यह एक अव्यवसायिक ब्लॉग/पत्रिका है. इस पर मौलिक रचनाएं प्रकाशित है. कृपया इसे किसी फोरम पर न दिखाएँ क्योंकि यह ब्लॉग नहीं है बल्कि इसे संग्रहक के रूप में प्रयोग किया जा रहा है. लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर
Friday, November 5, 2010
टूटी नीयत, खूबसूरत चेहरा-हिन्दी व्यंग्य कविता (kharab neeyat,khubsurat chehra-hindi satire poem)
तब एक को समझौते का ख्याल आया,
उसने दूसरे को समझाया,
''यार, अब बदल गया है ज़माना,
मुश्किल हो गया है कमाना,
क्यों न आपस में समझौता कर लें,
भले ही मन में हो खोट रखें
बाहर से एकरूप और विचारधारा धर लें.."
सुनकर दूसरा बोला
"सच कहते हो यार,
बरबाद हो गयी है हर धारा
बिगड़ गया है हर विचार,
अपने आका दल क्या
दिल ही बदल देते हैं,
अवसर जहां देखते हैं मिलने का सम्मान
वहीँ अपनी किस्मत खुद लिख देते हैं,
कविताई के नाम पर
एकता, भाईचारा, और अमन के पैगाम लिखते हैं,
बिकने पर माल के लिए
दारू पीकर लड़ते दिखते हैं,
अपने हिस्सा नहीं आ रहा नामा और नाम,
इस तरह तो छूट जाएगा कविताई का काम,
अपने मसीहाओं की तरह टूटी नीयत रखें
बाहर से एकता, अमन और भाईचारे का
खूबसूरत चेहरा धर लें.."
__________________
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका
Saturday, March 27, 2010
खबरें और यकीन-हिन्दी व्यंग्य कविता (news and faith-hindi satire poem)
क्योंकि वह शब्द बदल सामने आती रहीं।
कहीं चेहरे बदले
तो कहीं चालें
पर चरित्र पुराना ही दिखाती रहीं।
नतीजे पर नहीं पहुंचा कोई मुद्दा
पर खबरें बरसों तक चलती रहीं,
कहीं बाप की जगह बेटे का नाम लिखा जाने लगा
कहीं बेटियों के नाम भरती रहीं,
कभी कभी प्रायोजक बदलकर भी
खबरे सामने आती रहीं।
----------
मुद्दा सामने पड़ा था,
पर खबरची उसे छोड़ने पर अड़ा था।
क्योंकि कोई प्रायोजक पास नहीं खड़ा था।
----------
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका
Saturday, March 13, 2010
साफ सुथरा इंसान-हिन्दी क्षणिकायें (saf suthara insan-hindi short poem)
नैतिकता की बात करने लग जाते हैं,
फिर सुनाते हैं अपनी कमाई के नुस्खे
जैसे दो नंबर की कमाई एक नंबर की हो
सीना फुलाकर उसकी कहानी सुनाते है।।
बहुत अच्छा लगता है
आदर्श और नैतिकता की बात करते हुए
बशर्त है आदमी स्वयं से छिप सकता हो।
वही कहलाता है साफ सुथरा इंसान
जो दूसरों पर इल्जाम लगाने में
कभी देर नहीं करता
पर बात अगर अपने पर आ जाये तो
जमाने का जिम्मेदार बताते हुए
अपना कसूर अपनी नज़र बचा सकता हो।
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका
क्रिकेट और फिल्म का घालमेल-हिन्दी हास्य कविता (combination of cricket and film-hind comic poem)
क्रिकेट खिलाड़ी बनने के लिये
तो माशुका भी खड़ी थी
फिल्म अभिनेत्री बनने की पंक्ति में
कई उसने साक्षात्कार भी दिये।
बढ़ते जा रहे थे दोनों के कदम
इश्क के साथ
अपने लक्ष्य की तरफ भी सफलता के लिये।
पर आशिक की चिंतायें बढ़ रही थी
रौशन करना चाहता था वह अब
अपने घर में ही इश्क के दिए।
वह बोला माशुका से
‘अब तो मैं नामी खिलाड़ी बनने जा रहा हूं,
अपने रनों और विकेटों की बरसात में नहा रहा हूं,
पर डरता हूं
तुम्हारे और मेरे इश्क का क्या होगा
कहीं बिछड़ न जाये,ं
आओ अपना घर बसायें,
अपने अमर प्रेम के लिये।’
सुनकर बोली माशुका
‘क्यों घबड़ाते हो,
मैं भी सैट पर नृत्य करती हूं
जब तुम मैदान में रन बनाते होे,
हमारा बिछड़ना अब संभव नहीं,
फिल्म और क्रिकेट का
घालमेल हो गया है हर कहीं,
जब तुम नामी खिलाड़ी हो जाओगे,
मुझे भी बड़ी अभिनेत्री की तरह पाओगे,
कभी न कभी तुम्हारी भी लगेगी नीलाम बोली,
कोई टीम मैं भी खरीदूंगी
जिसमें समायेगी तुम्हारी भी टोली,
वैसे क्या रखा है दूल्हे की तरह बिकने में,
मजा है बिकाऊ क्रिकेट खिलाड़ी दिखने में,
दहेज का शब्द हो गया है बदनाम,
नीलामी में दूंगी तुम्हें ढेर सारे इनाम,
माल तो अपने ही घर आयेगा,
हर कोई देखकर जल जायेगा,
इश्क बाजी में कीर्तिमान बनाकर रख देंगे
आने वाली पीढ़ी के लिये।
लोग गायेंगे इश्क के साथ हमारी
दौलत के भी गीत,
नहीं देखी होगी किसी ने ऐसी प्रीत,
अभी घर संसार बनाकर
गुमनामी के अंधेरे में खोकर जिये
तो फिर क्या खाक जिये।’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका
Monday, March 8, 2010
साधु और शैतान-हिन्दी हास्य कविता (sadhu aur shaitan-hindi comic poem)
उसके घर पहुंचने का संदेश भिजवाया,
तब वह बहुत घबड़ाया
अपनी पत्नी, बेटी और बहु से बोला
‘अरे भई,
बड़ी मुद्दत बाद वह वक्त आया
जब मेरे गुरुजी ने मेरे शहर आकर
घर पहुंचने का विचार बताया,
सब तैयारी करो,
स्वागत में कोई कमी न रह जाये,
इतने बड़े शिखर पर पहुंचा
उनकी कृपा से ढेर सारे फल पाये,
अब गुरु दक्षिणी चुकाने का समय आया।’
सुनकर बहु बोली
’लगता है ससुर जी आप न अखबार पढ़ते
न ही टीवी अच्छी तरह देखते,
आजकल के गुरु हो गये ऐसे
जो अपने ही शिष्यों के घरों की
महिलाओं पर कीचड़ फैंकते,
तौबा करिये,
बाहर जाकर ही गुरु दक्षिणा भरिये,
जवानी होती दीवानी,
बुढ़ापे में आदमी हो गुरु, हो जाता है रोमानी,
गेरुऐ पहने या सफेद कपड़े,
गुरुओं के चर्चित हो रहे लफड़े,
शैतान से बच जाते हैं क्योंकि
उससे बरतते पहले ही सुरक्षा
फिर वह पहचाना जाता है,
जरूरत है साधु से बचने की जो
शैतानी नीयत से आता है,
ऐसा मेरे पिता ने बताया।’
बहु के समर्थन में सास और
ननद ने भी अपना सिर हिलाया
तब ससुर बोले
‘चलो बाहर ही जाकर
उनके दर्शन करके आता हूं
पर तुम्हारी एकता देखकर सोचता हूं कि
किसे धन्यवाद दूं
साधु या शैतान को
किसने सास बहु और ननद-भाभी को
किसी विषय पर सहमत बनाया।’
------------------------
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका
रात के पहर में-हिन्दी व्यंग्य कविता (raat ke pahah men-hindi satire poem)
पढ़े लिखे अंग्रेजी में
आजाद रहे नाम के
गुलामी सिखाती रही आधुनिक शिक्षा।
अब कटोरा लेकर नहीं
बल्कि शर्ट पर कलम टांग कर
मांग रहे पढ़े लिखे लोग नौकरी की भिक्षा।
--------
आंखों से देख रहे पर्दे पर दृश्य
कानों से सुन रहे शोर वाला संगीत
नशीले रसायनों की सुगंध से कर रही
सभी की नासिका प्रीत,
मुंह खुला रह गया है जमाने का
देखकर रौशनी पत्थरों के शहर में।
अक्ल काम नहीं करती,
हर नयी शय पर बेभाव मरती,
बाजार के सौदागरों के जाल को
जमीन पर उगे धोखे के माल को
सर्वशक्तिमान का बनाया समझ रहे हैं
हांके जा रहे हैं भीड़ में भेड़ की तरह
दिन में सूरज की रौशनी में छिपे रहते
दिल का उजाला ढूंढते रात के पहर में।
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका
रिश्तों की कहानी-हिन्दी व्यंग्य कविता (ujde rishtton ki kahnai-hindi vyangya kavita)
किसी को क्या सुनायें,
रोते लोगों क्या रुलायें,
सभी अपने गम छिपाने के लिये
दूसरों के घावों पर हंसने का
मौका ढूंढ रहे हैं।
अपने साथ हुए हादसों के किस्से
किसको सुनायें,
आखिर लोग उनको मुफ्त में क्यों भुनायें,
अपनी जिंदगी में थके हारे लोग
जज़्बातों के सौदागर बनकर
दूसरों के घरों के उजड़े रिश्तों की कहानी
बेचने के लिये घूम रहे हैं।
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका
Sunday, February 28, 2010
ब्लाग जगत पर होली व्यंग्य-हिन्दी लेख (hindi satire wrote on holi-hindi article)
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका
Sunday, February 21, 2010
प्यार और तोहफा-हिंदी व्यंग्य शायरी (ishq aur tohfa-hinci satire poem)
तोहफों से चलने लगा है,
इसलिये आदमी तोहफे देकर
हर इंसान प्यार खरीदने लगा है।
तोहफों की कीमत जितनी बढ़ेगी,
प्यार की ऊंचाई भी उतनी लगेगी,
नजरों का दोष है कि दिल का
प्यार जाहिर करने की ख्वाहिशों के आगे
हर तोहफा सस्ता लगने लगा है,
मगर मजबूरी है
बिना तोहफे के प्यार खाली लगने लगा है।
मुश्किल यह है कि
प्यार दिखाने के लिये तोहफा खरीदने वास्ते
कब तक पतंग की तरह
इधर उधर उड़ते रहें,
कीमत चुकाने के लिये
कमाने के दर्द कब तक सहें,
सरलता से किया जाने वाला प्यार
तोहफों के जाल में फंसने लगा है।
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका
खूबसूरती की दौड़ में-हिन्दी हास्य कवितायें (hindi comic poem)
सौंदर्य का पर्याय बन गये हैं,
भयानक चेहरे भी
खूबसूरती की दौड़ में भागने के लिये बनठन गये हैं।
-----------
न राई थी, न पहाड़ था,
न तिल था, न ताड़ था,
फिर भी वह ख्वाब बेचकर
सौदागरों ने पैसा कमाया।
इसतर बड़े ठग ने
छोटे पर रुआब जमाया।
कौन करेगा फरियाद,
सभी दे रहे एक दूसरे को दाद,
न अच्छे रास्ते पैसा मिला
न अच्छी जगह गंवाया।
-----------
अब यह प्रश्न न पूछना कि
हर शाख पर उल्लू बैठा है
अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा।
उजड़े चमन में
बिगड़े लोगों के वतन में
बरबादी का मंजर चारों तरफ है
अब तो प्रश्न यह है उल्लूओं का क्या होगा?
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका
वहम-हिन्दी क्षणिकाऐं (vaham-hinci comic poem)
नर्तकों के देवता होने का वहम
पूरे ज़माने को हो गया है,
झूठ के सहारे खड़ा है दौलत का महल,
इज्जत पाने के लिये, होने लगी सौदे की पहल,
ईमान सभी का सो गया है।
-----------
सर्वशक्तिमान ने दाने दाने पर लिखा है
खाने वाले का नाम
न मिलने पर उसका क्या दोष
अगर बंद हो गोदाम।
----------
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका
अपने बताये रस्ते पर चलें,ऐसे लोग कम हैं-हिंदी व्यंग्य कविता (few men in world-hindi comic poem)
दूसरे को सिखायें दांवपैंच, जो अजमाने में खुद बेदम हैं।।
हवा के झौंके से कांपने लगता है पूरा उनका बदन,
जमाने को डरपोक बतायें, अपनी बहादुरी के उनको वहम हैं।।
दूसरों की रौशनी में चले हैं पूरी जिंदगी का रास्ता,
दीपक और मशाल जलायें रोज, ऐसे लोग कम हैं।।
सह नहीं पाते दूसरे की खुशी, दुखी हो जाते हैं,
अपने मतलब की राह चले हैं वह, जहां ढेरों गम हैं।
तलवारें और ढाल थामें हैं चारों ओर लोग
कलम से शब्द लिखकर अमन लायें, ऐसे लोग कम हैं।
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका
Sunday, February 7, 2010
ज्ञानी और ईमानदारी-हिन्दी व्यंग्य कवितायें
दिन भर वह दोनों ज्ञानी
अपने शब्दों की प्रेरणा से
लोगों को लड़ाने के लिये
झुंडों में बांट रहे थे,
रात को ईमानदारी से
लूट में मिले सामान में
अपना अपना हिस्सा
ईमानदारी से छांट रहे थे।
-------
शब्द रट लेते हैं किताबों से,
सुनाते हैं उनको हादसों के हिसाबों से,
पर अक्लमंद कभी खुद जंग नहीं लड़ते।
नतीजों पर पहुंचना
उनका मकसद नहीं
पर महफिलों में शोरशराबा करते हुए
अमन की राह में उनके कदम
बहुत मजबूती से बढ़ते।
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका
चिल्लाने की बारी -हिन्दी व्यंग्य कविता (hindi comic satire poem)
अत्याचार
और व्याभिचार को भी
जाति, भाषा और धर्म के नाम पर
बांटने की कोशिश जारी है,
अक्लमंद दिखाते हैं बहादुरी
अपने अपने हिस्से की शिकायतें उठाने में
शब्द खर्च करते
दूसरे की कमियां गिनाने में
हर हादसे पर देखते हैं बस यही कि
किसके चिल्लाने की बारी है।
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका
कला, मनोरंजन, शायरी, शेर, समाज, हिन्दी साहित्य
Sunday, January 17, 2010
शांति और वफादारी-हिन्दी शायरी (shanti aur vafadari-hindi shayri)
भीड़ में एकता की कोशिश पर
हंसी आ ही जाती है।
जहां पहले ही
चीख रहे हैं लोग
अपनी करनी का बखान करते हुए
बंद किये हैं कान,
आंखों से ढूंढ रहे अपने लिये सम्मान,
वहां शांति के नारे की आवाज
शोर करती नजर आती है।
-------
वफादारी
खामोश जज़्बात के साथ बह जाती है।
गद्दारी के घाव से पैदा आह
दिल से निकलकर
जुबान पर आकर चीखती
तब सनसनी फैल जाती है।
यही वजह है
नाम कमाने के लिये
गद्दारी ही सभी को भाती है।
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका
Sunday, January 3, 2010
आशिक माशुका ब्लागर और नववर्ष-हिन्दी हास्य कविता (love couple blogger and new year-hindi hasya kavita)
आशिका और माशुका ने मिलकर
अपने एकल और युगल ब्लाग पर
खूब पाठ लिखे,
कभी सप्ताह भर तो
कभी माह बाद दिखे
साल भर कर ली जैसे तैसे लिखाई।
साल के नंबर वन के ब्लागर का
खिताब पाने की दोनों को ललक थी
पर कहीं सामुदायिक ब्लागर पर भी
दाव चल जाये इसलिये
युगल ब्लाग भी लिखते थे,
कभी प्यार तो, कभी व्यापार पर तो,
कभी नारीवाद पर भी की खूब लिखाई।
नव वर्ष के पहले दिन ही
सुबह आशिक ब्लागर ने
माशुका के फोन की घंटी बजाई।
नींद से उठी माशुका ने भी ली अंगड़ाई।
उधर से आशिक बोला
‘नव वर्ष की हो बधाई’,
माशुका ने बिना लाग लपेटे के कहा
‘छोड़ो सब यह बेकार की बात
यह तो ब्लाग पर ही लिखना,
अब तो नंबर वन के लिये कोशिश करते दिखना,
बहुत जगह बंटेंगे पुरस्कार
इसलिये तुम मेरा ही नाम आगे करना,
मैंने दूसरे लोगों से भी कहा है
वह भी मेरे लिये वोट जुटायेंगे
लग जाये शायद मेरे हाथ कोई इनाम
जब लोग लुटायेंगे,
वैसे तुम अपने नाम की कोशिश मत करना
क्योंकि हास्य कविताओं के कारण
तुम्हारी छवि अच्छी नहीं है
तुम्हारा मन न खराब हो
इसलिये तुम्हें यह बात नहीं बताई।’
‘अरे, यह क्या चक्कर है
मैंने तुम्हें पास से कभी नहीं देखा
फोटो देखकर ही पहचान बनाई,
अब तुम कैसी कर रही हो चतुराई।
क्या इसी नंबर वन के लिये
तुमने यह इश्क की महिमा रचाई।
मैं लिखता रहा पाठ पर पाठ
तुमने वाह वाह की टिप्पणी सजाई।
अब आया है इनाम का मौका तो
मुझे अपनी औकात बताई।
वैसे तुमने भी क्या लिखा है
सब कूड़े जैसा दिखा है
शुक्र समझो मेरी टिप्पणियों में बसे साहित्य ने
तुम्हारे पाठ की शोभा बढ़ाई।
अब मुझे अपना हरकारा बनने के लिये
कह रहे हो
तुम ही क्यों नहीं मेरा नाम बढ़ाती
करने लगी हो मुझसे नंबर वन की लड़ाई।’
‘बंद करो बकवास!
तुमसे अधिक टिप्पणियां तो
मेरे ब्लाग पर आती हैं
तुम्हारी साहित्यक टिप्पणियों पर
मेरी सहेलियों ने मजाक हमेशा उड़ाई।
वैसे तुम गलतफहमी में हो
तुम जैसे कई पागल फिरते हैं अंतर्जाल पर
मैंने सभी पर नज़र लगाई।
एक नहीं सैंकड़ों मेरे नंबर वन के लिये लड़ेंगे
सभी तमाम तरह से कसीदे पढेंगे,
तुम अपना फोन बंद कर दो
भूल जाओ मुझे
तुम्हारे बाद वाले का भी फोन आयेगा
वही मेरी नैया पार लगायेगा
तुम चाहो तो बन जाओ भाई।’
इधर आशिक ब्लागर आसमान की तरफ
आंखें कर लगभग रोता हुआ बोला
‘हे सर्वशक्तिमान यह क्या किया
इश्क रचा तो ठीक
पर नववर्ष की परंपरा क्या बनाई,
जिससे इश्क में मैंने पाई विदाई।।
नोट-यह एक काल्पनिक हास्य कविता मनोरंजन की दृष्टि से लिखी गयी है। इसक किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है। किसी की कारिस्तानी से मेल हो जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा।
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका
इश्क का खेल, सम्मान की ज़ंग-हास्य कविता (play of lave and war for prize-hindi hasya kavita)
शहर के नंबर वन
आशिक माशुका के जोड़े को
चुनकर उसे सम्मानित करने की
खबर बड़े जोर से एक महीन पहले ही छाई।
ग्यारह महीने से जो मजे उठा रहे थे
ब्रेिफक्र होकर, प्यार के मौसम में
सभी की नींद सम्मान ने उड़ाई।
कुछ आशिकों का शक था
अपनी माशुका के साथ इनाम मिलने का,
कुछ माशुकाओं को भी विश्वास नहीं था
अपने जोड़दार के साथ
अपना नाम का फूल शहर में खिलने का,
सभी अपने इश्क के पैगामों में
लिखने वाले संबोधन बदल रहे थे,
जो एक समय में रचाते थे कई प्रसंग
एक इश्क के व्रत में बहल रहे थे,
प्रविष्टी भरने के अंतिम दिन तक
सभी रच रहे थे
फार्म में भरने के लिये अपने इतिहास,
कुछ गमगीन हो गये तो कुछ करने लगे परिहास,
इश्क करने वाले आशुक बन गये योद्धा,
माशुकायें बन गयीं, संस्कारों की पुरोधा,
दे रहे थे सभी एक दूसरे को नर्ववर्ष की बधाई,
पर अंदर ले रहे थे, जंग के लिये अंगराई।
आशिक माशुका के जोड़े को
इनाम देने के नाम पर चली
इश्क की जंग में
उथल पुथल से कई दिल टूटे
कहीं माशुका तो कहीं आशिक रूठे,
नहीं रहा कोई रिश्ता स्थाई।
होने की खबर आई।
पता चला युवा आयोजक की पुरानी माशुका ने
अपने नये आशिक के साथ
प्रतियोगिता के लिये अपनी प्रविष्टी दर्ज कराई,
कर ली थी जिसने उसके दुश्मन से सगाई।
नयी माशुका की एक सहेली को
छोड़ गया था उसका आशिक
उसने भी उसके यहां गुहार लगाई।
नयी माशुका ने सार्वजनिक रूप से
इस नाटक करने पर कर दी
युवा आयोजक की ठुकाई।
टूट गया वह, उसने बंद कर दिया यह सम्मान
पर शहर में जहां जहां खेला जाता था
इश्क का खेल
सभी जगह जंग के मैदान में नज़र न आई।
नोट-यह एक काल्पनिक हास्य कविता मनोरंजन की दृष्टि से लिखी गयी है। इसक किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है। किसी की कारिस्तानी से मेल हो जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा।
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका
Saturday, December 26, 2009
बड़े लोगों की बड़ी बातें-हिन्दी व्यंग्य कविताएं (matter of top class men-hindi satire poem)
बड़े लोगों की होती है बड़ी बातें।
छोटा तो दिन में भी
छोटी शर्म का काम करते भी घबड़ाये
बड़ा आदमी गरियाता है
गुजारकर बेशर्म रातें।।
----------
छोटे आदमी की रुचि
फांसी पर झूले
या लजा तालाब में डूबे
बड़ा आदमी अपनी रातें गरम कर
कुचलता है कलियां
फिर झूठी हमदर्दी जताये।
बड़े आदमी की विलासता भी
लगाती उसके पद पर ऊंचे पाये।
---------
हर जगह बड़े आदमी की शिकायत
बरसों तक कागजों के ढेर के नीचे
दबी पड़ी है।
छोटे की हाय भी
उसके बीच में इंसाफ की उम्मीद लिये
जिंदा होकर सांसें अड़ी है।
बड़े लोग हो गये बेवफा
पर समय की ताकत के आगे
हारता है हर कोई
हाय छोटी है तो क्या
इंसाफ की उसकी उम्मीद बड़ी है।
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका
Tuesday, December 22, 2009
ज़माने के दर्द के साथ-हिंदी शायरी (zamane ke dard ke saath-hindi shayri)
Wednesday, November 18, 2009
दिल के भाव-हिंदी कविता (dil ke bhav-hindi kavita)
कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
------------------------
दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
इस लेखक के समस्त ब्लॉग यहाँ एक जगह प्रस्तुत हैं
-
How Nonprofit Revive & Restore Found a Better Home on WordPress.com - Slow pages and difficult updates had Revive & Restore considering a move away from WordPress. A second opinion helped the nonprofit find a different way fo...10 hours ago
-
हम भारत, भारती, और भारतीयता के संवाहक हैं और धर्मनिरपेक्षता तामस गुण की पहचान है(भाग एक) we have an Bharat.,Bharati, bhartiyata Thought, Seculisma is Tanasi type (part-1) - पहले तो प्रश्न यह है कि क्या हम सर्वधर्म समभाव की विचाराधारा से सहमत हैं? जवाब अगर हां है तो फिर यह समझाना पड़ेगा कि धर्म का आशय क्या है? भारत विश्वगुरु है...6 years ago
-
मत का अधिकार था भगवान हुए मतदाता-दीपकबापूवाणी (Matadata ka Adhikar thaa Bhagwan hue Matdata-DeepakBapuwani) - *---ज़माने पर सवाल पर सवालसभी उठाते, अपने बारे में कोई पूछे झूठे जवाब जुटाते।‘दीपकबापू’ झांक रहे सभी दूसरे के घरों में, गैर के दर्द ...7 years ago
-
मनचलों में राजा होने का भ्रम है-दीपकबापूवाणी (Manchalon mein raja hone ka Bhram hai-DeepakbapuWani) - *मनचलों में राजा होने का भ्रम है,* *किसी के हाथ लट्ठ किसी के बम है।* *काम में नकारा मुंह चलाते* *‘दीपकबापू’ बाजूओं में नहीं दम है।* *----* *सड़क पर खड़ा हो बौ...7 years ago
-
भ्रमजाल फैलाकर सिंहासन पा जाते-दीपकबापूवाणी (bhramjal Failakar singhasan paa jaate-DeepakbapuWani - *छोड़ चुके हम सब चाहत,* *मजबूरी से न समझना आहत।* *कहें दीपकबापू खुश होंगे हम* *ढूंढ लो अपने लिये तुम राहत।* *----* *बुझे मन से न बात करो* *कभी दिल से भी हंसा...7 years ago
-
पर्यावरण में विष घोलकर विकास की बात करते हैं-दीपकबापूवाणी (Vish Gholkar vikas ki baat karte hain-DeepakbapuWani) - *नेता अभिनेता प्रचार के लिये बोलें,* *हर रस मे अपने शब्द घोलें।* *ंभाषा के अलंकार भूलते* *अर्थ के नाम पर अनर्थ खोलें।* *---* *राम नाम पर सत्ता का सुख लूट,* ...7 years ago
-
दूसरे की फिक्र से कमाते हैं-दीपकबापूवाणी (Doosre ki Fikra se kamate hain-DeepakBapuWani) - *बेकारी के जो सताये हैं,* *राजमार्ग पर चले आये हैं।* *‘दीपकबापू’ दिल बहला लेते* *वादों का पिटारा जो वह लाये हैं।* *---* *वादों के व्यापारी हमदर्द वेश धरेंग...8 years ago
-
पश्चिमी दबाव में धर्म और नाम बदलने वाले धर्मनिरपेक्षता का नाटक करते रहेंगे-हिन्दी लेख (Convrted Hindu Now will Drama As Secularism Presure of West society-Hindi Article on Conversion of Religion) - हम पुराने भक्त हैं। चिंत्तक भी हैं। भक्तों का राजनीतिक तथा कथित सामाजिक संगठन के लोगों से संपर्क रहा है। यह अलग बात है ...8 years ago
-
आनंद उठाने का सबसे अच्छी तरीका यह है कि आप एकांत में जाकर ध्यान लगायें-चिंत्तन (Anand Uthane ka tareeka-Chinttan) - रोकड़ संकट बढ़ाओ ताकि मुद्रा का सम्मान भी बढ़ सके। --- हम वृंदावन में अनेक संत देखते हैं जो भल...8 years ago
-
अभी तक पेट्रोल के भाव कम क्यों नहीं हुए, लोग अब वादों और नारों से बोर रहे रहे हैं-हिन्दी लेख (Why din not prize decrease of Petrol, log is bor from Slogen and promise-HindiArticle0 - कल पेट्रोल सस्ते होने और जीएसटी में मध्यम वर्ग के व्यवसायियों की राहत पर भक्तों के शीर्ष पुरुषों की सक्रियता ...9 years ago
-
जयश्रीराम का राजनीतिकरण कौन कर रहा है-हिन्दी संपादकीय - जब देश में रामजन्मभूमि आंदोलन चल रहा था तब ‘जयश्रीराम’ नारे का जिस तरह चुनावी राजनीतिकरण हुआ उसकी अनेक मिसाल...9 years ago
-
पाकिस्तान को मोदी जी से डरना ही चाहिये-संदर्भःभारत पाक संबंध-सामायिक लेख - पाकिस्तानी भले ही परमाणु बम लेकर बरसों से भारतीय हमले से बेफिक्र हैं यह सोचकर कि हम एक दो तो भारत पर पटक ही ल...10 years ago
-
इंटरनेट पर हिन्दी लिखने वालों को साहित्यकार ही माने-हिन्दी लेख - प्रतिदिन कोई न कोई सम्मानीय अपना सम्मान पुराने सामान की तरह बाहर फैंक रहा है। इससे तो यही लगता है जितने साहित्यक सम्मान देश में बांटे गये ...10 years ago
-
धार्मिक ग्रंथ की बात पहले समझें फिर व्यक्त करें-हिन्दी लेख - अभी हाल ही में एक पत्रिका में वेदों के संदेशों के आधार पर यह संदेश प्रकाशित किया गया कि ‘गाय को मारने या मांस खाने वाले ...10 years ago
-
स्वर्ग व मोक्ष का दृश्यव्य रूप नहीं-हिन्दी लेख - हमारे देश में धर्म के नाम पर अनेक प्रकार के भ्रम फैलाये गये हैं। खासतौर से स्वर्ग और मोक्ष के नाम पर ऐसे प्रचारित किये ग...10 years ago
-
मनोरंजन से अध्यात्मिक शांति बेचने का प्रयास-हिन्दी लेख - पूरे विश्व में प्रचार माध्यमों के बीच हर प्रकार के दर्शक और श्रोता को प्रभावित करने की होड़ चल पड़ी है। मनोरंजन के नाम पर अनेक तरह के कार्यक...10 years ago
-
सम्मान वापसी और रचनात्मकता का वैचारिक संघर्ष-हिन्दी लेख - अब हम उन्हें दक्षिणपंथी कहें या राष्ट्रवादी जो अब पुराने सम्मानीय लेखकों के सामान वापसी प्रकरण से उत्तेजित हैं और तय नहीं कर पा रहे कि उनके प्रच...10 years ago
-
हिन्दी दिवस पर दीपकबापू वाणी - हृदय धड़के मातृभाषा में, भाव परायी बाज़ार में मत खोलो। कहें दीपकबापू खुशी हो या गम, निज शब्द हिन्दी में बोलो।। ————— दिल के जज़्बात अपने हैं, अपनी जुबां हिन्...11 years ago
-
अधर्मी व्यक्ति की तरक्की देखकर विचलित न हो-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख - विश्व के अधिकतर देशों में जो राजनीतक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्थायें हैं उनमें सादगी, सदाचार तथा सिद्धांतों के साथ विकास करते हुए उच...12 years ago
-