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Saturday, May 28, 2011

जमीर और धोखा-हिन्दी शायरियां (zamir aur dhokha-hindi shayriyan)

दर दर से
वफा के नाम पर धोखा खाते हुए
यकीन टूट गया लगता है,
पर घर घर में टूटे हुए दिलों को
रोता देखकर होता है अहसास
तरसे हैं लोग वफादारी के लिये
पर किसी से करना उनको गवारा नहंी
ऐसे में अपना यकीन
अपने जमीर में जिंदा लगता है।
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चमचागिरी करने वालों की
तारीफ तो हम भी किये जाते हैं,
कितना माद्दा है उनके दिल में
बिना ज़मीर के जिये जाते हैं।
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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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८.हिन्दी सरिता पत्रिका

Friday, March 4, 2011

घर के दरवाजे और सोच तंग है-हिन्दी शायरी (ghar ke darvaje aur soch tang hai-hindi shayri)

माना कि उनके घर के दरवाजे तंग हैं,
तो भी हम उसमें से हम निकल जाते,
मुश्किल यह है कि उनकी सोच भी
तंग दायरों में कैद है इसलिये वह हमको
कभी प्यार से नहीं बुलाते।
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कई बार बहुत लोगों पर यकीन किया हमने
पर हर बार धोखा खाते हैं,
फिर भी नहीं रुकता यह सिलसिला
कुदरत का खेल कौन समझा
धोखा देना एक आदत है इंसान की
बस, समय और चेहरा बदल जाते हैं।
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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Sunday, June 6, 2010

अहसास-हिन्दी शायरी (bonepan ka ahsas-hindi shayari)

हम जो भी दृश्य देखते
उस पर सोचने लगते हैं,
अपने अंतर्मन में पहले से ही स्थित
तयशुदा विश्लेषणों के अनुसार
उस पर निकालते हैं निष्कर्ष।

हम कुछ सुनते हैं
उस पर वैसे ही सोचते हैं
जैसे कि पहले सुना हो।

हम स्पर्श करते हैं फूल या लोहा
बेपरवाह होकर जैसे कि उनको पहले भी छू कर देखा है।

मतलब हम देख कर भी
कभी कुछ नया नहीं देख पाते,
सुनकर भी अहसास में ताज़गी नहीं पाते,
छूकर भी नया नहीं सोच पाते,

जिंदगी एक राह पर चलते हुए
बिता देना कितना सहज लगता है,
हम बेखबर हैं
बीतता है हमारा भी समय
घड़ियों की सुईयां घूमने से तो महज लगता है,
हाथ हिलाकर
पांव चलाकर
जिंदगी के चलने की अनुभूति करना ठीक है
पर अपनी सोच कभी आज़ाद नहीं रख पाये
जब होता है यह अहसास
आदमी अपने को बौना समझने लगता है।
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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Tuesday, December 22, 2009

ज़माने के दर्द के साथ-हिंदी शायरी (zamane ke dard ke saath-hindi shayri)

 कागज़ की उपाधियों से
पूरा घर  सजा दिखता हो
गर आदमी बेचने वाले अल्फाज़ लिखता हो.
खुद के साथ ज़माने के दिल को तसल्ली दे
मुश्किल होता है ऐसा लिखना
दर्द अपना चेहरे पर न आये
मुश्किल होता है ऐसा बेदर्द दिखना
बह जाए महफ़िलों में वाह वाह की दरिया के साथ
एक दिन बह जाएगा का उसका नाम भी
नाम उसका ही रौशन रहेगा
जो जमाने के दर्द के साथ खुद टिकता हो..
 
कवि लेखक और सम्पादक - दीपक भारतदीप,ग्वालियर
 

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