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Saturday, July 23, 2011

समय की बलिहारी-हिन्दी व्यंग्य कविता (samay ki balihari-hindi vyangya kavita)

दौलत को सलाम है,
हुकूमत के आगे ही झुका हर इंसान
चाहे खास है या आम है,
क्या करे कमजोर हाथ
जहां ताकत से होता काम है।
कहें दीपक बापू
जिनको लग गयी है
दौलत, ताकत और शौहरत की आग,
फिर जाता है उनका दिमाग
हों जाती है उनकी जमाने से दूरी,
हँसे देखकर दूसरे की बेबसी और मजबूरी,
दूसरे की बेचैनी में ढूंढते हैं चैन,
नींद नहीं पाते उनके भी नैन,
उछलें चाहे जितना
मिल जाता है एक दिन मिट्टी में उनका भी नाम।

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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ईमानदारी का दीपक-हास्य कविताएँ (imandari ka deepak-hasya kavitaen)

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन
देश में चल रहा है,
फिर भी यहाँ हर कोई
अपनों को छल रहा है।
नारों और वादों पर चलने का आदी है समाज
आकाश में देखता है फरिश्ते,
ज़मीन पर भुला रहा है रिश्ते,
खड़ा है वही चौराहे पर
रखकर अपनी दौलत अंधेरी तिजोरी में
हाथ में उसके
ईमानदारी का दीपक जल रहा है।
------------
एक ईमानदार ने बेईमान से कहा
"तुम थकते नहीं हो
करते हों हमेशा भ्रष्टाचार,
सारे देश में शोर मचा है
पर तुम्हें खौफ नहीं है
जारी है तुम्हारा काला व्यापार।'
बेईमान ने कहा
"तुम समझते नहीं हों
इसलिए अपने घर में ही जमते नहीं हों,
अगर ऊपरी कमाए न करें तो
कहीं के न रह जाएँ,
बाहर लोग मक्कार समझें
घर में नकारा कहलाएं,
आज हर जगह वही आदमी ऊंचाई पर है
जिसकी तिजोरी भरी है,
करे जो चोरी और सीना जोरी
उसकी कही बात ही खरी है,
तुम तो ठस ठहरे
बस इतना समझो कि
यहाँ पर सब चलता है यार,
चाहे जितना चले आंदोलन
नहीं बदलेगा
हमारे काम का शिष्टाचार ।
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Saturday, July 2, 2011

भाग्य का तोहफा-हिन्दी कविता (bhagya ka tohfa-hindi kavita)

जिम्मेदारी वह सारे समाज की यू ही नहीं उठाते,
मिलता कमीशन, खरीदकर घर का सामान जुटाते।
बह रही  दौलत की नदियां, उनके घर की ओर,
दरियादिल दिखने के लिये, वह कुछ बूंदें भी लुटाते।
न कहीं शिकायत होती, न करता कोई फरियाद
भाग्य का तोहफा समझ सभी अपने हिस्से उठाते।
लग चुकी है ज़ंग लोगों के सोचने के औजारों में
तयशुदा लड़ाई है, खड़े यूं ही हाथ में तलवार घुमाते।


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Saturday, June 25, 2011

चालचलन की खोट को बड़प्पन की ओट-हिन्दी हास्य व्यंग्य कवितायें (chalchalan ko badppan ki ot-hindi hasya vyangya kavitaen)

बड़ों बड़ों की चाल चलन में
खोट हो गयी है,
फिर भी छिप जाते हैं
उनको बड़प्पन की ओट हो गयी है।
कहें दीपक बापू
धीरे धीरे होते जा रहे हैं
इस हमाम में बड़े बड़े नंगे,
भूखे पेटों से होंगे
उनके साथ भी कभी पंगे,
ज़माना बेजार है,
ईमानदारी से कमाना लगता बेकार है,
नंगों की यह शिकायत
गूंजती रहेगी नक्कारखाने में
कि उनकी लंगोट बहुत महंगी हो गयी है।’’
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जिस सीढ़ी पर चढेंगे तख्त पर
उतरना न पड़े
इस डर से उसे गिरा देंगे,
सभी जानते हैं।
फिर भी पता नहीं
अपने कंधों पर कहार की तरह
लोग बड़ों का बोझ क्यों उठाये जाते हैं,
जब तक लात न पड़े
उनको देवता मानते हैं।
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Tuesday, June 14, 2011

बात हमेशा होती है लाजवाब-हिन्दी साहित्यक कविताएँ (baat hamesha hotee hai lajawab-hindi literature poem)

चेतन है
पर जड़ जैसे दिखते हैं,
कलम उनके हाथ में
पर दूसरे के शब्द लिखते हैं।
चमकदार नाम वही चारों तरफ
पर उनके चेहरे बाज़ार में
दाम लेकर बिकते हैं।
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एक सवाल उठाता है
दूसरा देता है जवाब।
बहसें बिक रही है
विज्ञापन के सहारे
चेहरे पहले से तय हैं,
जुबान से निकले
और कागज़ में लिखे शब्द भी
पहले से तय हैं,
निष्कर्ष कोई नहीं
पर बात हमेशा होती है लाजवाब
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Saturday, May 15, 2010

बादशाहत को ज़माने पर ठोका-हिन्दी कविता

स्त्री का भला करेंगे,
बच्चों को खुश करने के दावें भरेंगे,
वृद्धों का उद्धार करेंगे,
मजदूरों को न्याय देंगे,
गरीब को करेंगे अमीर,
और लाचार का सहारा बनेंगे,
ऐसे दावे धोखा है,
बेईमानी का खोखा है।
समाज को एक जैसा बनाने की कोशिश
करने वाले विकासवादी अक्लमंद
सभी को बना रहे मूर्ख
इसलिये समाज को
जांत पांत और धर्म के टुकड़ों में बांटकर
अपनी बादशाहत को ज़माने पर ठोका है।
करे जो समदर्शिता की बात
उसे पुरातनवादी बताकर रोका है।
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महंगाई और नैतिकता-क्षणिकायें (mehangai aur naitikta-hindi shayri)


आधुनिकता के नाम पर
इंसान सस्ता हो रहा है,
मस्ती के नाम पर अनैतिकता की
गुलामी को ढो रहा है।
यौवन की आज़ादी के नाम पर
पेट में पाप के बीज़ बो रहा है।
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महंगाई आसमान पर चढ़ गयी है,
इसलिये नैतिकता तस्वीर में जड़ गयी है।
चीजों की तरह इंसान भी बिकने लगा है,
मांग आपूर्ति के नियम से अनुसार
जरूरत से ज्यादा है बाज़ार में
इसलिये मेहनत की कीमत पड़ रही है।
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mehangai,mahangai

Saturday, March 13, 2010

साफ सुथरा इंसान-हिन्दी क्षणिकायें (saf suthara insan-hindi short poem)

आपस में जाम टकराते हुए लोग
नैतिकता की बात करने लग जाते हैं,
फिर सुनाते हैं अपनी कमाई के नुस्खे
जैसे दो नंबर की कमाई एक नंबर की हो
सीना फुलाकर उसकी कहानी सुनाते है।।

बहुत अच्छा लगता है
आदर्श और नैतिकता की बात करते हुए
बशर्त है आदमी स्वयं से छिप सकता हो।
वही कहलाता है साफ सुथरा इंसान
जो दूसरों पर इल्जाम लगाने में
कभी देर नहीं करता
पर बात अगर अपने पर आ जाये तो
जमाने का जिम्मेदार बताते हुए
अपना कसूर अपनी नज़र बचा सकता हो।

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क्रिकेट और फिल्म का घालमेल-हिन्दी हास्य कविता (combination of cricket and film-hind comic poem)

आशिक जूझ रहा था
क्रिकेट खिलाड़ी बनने के लिये
तो माशुका भी खड़ी थी
फिल्म अभिनेत्री बनने की पंक्ति में
कई उसने साक्षात्कार भी दिये।
बढ़ते जा रहे थे दोनों के कदम
इश्क के साथ
अपने लक्ष्य की तरफ भी सफलता के लिये।
पर आशिक की चिंतायें बढ़ रही थी
रौशन करना चाहता था वह अब
अपने घर में ही इश्क के दिए।
वह बोला माशुका से
‘अब तो मैं नामी खिलाड़ी बनने जा रहा हूं,
अपने रनों और विकेटों की बरसात में नहा रहा हूं,
पर डरता हूं
तुम्हारे और मेरे इश्क का क्या होगा
कहीं बिछड़ न जाये,ं
आओ अपना घर बसायें,
अपने अमर प्रेम के लिये।’
सुनकर बोली माशुका
‘क्यों घबड़ाते हो,
मैं भी सैट पर नृत्य करती हूं
जब तुम मैदान में रन बनाते होे,
हमारा बिछड़ना अब संभव नहीं,
फिल्म और क्रिकेट का
घालमेल हो गया है हर कहीं,
जब तुम नामी खिलाड़ी हो जाओगे,
मुझे भी बड़ी अभिनेत्री की तरह पाओगे,
कभी न कभी तुम्हारी भी लगेगी नीलाम बोली,
कोई टीम मैं भी खरीदूंगी
जिसमें समायेगी तुम्हारी भी टोली,
वैसे क्या रखा है दूल्हे की तरह बिकने में,
मजा है बिकाऊ क्रिकेट खिलाड़ी दिखने में,
दहेज का शब्द हो गया है बदनाम,
नीलामी में दूंगी तुम्हें ढेर सारे इनाम,
माल तो अपने ही घर आयेगा,
हर कोई देखकर जल जायेगा,
इश्क बाजी में कीर्तिमान बनाकर रख देंगे
आने वाली पीढ़ी के लिये।
लोग गायेंगे इश्क के साथ हमारी
दौलत के भी गीत,
नहीं देखी होगी किसी ने ऐसी प्रीत,
अभी घर संसार बनाकर
गुमनामी के अंधेरे में खोकर जिये
तो फिर क्या खाक जिये।’

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Monday, March 8, 2010

साधु और शैतान-हिन्दी हास्य कविता (sadhu aur shaitan-hindi comic poem)

गुरुजी ने अपने शिष्य को
उसके घर पहुंचने का संदेश भिजवाया,
तब वह बहुत घबड़ाया
अपनी पत्नी, बेटी और बहु से बोला
‘अरे भई,
बड़ी मुद्दत बाद वह वक्त आया
जब मेरे गुरुजी ने मेरे शहर आकर
घर पहुंचने का विचार बताया,
सब तैयारी करो,
स्वागत में कोई कमी न रह जाये,
इतने बड़े शिखर पर पहुंचा
उनकी कृपा से ढेर सारे फल पाये,
अब गुरु दक्षिणी चुकाने का समय आया।’
सुनकर बहु बोली
’लगता है ससुर जी आप न अखबार पढ़ते
न ही टीवी अच्छी तरह देखते,
आजकल के गुरु हो गये ऐसे
जो अपने ही शिष्यों के घरों की
महिलाओं पर कीचड़ फैंकते,
तौबा करिये,
बाहर जाकर ही गुरु दक्षिणा भरिये,
जवानी होती दीवानी,
बुढ़ापे में आदमी हो गुरु, हो जाता है रोमानी,
गेरुऐ पहने या सफेद कपड़े,
गुरुओं के चर्चित हो रहे लफड़े,
शैतान से बच जाते हैं क्योंकि
उससे बरतते पहले ही सुरक्षा
फिर वह पहचाना जाता है,
जरूरत है साधु से बचने की जो
शैतानी नीयत से आता है,
ऐसा मेरे पिता ने बताया।’

बहु के समर्थन में सास और
ननद ने भी अपना सिर हिलाया
तब ससुर बोले
‘चलो बाहर ही जाकर
उनके दर्शन करके आता हूं
पर तुम्हारी एकता देखकर सोचता हूं कि
किसे धन्यवाद दूं
साधु या शैतान को
किसने सास बहु और ननद-भाभी को
किसी विषय पर सहमत बनाया।’
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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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रात के पहर में-हिन्दी व्यंग्य कविता (raat ke pahah men-hindi satire poem)

जन्म लिया हिन्दी में
पढ़े लिखे अंग्रेजी में
आजाद रहे नाम के
गुलामी सिखाती रही आधुनिक शिक्षा।
अब कटोरा लेकर नहीं
बल्कि शर्ट पर कलम टांग कर
मांग रहे पढ़े लिखे लोग नौकरी की भिक्षा।
--------
आंखों से देख रहे पर्दे पर दृश्य
कानों से सुन रहे शोर वाला संगीत
नशीले रसायनों की सुगंध से कर रही
सभी की नासिका प्रीत,
मुंह खुला रह गया है जमाने का
देखकर रौशनी पत्थरों के शहर में।
अक्ल काम नहीं करती,
हर नयी शय पर बेभाव मरती,
बाजार के सौदागरों के जाल को
जमीन पर उगे धोखे के माल को
सर्वशक्तिमान का बनाया समझ रहे हैं
हांके जा रहे हैं भीड़ में भेड़ की तरह
दिन में सूरज की रौशनी में छिपे रहते
दिल का उजाला ढूंढते रात के पहर में।

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रिश्तों की कहानी-हिन्दी व्यंग्य कविता (ujde rishtton ki kahnai-hindi vyangya kavita)

अपनी दर्द भरी बातें
किसी को क्या सुनायें,
रोते लोगों क्या रुलायें,
सभी अपने गम छिपाने के लिये
दूसरों के घावों पर हंसने का
मौका ढूंढ रहे हैं।
अपने साथ हुए हादसों के किस्से
किसको सुनायें,
आखिर लोग उनको मुफ्त में क्यों भुनायें,
अपनी जिंदगी में थके हारे लोग
जज़्बातों के सौदागर बनकर
दूसरों के घरों के उजड़े रिश्तों की कहानी
बेचने के लिये घूम रहे हैं।

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