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Friday, November 5, 2010

टूटी नीयत, खूबसूरत चेहरा-हिन्दी व्यंग्य कविता (kharab neeyat,khubsurat chehra-hindi satire poem)

आपस में विरोधी कवि उलझे रहे बरसो 
तब एक को समझौते का ख्याल आया,
उसने दूसरे को समझाया,
''यार, अब बदल गया है ज़माना,
मुश्किल हो गया है कमाना,
क्यों न आपस में समझौता कर लें,
भले ही मन में हो खोट रखें
बाहर से एकरूप और विचारधारा धर लें.."

सुनकर दूसरा बोला 
"सच कहते हो यार,
बरबाद हो गयी है हर धारा
बिगड़ गया है हर विचार,
अपने आका दल क्या 
दिल ही बदल देते हैं,
अवसर जहां देखते हैं मिलने का सम्मान 
वहीँ अपनी  किस्मत खुद लिख देते हैं,
कविताई के नाम  पर 
एकता, भाईचारा, और अमन के पैगाम लिखते हैं,
बिकने पर माल के लिए 
दारू पीकर लड़ते दिखते हैं,
अपने हिस्सा नहीं आ रहा नामा और नाम,
इस तरह तो छूट जाएगा कविताई का काम,
अपने मसीहाओं की तरह टूटी  नीयत रखें 
बाहर से एकता, अमन और भाईचारे का
खूबसूरत चेहरा धर लें.."
__________________
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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Saturday, March 27, 2010

खबरें और यकीन-हिन्दी व्यंग्य कविता (news and faith-hindi satire poem)

खबरों से यकीन यूं उठ गया है
क्योंकि वह शब्द बदल सामने आती रहीं।
कहीं चेहरे बदले
तो कहीं चालें
पर चरित्र पुराना ही दिखाती रहीं।
नतीजे पर नहीं पहुंचा कोई मुद्दा
पर खबरें बरसों तक चलती रहीं,
कहीं बाप की जगह बेटे का नाम लिखा जाने लगा
कहीं बेटियों के नाम भरती रहीं,
कभी कभी प्रायोजक बदलकर भी
खबरे सामने आती रहीं।
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मुद्दा सामने पड़ा था,
पर खबरची उसे छोड़ने पर अड़ा था।
क्योंकि कोई प्रायोजक पास नहीं खड़ा था।
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Saturday, March 13, 2010

साफ सुथरा इंसान-हिन्दी क्षणिकायें (saf suthara insan-hindi short poem)

आपस में जाम टकराते हुए लोग
नैतिकता की बात करने लग जाते हैं,
फिर सुनाते हैं अपनी कमाई के नुस्खे
जैसे दो नंबर की कमाई एक नंबर की हो
सीना फुलाकर उसकी कहानी सुनाते है।।

बहुत अच्छा लगता है
आदर्श और नैतिकता की बात करते हुए
बशर्त है आदमी स्वयं से छिप सकता हो।
वही कहलाता है साफ सुथरा इंसान
जो दूसरों पर इल्जाम लगाने में
कभी देर नहीं करता
पर बात अगर अपने पर आ जाये तो
जमाने का जिम्मेदार बताते हुए
अपना कसूर अपनी नज़र बचा सकता हो।

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क्रिकेट और फिल्म का घालमेल-हिन्दी हास्य कविता (combination of cricket and film-hind comic poem)

आशिक जूझ रहा था
क्रिकेट खिलाड़ी बनने के लिये
तो माशुका भी खड़ी थी
फिल्म अभिनेत्री बनने की पंक्ति में
कई उसने साक्षात्कार भी दिये।
बढ़ते जा रहे थे दोनों के कदम
इश्क के साथ
अपने लक्ष्य की तरफ भी सफलता के लिये।
पर आशिक की चिंतायें बढ़ रही थी
रौशन करना चाहता था वह अब
अपने घर में ही इश्क के दिए।
वह बोला माशुका से
‘अब तो मैं नामी खिलाड़ी बनने जा रहा हूं,
अपने रनों और विकेटों की बरसात में नहा रहा हूं,
पर डरता हूं
तुम्हारे और मेरे इश्क का क्या होगा
कहीं बिछड़ न जाये,ं
आओ अपना घर बसायें,
अपने अमर प्रेम के लिये।’
सुनकर बोली माशुका
‘क्यों घबड़ाते हो,
मैं भी सैट पर नृत्य करती हूं
जब तुम मैदान में रन बनाते होे,
हमारा बिछड़ना अब संभव नहीं,
फिल्म और क्रिकेट का
घालमेल हो गया है हर कहीं,
जब तुम नामी खिलाड़ी हो जाओगे,
मुझे भी बड़ी अभिनेत्री की तरह पाओगे,
कभी न कभी तुम्हारी भी लगेगी नीलाम बोली,
कोई टीम मैं भी खरीदूंगी
जिसमें समायेगी तुम्हारी भी टोली,
वैसे क्या रखा है दूल्हे की तरह बिकने में,
मजा है बिकाऊ क्रिकेट खिलाड़ी दिखने में,
दहेज का शब्द हो गया है बदनाम,
नीलामी में दूंगी तुम्हें ढेर सारे इनाम,
माल तो अपने ही घर आयेगा,
हर कोई देखकर जल जायेगा,
इश्क बाजी में कीर्तिमान बनाकर रख देंगे
आने वाली पीढ़ी के लिये।
लोग गायेंगे इश्क के साथ हमारी
दौलत के भी गीत,
नहीं देखी होगी किसी ने ऐसी प्रीत,
अभी घर संसार बनाकर
गुमनामी के अंधेरे में खोकर जिये
तो फिर क्या खाक जिये।’

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Monday, March 8, 2010

साधु और शैतान-हिन्दी हास्य कविता (sadhu aur shaitan-hindi comic poem)

गुरुजी ने अपने शिष्य को
उसके घर पहुंचने का संदेश भिजवाया,
तब वह बहुत घबड़ाया
अपनी पत्नी, बेटी और बहु से बोला
‘अरे भई,
बड़ी मुद्दत बाद वह वक्त आया
जब मेरे गुरुजी ने मेरे शहर आकर
घर पहुंचने का विचार बताया,
सब तैयारी करो,
स्वागत में कोई कमी न रह जाये,
इतने बड़े शिखर पर पहुंचा
उनकी कृपा से ढेर सारे फल पाये,
अब गुरु दक्षिणी चुकाने का समय आया।’
सुनकर बहु बोली
’लगता है ससुर जी आप न अखबार पढ़ते
न ही टीवी अच्छी तरह देखते,
आजकल के गुरु हो गये ऐसे
जो अपने ही शिष्यों के घरों की
महिलाओं पर कीचड़ फैंकते,
तौबा करिये,
बाहर जाकर ही गुरु दक्षिणा भरिये,
जवानी होती दीवानी,
बुढ़ापे में आदमी हो गुरु, हो जाता है रोमानी,
गेरुऐ पहने या सफेद कपड़े,
गुरुओं के चर्चित हो रहे लफड़े,
शैतान से बच जाते हैं क्योंकि
उससे बरतते पहले ही सुरक्षा
फिर वह पहचाना जाता है,
जरूरत है साधु से बचने की जो
शैतानी नीयत से आता है,
ऐसा मेरे पिता ने बताया।’

बहु के समर्थन में सास और
ननद ने भी अपना सिर हिलाया
तब ससुर बोले
‘चलो बाहर ही जाकर
उनके दर्शन करके आता हूं
पर तुम्हारी एकता देखकर सोचता हूं कि
किसे धन्यवाद दूं
साधु या शैतान को
किसने सास बहु और ननद-भाभी को
किसी विषय पर सहमत बनाया।’
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रात के पहर में-हिन्दी व्यंग्य कविता (raat ke pahah men-hindi satire poem)

जन्म लिया हिन्दी में
पढ़े लिखे अंग्रेजी में
आजाद रहे नाम के
गुलामी सिखाती रही आधुनिक शिक्षा।
अब कटोरा लेकर नहीं
बल्कि शर्ट पर कलम टांग कर
मांग रहे पढ़े लिखे लोग नौकरी की भिक्षा।
--------
आंखों से देख रहे पर्दे पर दृश्य
कानों से सुन रहे शोर वाला संगीत
नशीले रसायनों की सुगंध से कर रही
सभी की नासिका प्रीत,
मुंह खुला रह गया है जमाने का
देखकर रौशनी पत्थरों के शहर में।
अक्ल काम नहीं करती,
हर नयी शय पर बेभाव मरती,
बाजार के सौदागरों के जाल को
जमीन पर उगे धोखे के माल को
सर्वशक्तिमान का बनाया समझ रहे हैं
हांके जा रहे हैं भीड़ में भेड़ की तरह
दिन में सूरज की रौशनी में छिपे रहते
दिल का उजाला ढूंढते रात के पहर में।

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रिश्तों की कहानी-हिन्दी व्यंग्य कविता (ujde rishtton ki kahnai-hindi vyangya kavita)

अपनी दर्द भरी बातें
किसी को क्या सुनायें,
रोते लोगों क्या रुलायें,
सभी अपने गम छिपाने के लिये
दूसरों के घावों पर हंसने का
मौका ढूंढ रहे हैं।
अपने साथ हुए हादसों के किस्से
किसको सुनायें,
आखिर लोग उनको मुफ्त में क्यों भुनायें,
अपनी जिंदगी में थके हारे लोग
जज़्बातों के सौदागर बनकर
दूसरों के घरों के उजड़े रिश्तों की कहानी
बेचने के लिये घूम रहे हैं।

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Sunday, February 28, 2010

ब्लाग जगत पर होली व्यंग्य-हिन्दी लेख (hindi satire wrote on holi-hindi article)

नई दुनियां से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता ने होली के अवसर पर हिन्दी ब्लाग जगत पर व्यंग्य बाण छोड़कर सक्रिय ब्लाग लेखकों को लगभग स्तब्ध कर दिया है। उनके उस व्यंग्य आलेख की जानकारी इंटरनेट के ब्लाग लेखकों ने ही जारी की। जिन लोगों ने यह आलेख प्रस्तुत किये उनकी भाषा भी सहमी हुई लग रही थी। रखने वालों को यह भय था कि पता नहीं ब्लाग लेखकों पर इसकी क्या प्रतिक्रिया होगी और कहीं यहां उसे प्रकाशित करने के कारण ही कहीं कोपभाजन तो नहीं होना पड़ेगा। हमारे मित्र ब्लाग लेखकों इसे प्रस्तुत करते हुए अपनी भाषा इस तरह लिखी जैसे कि उनका तो इससे कोई लेना देना नहीं है बल्कि गुस्सा हैं।
हैरानी इस बात की है कि कुछ ब्लाग लेखक इस पर उत्तेजित हो गये और उन्हें लगा कि उन पर गंभीरता से प्रहार किया गया है-उन्होंने इस जवाबी तर्क भी प्रस्तुत कर दिये जैसे कि कोई गंभीर आलेख हो। दरअसल ब्लाग लेखक स्वयं ही आपस में होली स्वांग में रचाने में इतने व्यस्त हैं कि उनको यह अनुमान नहीं रहा कि कोई बाहर बैठा व्यक्ति भी इस होली पर उनके साथ बाहरी पिचकारी से ही रंग फैंकेगा।
श्री आलोक मेहता का यह आलेख सुबह एक ब्लाग पर देखा था और इंतजार था कि देखें इस प्रतिक्रियायें क्या आती हैं? कुछ ब्लाग लेखकों ने इस व्यंग्य का मंतव्य समझ लिया और अपनी टिप्पणियों में इस बात का उल्लेख किया कि यह एक व्यंग्य है।
प्रारंभ में जब हमने इस लेख को देखा तो ब्लाग लेखकों की तरह हम भी हैरान रह गये। जब व्यंग्य पूरा पढ़ा तब समझ में आया कि वास्तव में दूसरों पर कटाक्ष और प्रहार करने वाला हिन्दी ब्लाग जगत आज खुद भी निशाना बन गया। ब्लाग लेखकों को कुंठित, मठाधीश, भडासी और जाने कौन कौन सी व्यंग्य संज्ञााओं से नवाजा गया है।
उसमें यहां तक लिखा गया है कि ‘इन ब्लाग लेखकोें का लिखा एक शब्द भी अमेरिका और चीन का राष्ट्रपति तक नहीं मिटवा सकता। खासतौर से हिन्दी ब्लाग जगत के लेखकों का।’
इस व्यंग्यात्मक प्रहार को एक प्रशंसा भी समझा जा सकता है और गंभीर आलोचना भी।
उसमें ढेर सारी बातें हैं, उन प्रतिवाद रूप से गंभीरता से लिखा जा सकता था अगर वह एक निबंध होता तो? व्यंग्य के लिखे का प्रतिवाद तो यह कहकर ही हो सकता है कि इसमें अति प्रदर्शन किया गया है-वह भी तब जब किसी पर व्यक्तिगत रूप से आक्षेप हो जो कि इसमें नहीं है।
वैसे देखा जाये तो हिन्दी ब्लाग जगत पर किया गया यह व्यंग्यात्मक प्रहार पढ़ने वाले पाठकों की दिलचस्पी निश्चित रूप से हिन्दी ब्लाग लेखन में बढ़ेगी। ब्लाग लेखकों को एक बात समझना चाहिये कि हम जो इस समय प्रचार तंत्र देख रहे हैं वह नायक-खलनायक और समर्थक-विरोधी दोनों को साथ लेकर चल रहा है। दूसरा यह कि अनेक लोग तो प्रचार पाने के लिये अपने पर लिखवाते हैं। श्री आलोक मेहता ने व्यंग्य लिखकर खलनायक या विरोधी की भूमिका अदा नहीं की बल्कि यह बताया है कि हिन्दी ब्लाग जगत अब आकार ले रहा है और उस पर व्यंग्य लिखा जा सकता है। अस्तित्वहीन या लधु आकार के विषय व्यंग्य के लिये उपयुक्त नहीं होते। वैसे जिन ब्लाग लेखकों को लगता है कि यह मजाक गंभीर है तो भी उन्हें इस बात पर प्रसन्न होना चाहिये कि बैठे ठाले उनका विरोध कर उन्हें प्रसिद्धि दिलाने का काम एक प्रतिष्ठत लेखक ने मुफ्त में किया है नहीं तो अनेक बड़े लोगों को अपना विरोध कराने के लिये पैसे खर्च करने पड़ते हैं। श्रीआलोक मेहता ने किसी ब्लाग लेखक का नाम नहीं लिया और जिनका लिया वह काल्पनिक हैं-ताज्जुब है कि कुछ ब्लाग लेखक उनको सर्च इंजिनों में ढूंढने गये। वह जानते हैं कि अधिकतर ब्लाग लेखक मध्यमवर्गीय हैं और सार्वजनिक रूप से किसी का नाम लिखकर उनके लिये परेशानी पैदा न की जाये।
श्री आलोक मेहता को हम जानते हैं पर वह हमसे अपरिचित हैं। अलबत्ता उनको एक आम पाठक के रूप में पढ़ने के अलावा एक आम दर्शक के रूप में छोटे पर्दे पर भी देखते हैं। व्यंग्य तो केवल व्यंग्य है। अगर उसमें गंभीरता होती तो कोई तर्क देते। अच्छा व्यंग्य पढ़ने को मिला। जिन ब्लाग लेखकों ने इसे रखा उनकी प्रशंसा की जानी चाहिये। अप्रत्यक्ष रूप से इस व्यंग्य में ब्लाग लेखन की शक्ति का भी बखान किया गया है जिसे पढ़कर पाठकों की दिलचस्पी बढ़ेगी। वह इस बात को समझेंगे कि हिन्दी ब्लाग जगत ताकतवर हैं भले ही उसमें मसखरे भरे पड़े हों। अलबत्ता धीरे धीरे सभी जान जायेंगे कि यहां हर तरह के ब्लाग लेखक हैं। संभव है यहां लिखना शुरु करने वाले कुंठित लोग हों पर लिखते लिखते उनकी कुंठायें उनसे दूर चली जाती हैं और ब्लागिंग का नशा बाकी सारे नशों से भारी सिद्ध होता है। श्री आलोक मेहता को हम पढ़ते हैं पर वह हमें नहीं पढ़ते। वरना अपने ब्लाग पर उनके लिये होली के अवसर पर नाम लेकर बधाई संदेश देते। अलबत्ता ब्लाग लेखकों और पाठकों को इस होली पर हार्दिक बधाई। इस व्यंग्य पर जितना दुःख था उसे बाहर निकाल फैंके और स्वयं भी ऐसे ही व्यंग्य लिखें जिससे किसी को दुःख न पहुंचे और जिस पर लिखा जाये वह स्वयं भी प्रसन्न हो। हमें यह व्यंग्य अच्छा लगा।
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Sunday, February 21, 2010

प्यार और तोहफा-हिंदी व्यंग्य शायरी (ishq aur tohfa-hinci satire poem)

अब प्यार जताने का सिलसिला
तोहफों से चलने लगा है,
इसलिये आदमी तोहफे देकर
हर इंसान प्यार खरीदने लगा है।

तोहफों की कीमत जितनी बढ़ेगी,
प्यार की ऊंचाई भी उतनी लगेगी,
नजरों का दोष है कि दिल का
प्यार जाहिर करने की ख्वाहिशों के आगे
हर तोहफा सस्ता लगने लगा है,
मगर मजबूरी है
बिना तोहफे के प्यार खाली लगने लगा है।

मुश्किल यह है कि
प्यार दिखाने के लिये तोहफा खरीदने वास्ते
कब तक पतंग की तरह
इधर उधर उड़ते रहें,
कीमत चुकाने के लिये
कमाने के दर्द कब तक सहें,
सरलता से किया जाने वाला प्यार
तोहफों के जाल में फंसने लगा है।


कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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खूबसूरती की दौड़ में-हिन्दी हास्य कवितायें (hindi comic poem)

क्रीम पाउडर से सजे चेहरे
सौंदर्य का पर्याय बन गये हैं,
भयानक चेहरे भी
खूबसूरती की दौड़ में भागने के लिये बनठन गये हैं।
-----------
न राई थी, न पहाड़ था,
न तिल था, न ताड़ था,
फिर भी वह ख्वाब बेचकर
सौदागरों ने पैसा कमाया।
इसतर बड़े ठग ने
छोटे पर रुआब जमाया।
कौन करेगा फरियाद,
सभी दे रहे एक दूसरे को दाद,
न अच्छे रास्ते पैसा मिला
न अच्छी जगह गंवाया।
-----------
अब यह प्रश्न न पूछना कि
हर शाख पर उल्लू बैठा है
अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा।
उजड़े चमन में
बिगड़े लोगों के वतन में
बरबादी का मंजर चारों तरफ है
अब तो प्रश्न यह है उल्लूओं का क्या होगा?

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वहम-हिन्दी क्षणिकाऐं (vaham-hinci comic poem)

विदुषकों के विद्वान और
नर्तकों के देवता होने का वहम
पूरे ज़माने को हो गया है,
झूठ के सहारे खड़ा है दौलत का महल,
इज्जत पाने के लिये, होने लगी सौदे की पहल,
ईमान सभी का सो गया है।
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सर्वशक्तिमान ने दाने दाने पर लिखा है
खाने वाले का नाम
न मिलने पर उसका क्या दोष
अगर बंद हो गोदाम।

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अपने बताये रस्ते पर चलें,ऐसे लोग कम हैं-हिंदी व्यंग्य कविता (few men in world-hindi comic poem)

सभी को बताये रास्ते पर खुद चलें, ऐसे लोग कम हैं।
दूसरे को सिखायें दांवपैंच, जो अजमाने में खुद बेदम हैं।।
हवा के झौंके से कांपने लगता है पूरा उनका बदन,
जमाने को डरपोक बतायें, अपनी बहादुरी के उनको वहम हैं।।
दूसरों की रौशनी में चले हैं पूरी जिंदगी का रास्ता,
दीपक और मशाल जलायें रोज, ऐसे लोग कम हैं।।
सह नहीं पाते दूसरे की खुशी, दुखी हो जाते हैं,
अपने मतलब की राह चले हैं वह, जहां ढेरों गम हैं।
तलवारें और ढाल थामें हैं चारों ओर लोग
कलम से शब्द लिखकर अमन लायें, ऐसे लोग कम हैं।
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Sunday, February 7, 2010

ज्ञानी और ईमानदारी-हिन्दी व्यंग्य कवितायें



दिन भर वह दोनों ज्ञानी

अपने शब्दों की प्रेरणा से

लोगों को लड़ाने के लिये

झुंडों में बांट रहे थे,

रात को ईमानदारी से

लूट में मिले सामान में

अपना अपना हिस्सा

ईमानदारी से छांट रहे थे।

-------

शब्द रट लेते हैं किताबों से,

सुनाते हैं उनको हादसों के हिसाबों से,

पर अक्लमंद कभी खुद जंग नहीं लड़ते।

नतीजों पर पहुंचना

उनका मकसद नहीं

पर महफिलों में शोरशराबा करते हुए

अमन की राह में उनके कदम

बहुत  मजबूती से बढ़ते।


कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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चिल्लाने की बारी -हिन्दी व्यंग्य कविता (hindi comic satire poem)

भ्रष्टाचार,

अत्याचार

और व्याभिचार को भी

जाति, भाषा और धर्म के नाम पर

बांटने की कोशिश जारी है,

अक्लमंद दिखाते हैं बहादुरी

अपने अपने हिस्से की शिकायतें उठाने में

शब्द खर्च करते

दूसरे की कमियां गिनाने में

हर हादसे पर देखते हैं बस यही कि

किसके चिल्लाने की बारी है।

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कला, मनोरंजन, शायरी, शेर, समाज, हिन्दी साहित्य

Sunday, January 17, 2010

शांति और वफादारी-हिन्दी शायरी (shanti aur vafadari-hindi shayri)



भीड़ में एकता की कोशिश पर

हंसी आ ही जाती है।

जहां पहले ही

चीख रहे हैं लोग

अपनी करनी का बखान करते हुए

बंद किये हैं कान,

आंखों  से ढूंढ रहे अपने लिये सम्मान,

वहां शांति के नारे की आवाज

शोर करती नजर आती है।

-------

वफादारी 

खामोश जज़्बात के साथ बह जाती है।

गद्दारी के घाव से पैदा आह

दिल से निकलकर

जुबान पर आकर चीखती

तब सनसनी फैल जाती है।

यही वजह है

नाम कमाने के लिये

गद्दारी ही सभी को भाती है।

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Sunday, January 3, 2010

आशिक माशुका ब्लागर और नववर्ष-हिन्दी हास्य कविता (love couple blogger and new year-hindi hasya kavita)



आशिका और माशुका ने मिलकर

अपने एकल और युगल ब्लाग पर

खूब पाठ लिखे,

कभी सप्ताह भर तो

कभी माह बाद दिखे

साल भर कर ली जैसे तैसे लिखाई।
दोनों अपने एकल ब्लाग पर दिखते थे,

साल के नंबर वन के ब्लागर का

खिताब पाने की दोनों को ललक थी

पर कहीं सामुदायिक ब्लागर पर भी

दाव चल जाये इसलिये

युगल ब्लाग भी लिखते थे,

कभी प्यार तो, कभी व्यापार पर तो,

कभी नारीवाद पर भी की खूब लिखाई।
जैसे तैसे वर्ष निकला

नव वर्ष के पहले दिन ही

सुबह आशिक ब्लागर ने

माशुका के फोन की घंटी बजाई।

नींद से उठी माशुका ने भी ली अंगड़ाई।

उधर से आशिक बोला

‘नव वर्ष की हो बधाई’,

माशुका ने बिना लाग लपेटे के कहा

‘छोड़ो सब यह बेकार की बात

यह तो ब्लाग पर ही लिखना,

अब तो नंबर वन के लिये कोशिश करते दिखना,

बहुत जगह बंटेंगे पुरस्कार

इसलिये तुम मेरा ही नाम आगे करना,

मैंने दूसरे लोगों से भी कहा है

वह भी मेरे लिये वोट जुटायेंगे

लग जाये शायद मेरे हाथ कोई इनाम

जब लोग लुटायेंगे,

वैसे तुम अपने नाम की कोशिश मत करना

क्योंकि हास्य कविताओं के कारण

तुम्हारी छवि अच्छी नहीं है

तुम्हारा मन न खराब हो

इसलिये तुम्हें यह बात नहीं बताई।’
आशिक बोला-

‘अरे, यह क्या चक्कर है

मैंने तुम्हें पास से कभी नहीं देखा

फोटो देखकर ही पहचान बनाई,

अब तुम कैसी कर रही हो चतुराई।

क्या इसी नंबर वन के लिये

तुमने यह इश्क की महिमा रचाई।

मैं लिखता रहा पाठ पर पाठ

तुमने वाह वाह की टिप्पणी सजाई।

अब आया है इनाम का मौका तो

मुझे अपनी औकात बताई।

वैसे तुमने भी क्या लिखा है

सब कूड़े जैसा दिखा है

शुक्र समझो मेरी टिप्पणियों में बसे साहित्य ने

तुम्हारे पाठ की शोभा बढ़ाई।

अब मुझे अपना हरकारा बनने के लिये

कह रहे हो

तुम ही क्यों नहीं मेरा नाम बढ़ाती

करने लगी हो मुझसे नंबर वन की लड़ाई।’
सुनकर माशुका भड़की

‘बंद करो बकवास!

तुमसे अधिक टिप्पणियां तो

मेरे ब्लाग पर आती हैं

तुम्हारी साहित्यक टिप्पणियों पर

मेरी सहेलियों ने मजाक हमेशा उड़ाई।

वैसे तुम गलतफहमी में हो

तुम जैसे कई पागल फिरते हैं अंतर्जाल पर

मैंने सभी पर नज़र लगाई।

एक नहीं सैंकड़ों मेरे नंबर वन के लिये लड़ेंगे

सभी तमाम तरह से कसीदे पढेंगे,

तुम अपना फोन बंद कर दो

भूल जाओ मुझे

तुम्हारे बाद वाले का  भी फोन आयेगा

वही मेरी नैया पार लगायेगा

तुम चाहो तो बन जाओ भाई।’
माशुका ब्लागर ने फोन पटका उधर

 इधर आशिक ब्लागर  आसमान की तरफ

आंखें कर लगभग रोता हुआ बोला

‘हे सर्वशक्तिमान यह क्या किया

इश्क  रचा तो  ठीक

पर नववर्ष की परंपरा क्या बनाई,

जिससे  इश्क में मैंने पाई विदाई।।


 

नोट-यह एक काल्पनिक हास्य कविता मनोरंजन की दृष्टि से लिखी गयी है। इसक किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है। किसी की कारिस्तानी से मेल हो जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा।
 
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इश्क का खेल, सम्मान की ज़ंग-हास्य कविता (play of lave and war for prize-hindi hasya kavita)

यह पेज
 नये वर्ष के अवसर पर

शहर के नंबर वन

आशिक माशुका के जोड़े को

चुनकर उसे सम्मानित करने की

खबर बड़े जोर से एक महीन पहले ही छाई।

ग्यारह महीने से जो मजे उठा रहे थे

ब्रेिफक्र होकर,  प्यार के मौसम में

सभी की नींद सम्मान ने उड़ाई।

कुछ आशिकों का शक था

अपनी माशुका के साथ इनाम मिलने का,

कुछ माशुकाओं को भी विश्वास नहीं था

अपने जोड़दार के साथ

अपना नाम का फूल शहर में खिलने का,

सभी अपने इश्क के पैगामों में

लिखने वाले संबोधन बदल रहे थे,

जो एक समय में रचाते थे कई प्रसंग

एक  इश्क के व्रत में बहल रहे थे,

प्रविष्टी भरने के अंतिम दिन तक

सभी रच रहे थे

फार्म में भरने के लिये अपने इतिहास,

कुछ गमगीन हो गये तो कुछ करने लगे परिहास,

इश्क करने वाले आशुक बन गये योद्धा,

माशुकायें बन गयीं, संस्कारों की पुरोधा,

दे रहे थे सभी एक दूसरे को नर्ववर्ष की बधाई,

पर अंदर ले रहे थे, जंग के लिये अंगराई।
नये साल में पिछले एक वर्ष के

आशिक माशुका के जोड़े को

इनाम देने के नाम पर चली

इश्क की जंग में 

उथल पुथल से कई दिल टूटे

कहीं माशुका तो कहीं आशिक रूठे,

नहीं रहा कोई रिश्ता स्थाई।
एक दिन प्रतियोगिता के स्थगित

होने की खबर आई।

पता चला युवा आयोजक की पुरानी माशुका ने

अपने नये आशिक के साथ

प्रतियोगिता के लिये अपनी प्रविष्टी दर्ज कराई,

कर ली थी जिसने उसके दुश्मन से सगाई।

नयी माशुका  की एक सहेली को

छोड़ गया था उसका आशिक

उसने भी उसके यहां गुहार लगाई।

नयी माशुका  ने सार्वजनिक रूप से

इस नाटक करने पर कर दी

युवा आयोजक की ठुकाई।

टूट गया वह, उसने बंद कर दिया यह सम्मान

पर शहर में जहां जहां खेला जाता था

इश्क का खेल

सभी जगह जंग के मैदान में नज़र न आई।


नोट-यह एक काल्पनिक हास्य कविता मनोरंजन की दृष्टि से लिखी गयी है। इसक किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है। किसी की कारिस्तानी से मेल हो जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा।
 
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Saturday, December 26, 2009

बड़े लोगों की बड़ी बातें-हिन्दी व्यंग्य कविताएं (matter of top class men-hindi satire poem)

बड़े लोगों की होती है बड़ी बातें।

छोटा तो दिन में भी

छोटी शर्म का काम करते भी घबड़ाये

बड़ा आदमी गरियाता है

गुजारकर बेशर्म रातें।।

----------

छोटे आदमी की रुचि

फांसी पर झूले

या लजा तालाब में डूबे

बड़ा आदमी अपनी रातें गरम कर

कुचलता है कलियां

फिर झूठी हमदर्दी जताये।

बड़े आदमी की विलासता भी

लगाती उसके पद पर ऊंचे पाये।

---------

हर जगह बड़े आदमी की शिकायत

बरसों तक कागजों के ढेर के नीचे

दबी पड़ी है।

छोटे की  हाय भी

उसके बीच में इंसाफ की उम्मीद लिये

जिंदा होकर सांसें अड़ी है।

बड़े लोग हो गये बेवफा

पर समय की ताकत के आगे

हारता है हर कोई

हाय छोटी है तो क्या

इंसाफ की उसकी उम्मीद बड़ी है।



 


कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप

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Tuesday, December 22, 2009

ज़माने के दर्द के साथ-हिंदी शायरी (zamane ke dard ke saath-hindi shayri)

 कागज़ की उपाधियों से
पूरा घर  सजा दिखता हो
गर आदमी बेचने वाले अल्फाज़ लिखता हो.
खुद के साथ ज़माने के दिल को तसल्ली दे
मुश्किल होता है ऐसा लिखना
दर्द अपना चेहरे पर न आये
मुश्किल होता है ऐसा बेदर्द दिखना
बह जाए महफ़िलों में वाह वाह की दरिया के साथ
एक दिन बह जाएगा का उसका नाम भी
नाम उसका ही रौशन रहेगा
जो जमाने के दर्द के साथ खुद टिकता हो..
 
कवि लेखक और सम्पादक - दीपक भारतदीप,ग्वालियर
 

Wednesday, November 18, 2009

दिल के भाव-हिंदी कविता (dil ke bhav-hindi kavita)

 
कभी गम तो कभी खुशी
कभी दर्द तो कभी हँसी के साथ
कविता लिखने का ख्याल किया
तब भाषा सजाने के साथ  
शब्द को जोर से बजाने का सोच  नहीं आया.
कोशिश की रस के रंग दिखाने 
और   अलंकार से कविता  सजाने की 
मिले जिससे भाषा विद्वान की उपाधि 
तब कविता को अपने दिल के  भाव से दूर पाया..
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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