फिर एक दिन बीत जायेगा,
साल भर तो गुलामों की तरह गुजारना है,
में आह्लाद पैदा होने की बजाय
खून खौलता है
जब कोई आज़ादी का मतलब नहीं समझा पाता।
एक शब्द बन गया है
जिसे आज़ादी कहते हैं,
उसके न होने की रोज होती है अनुभूति,
खत्म कर देती है
शहीदों के प्रति हृदय की सहानुभूति,
फड़क उठते हैं जंग को हाथ
जो फिर अपनी कामनाओं के समक्ष लाचार हो जाते हैं,
जब स्वयं का तंत्र ही ज़ल्लादों के हाथ में
फांसी की तरह लटका नज़र आता है।
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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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1 week ago
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