हिंदी मित्र पत्रिका

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Saturday 11 May 2013

आकाश में उड़ते लोग -हिन्दी कविता (akash mein udte log-hindi kavita

आकाश में उड़ते लोग -हिन्दी कविता
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पैसा, प्रसिद्धि और पद के पंख लगाये
उड़ते इंसान
आपसी समझौते में
आकाश बांट लेंगे,
जन्नत के फरिश्तों पर जमाये हैं नज़र
अपने लिये जगह वहां भी छांट लेंगे।
कहें दीपक बापू
जमीन पर रहने वाले हर जीव को
समझते हैं वह कीड़ा
फिर भी उठाये हैं
ज़माने के भले का बीड़ा,
मुंह एक है पर जुबान का क्या
हर पल भाषा और शब्द बदल जाते हैं,
कहीं वह सिर झुकाते
कहीं कुचल जाते हैं,
ऊंची उड़ान पर ऊंचे इरादे उनके
मतलब के लिये
जमीन पर आते,
अपनी उड़ानों का हिसाब गिनाते,
जन्नत के सुख के लिये मरना जरूरी है
यह समझाओ तो वह डांट देंगें।
दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’
ग्वालियर मध्यप्रदेश

Wednesday 17 April 2013

लफ्जों के सौदागर-हिन्दी शायरी (lafzon ke saudagar-hindi shayari)

हमने की थी फरियाद
अपने हालातों की
वह सुधारने  वादा देकर चल दिये,
उनके कान और आंख ढूंढ रहे थे कोई कहानी
सोचते हैं हमने क्यों न अपने होंठ सिल लिये।
कहें दीपक बापू
मांगी थी हमने अपने दर्द की दवा
जगह जगह हमारी कहानी सुनाकर
बनाने लगे वह अपनी हवा,
अपना दर्द अकेले झेलना आसान था,
उनके इशारे पर भीड़ बहुत आयी
हमारे दरवाजे पर तमाशा देखने
न उसमें कोई हमदर्द मेहमान था,
हैरान हैं हम
लफ्जों के सौदगरों की बाज़ीगरी देखकर
भला करने का वादा करते
पर पूरा कभी किया नहीं
फिर भी लोग जला रहे हैं
उनके सामने धी के दीये।
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Friday 29 March 2013

बदलाव के नारे-हिन्दी कविता (badlav ke nare-hindi poem)


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जमाने को बदल देने का नारा
वह रोज  सुनायेंगे,
कुछ गीत और गजलें
बस यूं ही  गुनगुनायेंगे।
कहें दीपक बापू
खुद कभी बदलने का प्रयास करते नहीं,
नियमों की जंजीरों से बंधें उनके हाथ
लाचारी जताते
वादे करते कभी नहीं थकते
किसी की झोली आस से भरते नहीं,
बहता रहेगा समय अपनी चाल से
लोग भूलेंगे, उनके घर भरेंगे माल से
इसी तरह वह नारों को हमेशा भुनायेंगे।

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
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Sunday 24 February 2013

किराये पर मिली खुशी जोश नहीं देती-हिन्दी कविता (kiraye par milee khushi josh nahin dete-hindi poem)

कमजोर  नीयत
जुबां से मजबूत लफ्ज
बाहर आने नहीे देती,
खराब ख्याल में डूबें हों
कोई तस्वीर आंखों में गहराई नहीं लेती
कहें दीपक बापू
दुनियां तो अपने ही  दिल का खेल है
जब तक खेलें हम खुद
सब ठीक है
खिलाने लगे कोई दूसरा
तब अपनी ही इंसानी सोच
मुर्दा जैसी शक्ल लेती।
कीमत पर मिली खुशी
जिंदगी को कोई जोश नहीं देती।
लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, Madhya pradesh
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
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Saturday 23 February 2013

बेहतर लेखन के लिये पढ़ना और प्रभावी वार्तालाप के लिये सुनना जरूरी-विशिष्ट रविवारीय हिन्दी लेख (behtar lekhan ke liye padhna aur prabhavi vartalap ke liye sunna jaroori-vishisht ravivariya hindi lekhj)

                     अनेक लोगों का मन करता है कि वह कुछ लिखें।  कुछ लोग शेरो शायरी कर दूसरे को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। कुछ लोग अंग्रेजी कहावतों को सुनाकर यह कोशिश करते हैं कि सामने वाला आदमी उनकी बुद्धि का लोहा माने।  वैसे अपनी बात कहने में तुलसीकृत रामचरित मानस  का अध्ययन करने वालों का जवाब नहीं है।  खास अवसरों पर वह उसके दोहे सुनाकर अपने गहन अध्ययन को प्रमाणित कर देते हैं पर उसमें उनका स्वरचित कुछ नहीं होता।  समाज पर प्रभाव तो वही डाल सकता है जो स्वयं रचनाकार हो।  वैसे आजकल शेरो शायरी कर अपनी बात का प्रभावपूर्ण ढंग से कहने का रिवाज चल पड़ा है पर यह हमारे पारंपरिक वार्तालाप का कोई स्थाई भांग नहीं है। कई विषयों पर कबीर, रहीम और तुलसी की रचनायें इतना प्रभाव रखती हैं कि उनके उद्धरण उर्दू की शायरी से बेहतर प्रभावी रहते हैं।  इन सबके बावजूद यह सच्चाई है कि आदमी का मन स्वरचना की अभिव्यक्ति के लिये तड़पता है।  लिखना और बोलना  सहज लगता है   पर वह उनके दूसरे को मस्तिष्क और हªदय को अंदर तक प्रभावित कर दे ऐसी बात लिखना  या बोलना आसान नहीं है। प्रभावी लेखन और वार्तालाप के लिये आवचश्यक है कि हम दूसरे का लिखा धीरज से पढ़ें और कही गयी बात सुने।
          ब्लॉग लेखन के प्रारंभिक दौर में अनेक पाठकों ने हमसे पूछा कि आप इतना लिख कैसे लेते हैं? इसका सीधा जवाब तो यह था कि हम पढ़ते बहुत हैं पर किसी को दिया नहीं!  सोचते कि अपने हर राज को बांटना जरूरी नहीं है।  सच्चाई यह है कि   जितना ज्यादा पढ़ोगे उतना ही ज्यादा लिखोगे।  जितना अच्छा सुनोगे उतना अच्छा बोलोगे।  तय बात है कि अपनी प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति के लिये पुस्तक प्रेम और बेहतर संगत का होना जरूरी है।  मूर्खों में बैठकर गल्तियां न करना सीखा जा सकता है पर बुद्धिमानों की संगत में बिना गल्तियां किये काम करने की  मिलने वाली प्रेरणा ही असली ही शक्ति होती है।
         इधर जब फेसबुक पर अपने निजी तथा सार्वजनिक संपर्क वाले लोगों को देखते हैं तो उनके अंदर अपनी अभिव्यक्ति की कभी शांत न होने वाली भूख साफ दिखाई देती है।  उनके पास कंप्यूटर और इंटरनेट की सुविधा है। उन्होंने फेसबुक पर खाते खोल लिये हैं।  मोबाइल से फोटो खींचकर उसमें डाल देते हैं।  दूसरे की पठनीय और दर्शनीय सामग्री अपने फेसबुक पर लाने के लिये उन्हें शेयर करना पड़ता है।  कई लोग तो ऐसे हैं जो शेयर करते समय एक शब्द भी नहीं लिखते। लिखते भी है तो रोमन में हिन्दी लिखकर अपनी भूख शांत करते हैं।  ऐसे में उनकी अभिव्यक्ति की भूख साफ दिखती है। भूख और प्यास की व्याकुलता हमने स्वयं भी झेली है पर खुशी होती है यह देखकर अभिव्यक्ति के लिये कभी तड़पना नहीं पड़ता।  हिन्दी और अंग्रेजी टाईप का शैक्षणिक काल में ज्ञान प्राप्त किया और तीस वर्ष पहले कंप्यूटर से ही अपनी जिंदगी शुरु की थी।  इसलिये वर्तमान समय में बिना हिचक इंटरनेट पर लिख लेते हैं।  लिखने के विषय का टोटा नहीं रहा पर अध्यात्मिक विषयों की पुस्तकें पढ़कर चिंत्तन लिखते हुए जीवन का ज्ञान स्वतः ही आता रहा।  हमारे अध्यात्मिक विषयों पर लिखे गये पाठों को देखकर पाठक सोचते हैं कि यह कोई पुराना ज्ञानी है पर सच्चाई यह है कि लिखते लिखते ही बहुत सारा ज्ञान आ गया है।
     इस ज्ञान साधना ने जीवन के प्रति विश्वास दिया पर व्यंग्य विद्या कोे छीन लिया।  अनेक बार व्यंग्य लिखने का मन करता है पर कहीं न कहीं ज्ञान उसमें बाधा बन जाता है।  व्यंग्य विषय गंभीरता के रंग में डूब जाता है।  अपने ही बचपन गुजारने के बाद जवानी में परे हुए लोगों के फेसबुक देखते हैं।  उनको हम ढूंढते हैं पर वह भुलाये बैठे है।  हम उनके पास अपने मित्र बनने का कोई प्रस्ताव नहीं भेजते।  इसका कारण यह है कि अनेक बार वह हमारे व्यंग्यों और चिंत्तनों का हिस्सा बने हैं।  दूसरी बात यह कि हमारे लेखकीय और पाठकीय संस्कारों से न उनका कोई वास्ता है और न ही हमारी इच्छा है कि वह हमसे बिना हृदय के फेसबुक से  जुड़ें।
          हम अपने उन बिछड़े लोगों का एबीसी समूह बनाकर बात करते हैं। इनमें हम बी नाम से हैं।   हम अपने ही शहर में रहे पर ए और सी बाहर जाकर बसे हैं।  इंटरनेट पर फुरसत के समय बहुत दिन तक  ए नाम के व्यक्ति का फेसबुक ढूंढा पर मिला नहीं।  अब दो महीने उन्होंने बनाया तो हमारे दृष्टिपथ में आ गया। सी की स्थिति यह थी कि उनकी पत्नी का फेसबुक  मिला। उन पर सी का फोटो क्या  नाम तक नहीं था।  चेहरे से पहचाना कि यह जान पहचान वाली भद्र महिला है।  परसों  उस पर  सी का फोटो देखने को मिला।  अपनी बेटी और दामाद के साथ सी और उसकी पत्नी ने फोटो खिंचवाया और फेसबुक  पर डाला।  ए और उसके  बेटे और बहु का फेसबुक रोज देखते हैं।
      उस दिन ए का फोन बहुत दिन बाद आया।  उसे किसी दूसरे आदमी का फोन नंबर चाहिये था।  उस समय उसके बेटे के फेसबुक को ही देख रहे थे जो अधिक सक्रिय है।  हमने उसे नहीं बताया कि क्या कर रहे हैं।  संभावना यह  भी है कि सी से भी अगले सप्ताह उसके शहर आने पर मुलाकात होगी पर उससे फेसबुक की चर्चा बिल्कुल नहीं करेंगे।  दरअसल इसका कारण यह है कि हमारा लिखा देखकर लोग पूछते हैं कि इसका तुम्हें मिलता क्या है?
     यहां हम स्वयं को ही प्रभाहीन अनुभव करते हैं।  यह कहते हुए शर्म आती है कि हम फोकटिया हैं। लिखने का अभ्यास इतना है कि एक हजार शब्दों का लेख हम बीस मिनट में सोचते हुए लिख देते हैं।  यह सहज इसलिये होता है कि हमारी दृष्टि हमेशा समय मिलते ही पठनीय सामग्री पर चली जाती है।  यह आवश्यक है कि उसे देखकर ही हम कुछ लिखें पर कहीं न लिखने की प्रेरणा उससे ही मिलती है।  ए और सी के साथ  उनके परिवार  के सदस्यों के फेसबुक देखकर लगता है कि हम भाग्यशाली हैं कि लिखने की शक्ति मिली है।  हालांकि इसमें अच्छा पढ़ने और सुनने का भी योगदान है।
लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, Madhya pradesh
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Monday 28 January 2013

अपना निष्कर्ष-हिंदी कविता (apna nishkarsh-hindi kavita or self dicision-poem)

चिंत्तन  कुछ यूं भटक गया है,
जिस रास्ते हम चले
वही है यह
तय नहीं कर पा रहे
लगता है कभी कभी
नहीं तय हो रही दूरी
लक्ष्य ही शायद आकाश में अटक गया है।
कहें दीपक बापू
महाबहसें सुनते सुनते
बुद्धि हो जाती कभी कभी कुंद
दूसरों की सोच सुनते सुनते
लगता है यूं
अपना निष्कर्ष ही कहीं टपक गया है।

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लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, Madhya pradesh
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
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Saturday 5 January 2013

मोमबत्तियों से हमदर्दी-हिन्दी कविता (mombattiyon se hamdardi-hindi kavita)


हादसों पर मोमबत्तियां जलाकर
मातम मनाओ
बच्चों को यह सिखा दिया,
सामाजिक है हम लोग
सारे संसार को दिखा दिया।
कहें दीपक बापू
सड़क पर कराहता कोई घायल,
नहीं सुनता कोई चीख
डरते हैं सभी कोई मदद की न मांगे भीख,
मुंह फेर जाते हैं देखने वाले,
लगाकर अपनी सोच पर ताले,
ज़माने पर लगता है मतलबपरस्ती का आरोप
रौशनी से चकाचौंध सड़क पर
यूं मोमबत्तियां जलाकर
जख्मों से हमदर्दी जता रहे है,
सर्दी में अपने शरीर को सता रहे हैं,
रोने में हम भी नहीं किसी से कम
दुनियां को यह बता दिया,
न हल्दी लगे न फिटकरी
रंग आयेगा चोखा
यह नयी पीढ़ी को अच्छी तरह सिखा दिया।


लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, Madhya pradesh
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
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