Friday, February 24, 2017

सेवक बनकर सामान ले जाते हैं-दीपकबापूवाणी (Sewak banakar saman le jaate hain-DeepakbapuWani)

राजपद का मोह अंधा बना देता है, लाचार अब गद्दारी धंधा बना लेता है।
‘दीपकबापू’ ईमानदारी कांच में सजा ली, बेईमान लूट को चंदा बना लेता है।।
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भलाई का झंडा वह हाथ में लिये हैं, जिन्होंने कभी कोई काम नहीं किये हैं।
‘दीपकबापू’ स्वयंभू उदारमना बन गये, पूरी जिंदगी जो स्वार्थी बनकर जिये हैं।।

मन बहलाकर जेब खाली कर जाते, संगीत के साथ कटु स्वर चलाते।
‘दीपकबापू’ प्रणय कहानी के नायक, असुर का भी अभिनय कर जाते।।
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सेवक बनकर सामान ले जाते हैं, हिसाब पूछो स्वामीपन दिखाते हैं।
‘दीपकबापू’ मुखौटे के पीछे छिपते, हर बार नयी पहचान लिखाते हैं।।
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कभी प्रेम कभी मित्र दिवस मनायें, चलो कुछ बाज़ार भी सजायें।
‘दीपकबापू’ दिल को बना दिया नादान, कैसे दुनियांदारी समझायें।।
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समय स्वतः घाव भर देता है, समंदर लहरों से स्वतः पार नाव कर देता है।
‘दीपकबापू’ स्वांग रचने के आदी, इंसानों में भ्रम घमंड का भाव भर देता है।।
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बंदर की तरह उछलकूद किये जाते, पहले बारदाना फाड़ते फिर सिये जाते।
‘दीपकबापू’ भय का किया विनिवेश, अब अपनी ही पूजा का रस पिये जाते।।
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प्रेम शब्द बाचें सभी करे कोई नहीं,
हृदय के स्पंदन में बना ली
ताजा मांस की चाहत ने जगह कहीं।।
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Wednesday, January 18, 2017

आंखों में कोई वहम नहीं है, समाज सेवकों में दम नही है-दीपकबापूवाणी (Ankhone mein vaham nahin hai-DeepakBapuWani)

बेबसों के हमदर्द बहुत है, देखो महल में भी सभी बेचैन हैं।
धवल वस्त्र पहने स्वर्ण रथ के सवार आंसुओ से सजे नैन है।
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चाहते सभी संसार में मिले प्यार, करते सभी भावना का व्यापार।
‘दीपकबापू’ लहरों से लड़ें नही,ं कौन जाना चाहे स्वार्थ के पार।।
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आंखों में कोई वहम नहीं है, समाज सेवकों में दम नही है।
‘दीपकबापू’ मलाई के लालची हैं, चंदा लूटने में कम नहीं है।।
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रुपये का तिलिस्म करे बेहाल, आंकड़े से ज्यादा चमकाये माल।
‘दीपकबापू’ दिखायें खेल शून्य का, बेजान होकर बुने मायाजाल।।
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अभाव के अंधेरे से सभी डरते हैं, वैभव की रौशनी पर सभी मरते हैं।
‘दीपकबापू’ घर के हिसाब में लगे, बाहर कूड़ा हटाने से सभी डरते हैं।।
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अपनी रेखा कोई बड़ी करता नहीं, गैर की छोटी करने से डरता नहीं।
‘दीपकबापू’ भंडारा खाने के महारथी, स्वाद से किसी का मन भरता नहीं।।
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गर्मी के मौसम में ठंडे पदार्थ खाते, सर्दी में गर्म पानी से नहाते।
‘दीपकबापू’  मौसम के जाल में फंसे, विरले जोगी मन में रम पाते।।
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