन्दी हास्य कविता

प्रेमिका ने कहा प्रेमी से
संभलकर कर मोटरसाइकिल चलाना
अपने शहर में
सड़क में कहीं गड्ढे
कहीं गड़्ढों में सड़क है।

प्रेमी ने कहा
‘प्रियतमे! तुम भी बैठे बैठे
स्मार्टफोन पर अपने
चेहरे पर मेकअप करते हुए
सेल्फी मत लेना
हिलने में खतरे बहुत
गिरे तो टीवी पर सनसनी
समाचार बन जायेंगे
अस्पताल पहुंचे तो ठीक
श्मशान में शोकाकुल
मुझे बहुत शर्मांयेंगे
कहेंगे इश्क ने
किया इसका बेड़ा गर्क है।
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Tuesday, August 16, 2016

मौसम और मन के मिजाज-हिन्दी कविता (mausa aur man ki Mijaj-HindiPoem)


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साथ चलते इंसान
परिंदों की तरह उड़ गये।
उनकी यादों ने
कुछ देर परेशान किया
फिर नये राही जुड़़ गये।
कहें दीपकबापू हम भी
खड़े देखते रहे
मौसम और मन के मिजाज
धूप से लड़ने की ठानी
कभी छांव की तरफ भी मुड़ गये।
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जीवन पथ परसहयात्री की खोजआंखे करती हैं।बहुत नरमुंड मिलतेउनकी इच्छायें ही साथीहमेशा आहें भरती हैं।कहें दीपकबापू याद मेंकिसे बसाकर अपना दिल बहलातेहृदय की भावनायेंनयी चाहत पर मरती है।--------------

भिखारी और राजा-हिन्दी कविता (King and begger-Hindi Poem)


वह भिखारी मंदिर के बाहर
चप्पल के सिंहासन पर बैठा
पुण्य क्रेता ग्राहक की
प्रतीक्षा में बैठा
आनंदमय दिखता है।

वह बादशाह महल में
सोने के सिंहासन पर
प्रजा की चिंता में लीन
असुरक्षा के भय से दीन
चिंतामय दिखता है।

कहें दीपकबापू मन से
बनता संसार पर नजरिया
आंखों से केवल दृश्य दिखता है।
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धरती पर स्वर्ग-हिन्दी कविता
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मतलब की बात
जल्दी सुनते
वरना बहरे हो जाते हैं।

डराते जो ज़माने को
खौफ में जीते वह भी
उनके घर खड़े पहरे हो जाते हैं।

कहें दीपकबापू सरलता से
जीवन बिताने की आदत
बना देती धरती पर स्वर्ग
चालाक अंदाज से
दुश्मन गहरे हो जाते हैं।
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Sunday, February 24, 2013

किराये पर मिली खुशी जोश नहीं देती-हिन्दी कविता (kiraye par milee khushi josh nahin dete-hindi poem)

कमजोर  नीयत
जुबां से मजबूत लफ्ज
बाहर आने नहीे देती,
खराब ख्याल में डूबें हों
कोई तस्वीर आंखों में गहराई नहीं लेती
कहें दीपक बापू
दुनियां तो अपने ही  दिल का खेल है
जब तक खेलें हम खुद
सब ठीक है
खिलाने लगे कोई दूसरा
तब अपनी ही इंसानी सोच
मुर्दा जैसी शक्ल लेती।
कीमत पर मिली खुशी
जिंदगी को कोई जोश नहीं देती।
लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, Madhya pradesh
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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Friday, November 5, 2010

टूटी नीयत, खूबसूरत चेहरा-हिन्दी व्यंग्य कविता (kharab neeyat,khubsurat chehra-hindi satire poem)

आपस में विरोधी कवि उलझे रहे बरसो 
तब एक को समझौते का ख्याल आया,
उसने दूसरे को समझाया,
''यार, अब बदल गया है ज़माना,
मुश्किल हो गया है कमाना,
क्यों न आपस में समझौता कर लें,
भले ही मन में हो खोट रखें
बाहर से एकरूप और विचारधारा धर लें.."

सुनकर दूसरा बोला 
"सच कहते हो यार,
बरबाद हो गयी है हर धारा
बिगड़ गया है हर विचार,
अपने आका दल क्या 
दिल ही बदल देते हैं,
अवसर जहां देखते हैं मिलने का सम्मान 
वहीँ अपनी  किस्मत खुद लिख देते हैं,
कविताई के नाम  पर 
एकता, भाईचारा, और अमन के पैगाम लिखते हैं,
बिकने पर माल के लिए 
दारू पीकर लड़ते दिखते हैं,
अपने हिस्सा नहीं आ रहा नामा और नाम,
इस तरह तो छूट जाएगा कविताई का काम,
अपने मसीहाओं की तरह टूटी  नीयत रखें 
बाहर से एकता, अमन और भाईचारे का
खूबसूरत चेहरा धर लें.."
__________________
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Friday, August 27, 2010

हादसों पर मेले-हिन्दी शायरी (hadson par mele-hindi shayari

कुछ लोग हादसों में मरे इंसानों की याद में
हर बरस मोमबत्तियां जलायेंगे,
तो कुछ जन्नत के फरिश्ते
जख्मों में मरहम लगाने के लिये
सर्वशक्तिमान का नया दरबार बनायेंगे।
इंसान मौत से हारे हैं,
ईमान से अधिक उनको अपने मतलब प्यारे हैं,
कभी नहीं समझा धर्म,
अपनी कमजोरी पर आती है शर्म,
फिर भी अपनी अक्लमंदी से बन गये
जो सर्वशक्तिमान के ठेकेदार
मुर्दों में अमरत्व दिखाने के लिये
पत्थर की कुछ नई इमारते सजायेंगे।
---------------------------

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Saturday, August 21, 2010

, ईमान से अधिक उनको अपने मतलब प्यारे- हिन्दी व्यंग्य कविता

कुछ लोग हादसों में मरे इंसानों की याद में
हर बरस मोमबत्तियां जलायेंगे,
तो कुछ जन्नत के फरिश्ते
जख्मों में मरहम लगाने के लिये
सर्वशक्तिमान का नया दरबार बनायेंगे।
इंसान मौत से हारे हैं,
ईमान से अधिक उनको अपने मतलब प्यारे हैं,
कभी नहीं समझा धर्म,
अपनी कमजोरी पर आती है शर्म,
फिर भी अपनी अक्लमंदी से बन गये
जो सर्वशक्तिमान के ठेकेदार
मुर्दों में अमरत्व दिखाने के लिये
पत्थर की कुछ नई इमारते सजायेंगे।
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रौशनी चुराकर अंधेरों को सुलाने लगे-हिन्दी व्यंग्य कविता (vikas ka mukhauta-hindi satire poem)

दूसरों के घर की रौशनी चुराकर
अंधेरों को वहां सुलाने लगे,
नौनिहालों के दूध में जहर मिलाकर
अपनी दौलत से अपना कद
ज़माने को दिखाने के लिये
ऊंचा उठाने लगे।
इंसानों जैसे दिखते हैं वह शैतान
पेट से बड़ी है उनकी तिजोरी
जंगलों की हरियाली चुराकर
भरी है नोटों से उन्होंने अपनी बोरी,
अब गरीबी और बेबसी को
विकास का मुखौटा पहनाकर बुलाने लगे।
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Saturday, March 27, 2010

खबरें और यकीन-हिन्दी व्यंग्य कविता (news and faith-hindi satire poem)

खबरों से यकीन यूं उठ गया है
क्योंकि वह शब्द बदल सामने आती रहीं।
कहीं चेहरे बदले
तो कहीं चालें
पर चरित्र पुराना ही दिखाती रहीं।
नतीजे पर नहीं पहुंचा कोई मुद्दा
पर खबरें बरसों तक चलती रहीं,
कहीं बाप की जगह बेटे का नाम लिखा जाने लगा
कहीं बेटियों के नाम भरती रहीं,
कभी कभी प्रायोजक बदलकर भी
खबरे सामने आती रहीं।
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मुद्दा सामने पड़ा था,
पर खबरची उसे छोड़ने पर अड़ा था।
क्योंकि कोई प्रायोजक पास नहीं खड़ा था।
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Sunday, February 28, 2010

ब्लाग जगत पर होली व्यंग्य-हिन्दी लेख (hindi satire wrote on holi-hindi article)

नई दुनियां से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता ने होली के अवसर पर हिन्दी ब्लाग जगत पर व्यंग्य बाण छोड़कर सक्रिय ब्लाग लेखकों को लगभग स्तब्ध कर दिया है। उनके उस व्यंग्य आलेख की जानकारी इंटरनेट के ब्लाग लेखकों ने ही जारी की। जिन लोगों ने यह आलेख प्रस्तुत किये उनकी भाषा भी सहमी हुई लग रही थी। रखने वालों को यह भय था कि पता नहीं ब्लाग लेखकों पर इसकी क्या प्रतिक्रिया होगी और कहीं यहां उसे प्रकाशित करने के कारण ही कहीं कोपभाजन तो नहीं होना पड़ेगा। हमारे मित्र ब्लाग लेखकों इसे प्रस्तुत करते हुए अपनी भाषा इस तरह लिखी जैसे कि उनका तो इससे कोई लेना देना नहीं है बल्कि गुस्सा हैं।
हैरानी इस बात की है कि कुछ ब्लाग लेखक इस पर उत्तेजित हो गये और उन्हें लगा कि उन पर गंभीरता से प्रहार किया गया है-उन्होंने इस जवाबी तर्क भी प्रस्तुत कर दिये जैसे कि कोई गंभीर आलेख हो। दरअसल ब्लाग लेखक स्वयं ही आपस में होली स्वांग में रचाने में इतने व्यस्त हैं कि उनको यह अनुमान नहीं रहा कि कोई बाहर बैठा व्यक्ति भी इस होली पर उनके साथ बाहरी पिचकारी से ही रंग फैंकेगा।
श्री आलोक मेहता का यह आलेख सुबह एक ब्लाग पर देखा था और इंतजार था कि देखें इस प्रतिक्रियायें क्या आती हैं? कुछ ब्लाग लेखकों ने इस व्यंग्य का मंतव्य समझ लिया और अपनी टिप्पणियों में इस बात का उल्लेख किया कि यह एक व्यंग्य है।
प्रारंभ में जब हमने इस लेख को देखा तो ब्लाग लेखकों की तरह हम भी हैरान रह गये। जब व्यंग्य पूरा पढ़ा तब समझ में आया कि वास्तव में दूसरों पर कटाक्ष और प्रहार करने वाला हिन्दी ब्लाग जगत आज खुद भी निशाना बन गया। ब्लाग लेखकों को कुंठित, मठाधीश, भडासी और जाने कौन कौन सी व्यंग्य संज्ञााओं से नवाजा गया है।
उसमें यहां तक लिखा गया है कि ‘इन ब्लाग लेखकोें का लिखा एक शब्द भी अमेरिका और चीन का राष्ट्रपति तक नहीं मिटवा सकता। खासतौर से हिन्दी ब्लाग जगत के लेखकों का।’
इस व्यंग्यात्मक प्रहार को एक प्रशंसा भी समझा जा सकता है और गंभीर आलोचना भी।
उसमें ढेर सारी बातें हैं, उन प्रतिवाद रूप से गंभीरता से लिखा जा सकता था अगर वह एक निबंध होता तो? व्यंग्य के लिखे का प्रतिवाद तो यह कहकर ही हो सकता है कि इसमें अति प्रदर्शन किया गया है-वह भी तब जब किसी पर व्यक्तिगत रूप से आक्षेप हो जो कि इसमें नहीं है।
वैसे देखा जाये तो हिन्दी ब्लाग जगत पर किया गया यह व्यंग्यात्मक प्रहार पढ़ने वाले पाठकों की दिलचस्पी निश्चित रूप से हिन्दी ब्लाग लेखन में बढ़ेगी। ब्लाग लेखकों को एक बात समझना चाहिये कि हम जो इस समय प्रचार तंत्र देख रहे हैं वह नायक-खलनायक और समर्थक-विरोधी दोनों को साथ लेकर चल रहा है। दूसरा यह कि अनेक लोग तो प्रचार पाने के लिये अपने पर लिखवाते हैं। श्री आलोक मेहता ने व्यंग्य लिखकर खलनायक या विरोधी की भूमिका अदा नहीं की बल्कि यह बताया है कि हिन्दी ब्लाग जगत अब आकार ले रहा है और उस पर व्यंग्य लिखा जा सकता है। अस्तित्वहीन या लधु आकार के विषय व्यंग्य के लिये उपयुक्त नहीं होते। वैसे जिन ब्लाग लेखकों को लगता है कि यह मजाक गंभीर है तो भी उन्हें इस बात पर प्रसन्न होना चाहिये कि बैठे ठाले उनका विरोध कर उन्हें प्रसिद्धि दिलाने का काम एक प्रतिष्ठत लेखक ने मुफ्त में किया है नहीं तो अनेक बड़े लोगों को अपना विरोध कराने के लिये पैसे खर्च करने पड़ते हैं। श्रीआलोक मेहता ने किसी ब्लाग लेखक का नाम नहीं लिया और जिनका लिया वह काल्पनिक हैं-ताज्जुब है कि कुछ ब्लाग लेखक उनको सर्च इंजिनों में ढूंढने गये। वह जानते हैं कि अधिकतर ब्लाग लेखक मध्यमवर्गीय हैं और सार्वजनिक रूप से किसी का नाम लिखकर उनके लिये परेशानी पैदा न की जाये।
श्री आलोक मेहता को हम जानते हैं पर वह हमसे अपरिचित हैं। अलबत्ता उनको एक आम पाठक के रूप में पढ़ने के अलावा एक आम दर्शक के रूप में छोटे पर्दे पर भी देखते हैं। व्यंग्य तो केवल व्यंग्य है। अगर उसमें गंभीरता होती तो कोई तर्क देते। अच्छा व्यंग्य पढ़ने को मिला। जिन ब्लाग लेखकों ने इसे रखा उनकी प्रशंसा की जानी चाहिये। अप्रत्यक्ष रूप से इस व्यंग्य में ब्लाग लेखन की शक्ति का भी बखान किया गया है जिसे पढ़कर पाठकों की दिलचस्पी बढ़ेगी। वह इस बात को समझेंगे कि हिन्दी ब्लाग जगत ताकतवर हैं भले ही उसमें मसखरे भरे पड़े हों। अलबत्ता धीरे धीरे सभी जान जायेंगे कि यहां हर तरह के ब्लाग लेखक हैं। संभव है यहां लिखना शुरु करने वाले कुंठित लोग हों पर लिखते लिखते उनकी कुंठायें उनसे दूर चली जाती हैं और ब्लागिंग का नशा बाकी सारे नशों से भारी सिद्ध होता है। श्री आलोक मेहता को हम पढ़ते हैं पर वह हमें नहीं पढ़ते। वरना अपने ब्लाग पर उनके लिये होली के अवसर पर नाम लेकर बधाई संदेश देते। अलबत्ता ब्लाग लेखकों और पाठकों को इस होली पर हार्दिक बधाई। इस व्यंग्य पर जितना दुःख था उसे बाहर निकाल फैंके और स्वयं भी ऐसे ही व्यंग्य लिखें जिससे किसी को दुःख न पहुंचे और जिस पर लिखा जाये वह स्वयं भी प्रसन्न हो। हमें यह व्यंग्य अच्छा लगा।
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Sunday, February 21, 2010

प्यार और तोहफा-हिंदी व्यंग्य शायरी (ishq aur tohfa-hinci satire poem)

अब प्यार जताने का सिलसिला
तोहफों से चलने लगा है,
इसलिये आदमी तोहफे देकर
हर इंसान प्यार खरीदने लगा है।

तोहफों की कीमत जितनी बढ़ेगी,
प्यार की ऊंचाई भी उतनी लगेगी,
नजरों का दोष है कि दिल का
प्यार जाहिर करने की ख्वाहिशों के आगे
हर तोहफा सस्ता लगने लगा है,
मगर मजबूरी है
बिना तोहफे के प्यार खाली लगने लगा है।

मुश्किल यह है कि
प्यार दिखाने के लिये तोहफा खरीदने वास्ते
कब तक पतंग की तरह
इधर उधर उड़ते रहें,
कीमत चुकाने के लिये
कमाने के दर्द कब तक सहें,
सरलता से किया जाने वाला प्यार
तोहफों के जाल में फंसने लगा है।


कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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खूबसूरती की दौड़ में-हिन्दी हास्य कवितायें (hindi comic poem)

क्रीम पाउडर से सजे चेहरे
सौंदर्य का पर्याय बन गये हैं,
भयानक चेहरे भी
खूबसूरती की दौड़ में भागने के लिये बनठन गये हैं।
-----------
न राई थी, न पहाड़ था,
न तिल था, न ताड़ था,
फिर भी वह ख्वाब बेचकर
सौदागरों ने पैसा कमाया।
इसतर बड़े ठग ने
छोटे पर रुआब जमाया।
कौन करेगा फरियाद,
सभी दे रहे एक दूसरे को दाद,
न अच्छे रास्ते पैसा मिला
न अच्छी जगह गंवाया।
-----------
अब यह प्रश्न न पूछना कि
हर शाख पर उल्लू बैठा है
अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा।
उजड़े चमन में
बिगड़े लोगों के वतन में
बरबादी का मंजर चारों तरफ है
अब तो प्रश्न यह है उल्लूओं का क्या होगा?

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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वहम-हिन्दी क्षणिकाऐं (vaham-hinci comic poem)

विदुषकों के विद्वान और
नर्तकों के देवता होने का वहम
पूरे ज़माने को हो गया है,
झूठ के सहारे खड़ा है दौलत का महल,
इज्जत पाने के लिये, होने लगी सौदे की पहल,
ईमान सभी का सो गया है।
-----------
सर्वशक्तिमान ने दाने दाने पर लिखा है
खाने वाले का नाम
न मिलने पर उसका क्या दोष
अगर बंद हो गोदाम।

----------
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अपने बताये रस्ते पर चलें,ऐसे लोग कम हैं-हिंदी व्यंग्य कविता (few men in world-hindi comic poem)

सभी को बताये रास्ते पर खुद चलें, ऐसे लोग कम हैं।
दूसरे को सिखायें दांवपैंच, जो अजमाने में खुद बेदम हैं।।
हवा के झौंके से कांपने लगता है पूरा उनका बदन,
जमाने को डरपोक बतायें, अपनी बहादुरी के उनको वहम हैं।।
दूसरों की रौशनी में चले हैं पूरी जिंदगी का रास्ता,
दीपक और मशाल जलायें रोज, ऐसे लोग कम हैं।।
सह नहीं पाते दूसरे की खुशी, दुखी हो जाते हैं,
अपने मतलब की राह चले हैं वह, जहां ढेरों गम हैं।
तलवारें और ढाल थामें हैं चारों ओर लोग
कलम से शब्द लिखकर अमन लायें, ऐसे लोग कम हैं।
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Sunday, February 7, 2010

ज्ञानी और ईमानदारी-हिन्दी व्यंग्य कवितायें



दिन भर वह दोनों ज्ञानी

अपने शब्दों की प्रेरणा से

लोगों को लड़ाने के लिये

झुंडों में बांट रहे थे,

रात को ईमानदारी से

लूट में मिले सामान में

अपना अपना हिस्सा

ईमानदारी से छांट रहे थे।

-------

शब्द रट लेते हैं किताबों से,

सुनाते हैं उनको हादसों के हिसाबों से,

पर अक्लमंद कभी खुद जंग नहीं लड़ते।

नतीजों पर पहुंचना

उनका मकसद नहीं

पर महफिलों में शोरशराबा करते हुए

अमन की राह में उनके कदम

बहुत  मजबूती से बढ़ते।


कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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चिल्लाने की बारी -हिन्दी व्यंग्य कविता (hindi comic satire poem)

भ्रष्टाचार,

अत्याचार

और व्याभिचार को भी

जाति, भाषा और धर्म के नाम पर

बांटने की कोशिश जारी है,

अक्लमंद दिखाते हैं बहादुरी

अपने अपने हिस्से की शिकायतें उठाने में

शब्द खर्च करते

दूसरे की कमियां गिनाने में

हर हादसे पर देखते हैं बस यही कि

किसके चिल्लाने की बारी है।

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कला, मनोरंजन, शायरी, शेर, समाज, हिन्दी साहित्य

Sunday, January 3, 2010

आशिक माशुका ब्लागर और नववर्ष-हिन्दी हास्य कविता (love couple blogger and new year-hindi hasya kavita)



आशिका और माशुका ने मिलकर

अपने एकल और युगल ब्लाग पर

खूब पाठ लिखे,

कभी सप्ताह भर तो

कभी माह बाद दिखे

साल भर कर ली जैसे तैसे लिखाई।
दोनों अपने एकल ब्लाग पर दिखते थे,

साल के नंबर वन के ब्लागर का

खिताब पाने की दोनों को ललक थी

पर कहीं सामुदायिक ब्लागर पर भी

दाव चल जाये इसलिये

युगल ब्लाग भी लिखते थे,

कभी प्यार तो, कभी व्यापार पर तो,

कभी नारीवाद पर भी की खूब लिखाई।
जैसे तैसे वर्ष निकला

नव वर्ष के पहले दिन ही

सुबह आशिक ब्लागर ने

माशुका के फोन की घंटी बजाई।

नींद से उठी माशुका ने भी ली अंगड़ाई।

उधर से आशिक बोला

‘नव वर्ष की हो बधाई’,

माशुका ने बिना लाग लपेटे के कहा

‘छोड़ो सब यह बेकार की बात

यह तो ब्लाग पर ही लिखना,

अब तो नंबर वन के लिये कोशिश करते दिखना,

बहुत जगह बंटेंगे पुरस्कार

इसलिये तुम मेरा ही नाम आगे करना,

मैंने दूसरे लोगों से भी कहा है

वह भी मेरे लिये वोट जुटायेंगे

लग जाये शायद मेरे हाथ कोई इनाम

जब लोग लुटायेंगे,

वैसे तुम अपने नाम की कोशिश मत करना

क्योंकि हास्य कविताओं के कारण

तुम्हारी छवि अच्छी नहीं है

तुम्हारा मन न खराब हो

इसलिये तुम्हें यह बात नहीं बताई।’
आशिक बोला-

‘अरे, यह क्या चक्कर है

मैंने तुम्हें पास से कभी नहीं देखा

फोटो देखकर ही पहचान बनाई,

अब तुम कैसी कर रही हो चतुराई।

क्या इसी नंबर वन के लिये

तुमने यह इश्क की महिमा रचाई।

मैं लिखता रहा पाठ पर पाठ

तुमने वाह वाह की टिप्पणी सजाई।

अब आया है इनाम का मौका तो

मुझे अपनी औकात बताई।

वैसे तुमने भी क्या लिखा है

सब कूड़े जैसा दिखा है

शुक्र समझो मेरी टिप्पणियों में बसे साहित्य ने

तुम्हारे पाठ की शोभा बढ़ाई।

अब मुझे अपना हरकारा बनने के लिये

कह रहे हो

तुम ही क्यों नहीं मेरा नाम बढ़ाती

करने लगी हो मुझसे नंबर वन की लड़ाई।’
सुनकर माशुका भड़की

‘बंद करो बकवास!

तुमसे अधिक टिप्पणियां तो

मेरे ब्लाग पर आती हैं

तुम्हारी साहित्यक टिप्पणियों पर

मेरी सहेलियों ने मजाक हमेशा उड़ाई।

वैसे तुम गलतफहमी में हो

तुम जैसे कई पागल फिरते हैं अंतर्जाल पर

मैंने सभी पर नज़र लगाई।

एक नहीं सैंकड़ों मेरे नंबर वन के लिये लड़ेंगे

सभी तमाम तरह से कसीदे पढेंगे,

तुम अपना फोन बंद कर दो

भूल जाओ मुझे

तुम्हारे बाद वाले का  भी फोन आयेगा

वही मेरी नैया पार लगायेगा

तुम चाहो तो बन जाओ भाई।’
माशुका ब्लागर ने फोन पटका उधर

 इधर आशिक ब्लागर  आसमान की तरफ

आंखें कर लगभग रोता हुआ बोला

‘हे सर्वशक्तिमान यह क्या किया

इश्क  रचा तो  ठीक

पर नववर्ष की परंपरा क्या बनाई,

जिससे  इश्क में मैंने पाई विदाई।।


 

नोट-यह एक काल्पनिक हास्य कविता मनोरंजन की दृष्टि से लिखी गयी है। इसक किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है। किसी की कारिस्तानी से मेल हो जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा।
 
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Saturday, December 26, 2009

बड़े लोगों की बड़ी बातें-हिन्दी व्यंग्य कविताएं (matter of top class men-hindi satire poem)

बड़े लोगों की होती है बड़ी बातें।

छोटा तो दिन में भी

छोटी शर्म का काम करते भी घबड़ाये

बड़ा आदमी गरियाता है

गुजारकर बेशर्म रातें।।

----------

छोटे आदमी की रुचि

फांसी पर झूले

या लजा तालाब में डूबे

बड़ा आदमी अपनी रातें गरम कर

कुचलता है कलियां

फिर झूठी हमदर्दी जताये।

बड़े आदमी की विलासता भी

लगाती उसके पद पर ऊंचे पाये।

---------

हर जगह बड़े आदमी की शिकायत

बरसों तक कागजों के ढेर के नीचे

दबी पड़ी है।

छोटे की  हाय भी

उसके बीच में इंसाफ की उम्मीद लिये

जिंदा होकर सांसें अड़ी है।

बड़े लोग हो गये बेवफा

पर समय की ताकत के आगे

हारता है हर कोई

हाय छोटी है तो क्या

इंसाफ की उसकी उम्मीद बड़ी है।



 


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