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Thursday, October 5, 2017

सफेदपोशों की पूंछ कातिलों ने पकड़ी है-दीपकबापूवाणी (Safedposhon ki poonch katiolon ne pakdi ha9i-DeepakBapuWani)

मन के गुलाम पर स्वामित्व का बोध करें, लाचारी में फंसे पराये दर्द पर शोध करें।
‘दीपकबापू’ दरियादिली का रचाते स्वांग, अक्ल के दावेदार चुनौती पर क्रोध करें।।
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बाज़ार के सामान में दिल कहीं खो गये, संपन्न अर्थी पर प्रेम के भाव सो गये।
‘दीपकबापू’ ढूंढे नहीं मिले जज़्बाती रिश्ते, लालची ख्याल चिंता के बीज बो गये।।
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सफेदपोशों की पूंछ कातिलों ने पकड़ी है, चेहरे सजे सामने नीयत पाप ने पकड़ी है।
‘दीपकबापू’ नहीं जानते शब्दों का सौंदर्य, जुबान खड़ी ऐसी जैसे बांस की लकड़ी है।।

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घडी की सुई के साथ हाल बदलते,
दरबारी नर्तक आम मंच पर ताल बदलते।
‘दीपकबापू’ चौराहे पर खड़े देखें
राहों के साथ लोग कदम चाल बदलते।
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प्रचार के पर्द पर दिखने की
बीमारी ज़माने में छा गयी है।
पैसे से प्रसिद्धि का खेल जारी है
शब्दों में चीखें छा गयी हैं।
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नाटकीय खेल में न जीत न हार
फिर भी नतीजा पहले से तय है।
‘दीपकबापू’ ईमानदार भूमिकाओं में
अभिनेताओं की गजब बेईमान लय है।
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Sunday, February 24, 2013

किराये पर मिली खुशी जोश नहीं देती-हिन्दी कविता (kiraye par milee khushi josh nahin dete-hindi poem)

कमजोर  नीयत
जुबां से मजबूत लफ्ज
बाहर आने नहीे देती,
खराब ख्याल में डूबें हों
कोई तस्वीर आंखों में गहराई नहीं लेती
कहें दीपक बापू
दुनियां तो अपने ही  दिल का खेल है
जब तक खेलें हम खुद
सब ठीक है
खिलाने लगे कोई दूसरा
तब अपनी ही इंसानी सोच
मुर्दा जैसी शक्ल लेती।
कीमत पर मिली खुशी
जिंदगी को कोई जोश नहीं देती।
लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, Madhya pradesh
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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Sunday, August 14, 2011

हुकुमत और दौलत-हिन्दी शायरी (hukumat aur daulat-hindi shayari)

वह लोग क्या जंग लड़ेंगे
इंसानों की आजादी की
जो अपनी आदतों के गुलाम हैं,
कौम का परचम
आकाश में क्या वह फहरायेंगे
उधार की सोच को करते जो सलाम हैं।
दर्द को रोते हुए बेचते
इश्क से हंसते हुए कमाते
वतन की हिफाजत सौदागर क्या करेंगे
बाज़ार में जज़्बातों का करते सौदा जो सरेआम हैं।
करते हैं वही तय
कब जंग हो ज़माने में,
अमन से कितनी मदद होगी कमाने में,
मोहब्बत पर नहीं होते फिदा
दुनियां की हर हुकुमत उनकी
दौलत की गुलाम है।
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Saturday, August 6, 2011

दिल के हाल-हिन्दी शायरी (dil ke halat-hindi shayari)

कभी रोकर
कभी चीखकर
हमने क्या पाया,
जिंदगी के सफर में
हर मोड़ पर मुस्कराये तो
तकलीफों में अपने को
हंसता पाया।
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हालतों का क्या
कभी अच्छी कभी बुरी होती हैं,
रोज ज़माना देखता है
हमारे चेहरे की तस्वीर
जो कभी हंसती कभी रोती है।
क्यों करे जंग हंसाई
अपने दिल के हाल बाहर दिखाकर
जिनकी उम्र कभी बड़ी नहीं होती है।
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Tuesday, June 14, 2011

बात हमेशा होती है लाजवाब-हिन्दी साहित्यक कविताएँ (baat hamesha hotee hai lajawab-hindi literature poem)

चेतन है
पर जड़ जैसे दिखते हैं,
कलम उनके हाथ में
पर दूसरे के शब्द लिखते हैं।
चमकदार नाम वही चारों तरफ
पर उनके चेहरे बाज़ार में
दाम लेकर बिकते हैं।
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एक सवाल उठाता है
दूसरा देता है जवाब।
बहसें बिक रही है
विज्ञापन के सहारे
चेहरे पहले से तय हैं,
जुबान से निकले
और कागज़ में लिखे शब्द भी
पहले से तय हैं,
निष्कर्ष कोई नहीं
पर बात हमेशा होती है लाजवाब
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Friday, August 27, 2010

हादसों पर मेले-हिन्दी शायरी (hadson par mele-hindi shayari

कुछ लोग हादसों में मरे इंसानों की याद में
हर बरस मोमबत्तियां जलायेंगे,
तो कुछ जन्नत के फरिश्ते
जख्मों में मरहम लगाने के लिये
सर्वशक्तिमान का नया दरबार बनायेंगे।
इंसान मौत से हारे हैं,
ईमान से अधिक उनको अपने मतलब प्यारे हैं,
कभी नहीं समझा धर्म,
अपनी कमजोरी पर आती है शर्म,
फिर भी अपनी अक्लमंदी से बन गये
जो सर्वशक्तिमान के ठेकेदार
मुर्दों में अमरत्व दिखाने के लिये
पत्थर की कुछ नई इमारते सजायेंगे।
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Saturday, August 21, 2010

, ईमान से अधिक उनको अपने मतलब प्यारे- हिन्दी व्यंग्य कविता

कुछ लोग हादसों में मरे इंसानों की याद में
हर बरस मोमबत्तियां जलायेंगे,
तो कुछ जन्नत के फरिश्ते
जख्मों में मरहम लगाने के लिये
सर्वशक्तिमान का नया दरबार बनायेंगे।
इंसान मौत से हारे हैं,
ईमान से अधिक उनको अपने मतलब प्यारे हैं,
कभी नहीं समझा धर्म,
अपनी कमजोरी पर आती है शर्म,
फिर भी अपनी अक्लमंदी से बन गये
जो सर्वशक्तिमान के ठेकेदार
मुर्दों में अमरत्व दिखाने के लिये
पत्थर की कुछ नई इमारते सजायेंगे।
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Monday, May 17, 2010

फूल और पत्थर-हिन्दी शायरी (fool aur patthar-hindi shayari)

किसी पर फूल बरसाने से
भले ही लौट कर पांव में नहीं आते हैं,
पर फैंकने पर पत्थर दूसरे पर
अपने सिर पर भी चले पाते हैं।
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उनकी तारीफ में हम क्या बयां करते
पूरा ज़माना उनके पांव में बिछा हुआ था,
हमारे मुफ्त के लफज़ उस किराये की महफिल में
कोई असर नहीं डालते
क्योंकि वहां हर शख्स बिका हुआ था।
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Saturday, March 27, 2010

खबरें और यकीन-हिन्दी व्यंग्य कविता (news and faith-hindi satire poem)

खबरों से यकीन यूं उठ गया है
क्योंकि वह शब्द बदल सामने आती रहीं।
कहीं चेहरे बदले
तो कहीं चालें
पर चरित्र पुराना ही दिखाती रहीं।
नतीजे पर नहीं पहुंचा कोई मुद्दा
पर खबरें बरसों तक चलती रहीं,
कहीं बाप की जगह बेटे का नाम लिखा जाने लगा
कहीं बेटियों के नाम भरती रहीं,
कभी कभी प्रायोजक बदलकर भी
खबरे सामने आती रहीं।
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मुद्दा सामने पड़ा था,
पर खबरची उसे छोड़ने पर अड़ा था।
क्योंकि कोई प्रायोजक पास नहीं खड़ा था।
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Sunday, February 21, 2010

अपने बताये रस्ते पर चलें,ऐसे लोग कम हैं-हिंदी व्यंग्य कविता (few men in world-hindi comic poem)

सभी को बताये रास्ते पर खुद चलें, ऐसे लोग कम हैं।
दूसरे को सिखायें दांवपैंच, जो अजमाने में खुद बेदम हैं।।
हवा के झौंके से कांपने लगता है पूरा उनका बदन,
जमाने को डरपोक बतायें, अपनी बहादुरी के उनको वहम हैं।।
दूसरों की रौशनी में चले हैं पूरी जिंदगी का रास्ता,
दीपक और मशाल जलायें रोज, ऐसे लोग कम हैं।।
सह नहीं पाते दूसरे की खुशी, दुखी हो जाते हैं,
अपने मतलब की राह चले हैं वह, जहां ढेरों गम हैं।
तलवारें और ढाल थामें हैं चारों ओर लोग
कलम से शब्द लिखकर अमन लायें, ऐसे लोग कम हैं।
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Tuesday, December 22, 2009

ज़माने के दर्द के साथ-हिंदी शायरी (zamane ke dard ke saath-hindi shayri)

 कागज़ की उपाधियों से
पूरा घर  सजा दिखता हो
गर आदमी बेचने वाले अल्फाज़ लिखता हो.
खुद के साथ ज़माने के दिल को तसल्ली दे
मुश्किल होता है ऐसा लिखना
दर्द अपना चेहरे पर न आये
मुश्किल होता है ऐसा बेदर्द दिखना
बह जाए महफ़िलों में वाह वाह की दरिया के साथ
एक दिन बह जाएगा का उसका नाम भी
नाम उसका ही रौशन रहेगा
जो जमाने के दर्द के साथ खुद टिकता हो..
 
कवि लेखक और सम्पादक - दीपक भारतदीप,ग्वालियर
 

Wednesday, November 18, 2009

दिल के भाव-हिंदी कविता (dil ke bhav-hindi kavita)

 
कभी गम तो कभी खुशी
कभी दर्द तो कभी हँसी के साथ
कविता लिखने का ख्याल किया
तब भाषा सजाने के साथ  
शब्द को जोर से बजाने का सोच  नहीं आया.
कोशिश की रस के रंग दिखाने 
और   अलंकार से कविता  सजाने की 
मिले जिससे भाषा विद्वान की उपाधि 
तब कविता को अपने दिल के  भाव से दूर पाया..
____________________
 

कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
------------------------

दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
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परदे का सच-हिंदी व्यंग्य कविताएँ (parde ka sach-hindi vyangya kavitaen)

 इस देश का आदमी
उड़ना चाहता है ऊंची उड़ान
अपने पांवों में पुरानी ज़जीरों को बांधकर.
अपनी आँखों से परदे पर
देखकर आकाश का सुनहरा दृश्य
बहलता है  सपनों के साथ
फड़कते  हैं  उसके  हाथ
नकली नायकों की कामयाबी
देखकर ही  चल पड़ता है
अंधेरी राहों पर
उसे पाने का ठानकर..
-------------------------------
 
परदे पर जो तुम देख रहे हो
उसे सच मत समझना
झूठ को सच  की तरह
वहां सजाया जाता है..
दुनिया में जो हो सके
वही वहां दिखाया जाता है..
तुम्हारा सच ही तुमसे छिपाया जाता है
झूठ के रास्ते चलो
इसलिए तुमकों बहलाया जाता है..
 
 
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Sunday, November 15, 2009

दर्द और अहसास-हिन्दी शायरी (dard aur ahsas-hindi shayri)

यूं तो अपने लिए कुछ नहीं चाहिए था
जो प्यार पाने  की चाहत थी
उनके कम निकलते ही
नज़र फेरने की आदत ने
उस पर भी पानी फेर दिया.
फिर नहीं आयेंगे नज़र
उनके कहते ही
दर्द ने और ज्यादा घेर लिया.

इस लेखक के समस्त ब्लॉग यहाँ एक जगह प्रस्तुत हैं

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