Tuesday, August 16, 2016

मौसम और मन के मिजाज-हिन्दी कविता (mausa aur man ki Mijaj-HindiPoem)


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साथ चलते इंसान
परिंदों की तरह उड़ गये।
उनकी यादों ने
कुछ देर परेशान किया
फिर नये राही जुड़़ गये।
कहें दीपकबापू हम भी
खड़े देखते रहे
मौसम और मन के मिजाज
धूप से लड़ने की ठानी
कभी छांव की तरफ भी मुड़ गये।
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जीवन पथ परसहयात्री की खोजआंखे करती हैं।बहुत नरमुंड मिलतेउनकी इच्छायें ही साथीहमेशा आहें भरती हैं।कहें दीपकबापू याद मेंकिसे बसाकर अपना दिल बहलातेहृदय की भावनायेंनयी चाहत पर मरती है।--------------

भिखारी और राजा-हिन्दी कविता (King and begger-Hindi Poem)


वह भिखारी मंदिर के बाहर
चप्पल के सिंहासन पर बैठा
पुण्य क्रेता ग्राहक की
प्रतीक्षा में बैठा
आनंदमय दिखता है।

वह बादशाह महल में
सोने के सिंहासन पर
प्रजा की चिंता में लीन
असुरक्षा के भय से दीन
चिंतामय दिखता है।

कहें दीपकबापू मन से
बनता संसार पर नजरिया
आंखों से केवल दृश्य दिखता है।
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धरती पर स्वर्ग-हिन्दी कविता
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मतलब की बात
जल्दी सुनते
वरना बहरे हो जाते हैं।

डराते जो ज़माने को
खौफ में जीते वह भी
उनके घर खड़े पहरे हो जाते हैं।

कहें दीपकबापू सरलता से
जीवन बिताने की आदत
बना देती धरती पर स्वर्ग
चालाक अंदाज से
दुश्मन गहरे हो जाते हैं।
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Thursday, July 28, 2016

सोच और कदम-हिन्दी शायरी (Soch aur Kadam-HindiShayri)

अपनी जिंदगी हंसीन
बनाने के लिये
कवायद करनी पड़ती है।

यकीन करो 
वही आता आंखों के सामने
अपनी नज़रे जो गढ़ती हैं।

कहें दीपकबापू नजरिये से
दोस्त या दुश्मन बनते
उस मंजिल की तरफ जाते
इंसान के कदम
सोच जहां बढ़ती है।
‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘

Sunday, July 17, 2016

अपने घर के असुर को भी देव माने-दीपकबापूवाणी (Apane Ghar ke Asur ko Bhi Dev Mane-DeepakBapuwani)

दिन भर करें आदर्श की बात, शराब के जाम टकराते पूरी रात।
‘दीपकबापू’ चरित्र के वकील, सही दाम मिले तो देते हैं लात।।
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बदलने निकले समाज की तस्वीर, चंदे बटोरते हुए शब्दों के वीर।
‘दीपकबापू’ हिसाब देने से सदा बचते, तख्तों पर जाकर बैठते पीर।।
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दिन में हमदर्दी के नारे सेवक बांटते, रात आपस में जाम टकराते हैं।
‘दीपकबापू’ सेवा बना दी बड़ी कला, चंदे की चाल से लोग चकराते हैं।
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सड़क पर घूम रहा हादसे का डर, अक्ल के अंधे छोड़ चुके घर।
‘दीपकबापू’ अक्ल चौपाये जैसी हुई, चौपाये पर सवार हुए निडर।।
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दिखाने की कर रहे सभी भक्ति, संसार के सामानों में फंसी आसक्ति।
‘दीपकबापू’ बिखरा मन लिये फिरते, खाली बाहें नचाकर दिखाते शक्ति।।
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अपने घर के असुर को भी देव माने, बाहर भले मानस पर कसते ताने।
‘दीपकबापू’ अपराध से फेरें आंख, जब तक आते अपने भंडार में दाने।।
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हर कोई अपने ही काम में लगा है, काम के लिये ही हर कोई सगा है।
‘दीपकबापू’ स्वार्थ में बिताते जीवन, हर कोई पाखंड में सोता जगा है।।
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Thursday, June 30, 2016

स्वयं पर अपना अत्याचार-हिन्दी व्यंग्य कविता (Swyan par apna Atyachar-Hindi Satire Poem)


इंसान के दिल में
हर पल भय का
भूत समाया रहता।

बेचैनी का दरिया
देह की रक्त शिराओं में
हर पल बहता।

कहें दीपकबापू ज्ञान से
भागता पूरा ज़माना
स्वयं पर अपना अत्याचार
हर पल सहता।
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Wednesday, June 15, 2016

यही शर्त होती है-हिन्दी व्यंग्य कविता(Yahi Shart Hoti hai-HindiSatirePoem)


मुश्किल सवाल न करना
महफिल में आने की
यही शर्त होती है।

अपने गिले शिकवे दूर रखना
सद्भाव दिखाने के लिए दिल से
यही शर्त होती है।

कहें दीपकबापू अक्ल से
चला रहे जमाना
डरपोक लोग
बात करते जंग की
छिपने के लिये महल मिले
यही शर्त होती है।
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Wednesday, June 1, 2016

किताबी कीड़े चेतना लाने में लगे हैं-दीपकबापूवाणी (Kitabi kide chetan lane lage-DeepakBapuWani)

बुद्धि से अपढ़ भी मशहूर हो जाते, ज्ञानहीन शिक्षित अक्षर में चूर हो जाते।
‘दीपकबापू’ अपने लिये सब पा लिया, वही घमंड के सवार सबसे दूर हो जाते।।
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दंगल में कभी पहलवान जीते कभी हारे, वहां खड़े दर्शक मनोरंजन के मारे।
‘दीपकबापू’ खरीद लेते हैं कभी जीत भी, जश्न मनाते वह भी जो कुश्ती हारे।।
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किताबी कीड़े चेतना लाने में लगे हैं, धरती पर स्वर्ग लाने के लिये जगे है।
‘दीपकबापू’ सारी सुविधायें लपक ली, मददगार बेबसों से चंदा बटोर ठगे हैं।।
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मदहोशी में सभी लोग होते बदहाल, होश में भी चल जाते टेड़ी चाल।
‘दीपकबापू’ कर्म की चिंता नहीं करते, नाकामी पर बनायें भाग्य की ढाल।।
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हृदय की पीड़ा सभी स्वयं जाने, भीड़ में ढूंढे नहीं मिलते कभी सयाने।
बुद्धिमान छोड़ देते वह जगह, ‘दीपकबापू’ जहां पत्थर जैसे तर्क ताने।।
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उगते सूरज से उठती हृदय में आशा, डूबते हुए आये अंधेरे से निराशा।
सब्र से पाया मन में आंनद का हीरा, ‘दीपकबापू’ जब परिश्रम से तराशा।।
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अनेक रूप रचते आत्मप्रचार के लिये, छद्म चरित्रवान हर रस पिये।
‘दीपकबापू’ मन में पाले धन का लालच, हाथ में त्याग का झंडा लिये।।
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झूलते चंवरों के बीच देखे कई सिर, इतिहास ने जब दबोचा नहीं दिखे फिर।
‘दीपकबापू’ इतराते रहे सिंहासन पर, दुश्मनों की नज़रों से वही ताज गये घिर।।
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इश्क की कहानी से बाज़ार भरा है, कहीं माशुका कहीं आशिक मरा है।
‘दीपकबापू’ सपने के पांव नहीं होते, आखों के सामने खड़ा सच डरा है।।
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हर पग पर मिलते विषय के व्यापारी, दाम के हिसाब से निभाते यारी।
‘दीपकबापू’ कभी निभाते नहीं स्वयं, दूसरे से मुफ्त चाहें वफादारी।।
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लोगों की भीड़ रोजरोग की शिकार, सुख के नाम लील रहे विकार।
‘दीपकबापू’ चेहरे पर पोत लेते सफेदी, बुद्धि में कभी लाते नहीं निखार।।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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