Wednesday, June 15, 2016

यही शर्त होती है-हिन्दी व्यंग्य कविता(Yahi Shart Hoti hai-HindiSatirePoem)


मुश्किल सवाल न करना
महफिल में आने की
यही शर्त होती है।

अपने गिले शिकवे दूर रखना
सद्भाव दिखाने के लिए दिल से
यही शर्त होती है।

कहें दीपकबापू अक्ल से
चला रहे जमाना
डरपोक लोग
बात करते जंग की
छिपने के लिये महल मिले
यही शर्त होती है।
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Wednesday, June 1, 2016

किताबी कीड़े चेतना लाने में लगे हैं-दीपकबापूवाणी (Kitabi kide chetan lane lage-DeepakBapuWani)

बुद्धि से अपढ़ भी मशहूर हो जाते, ज्ञानहीन शिक्षित अक्षर में चूर हो जाते।
‘दीपकबापू’ अपने लिये सब पा लिया, वही घमंड के सवार सबसे दूर हो जाते।।
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दंगल में कभी पहलवान जीते कभी हारे, वहां खड़े दर्शक मनोरंजन के मारे।
‘दीपकबापू’ खरीद लेते हैं कभी जीत भी, जश्न मनाते वह भी जो कुश्ती हारे।।
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किताबी कीड़े चेतना लाने में लगे हैं, धरती पर स्वर्ग लाने के लिये जगे है।
‘दीपकबापू’ सारी सुविधायें लपक ली, मददगार बेबसों से चंदा बटोर ठगे हैं।।
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मदहोशी में सभी लोग होते बदहाल, होश में भी चल जाते टेड़ी चाल।
‘दीपकबापू’ कर्म की चिंता नहीं करते, नाकामी पर बनायें भाग्य की ढाल।।
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हृदय की पीड़ा सभी स्वयं जाने, भीड़ में ढूंढे नहीं मिलते कभी सयाने।
बुद्धिमान छोड़ देते वह जगह, ‘दीपकबापू’ जहां पत्थर जैसे तर्क ताने।।
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उगते सूरज से उठती हृदय में आशा, डूबते हुए आये अंधेरे से निराशा।
सब्र से पाया मन में आंनद का हीरा, ‘दीपकबापू’ जब परिश्रम से तराशा।।
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अनेक रूप रचते आत्मप्रचार के लिये, छद्म चरित्रवान हर रस पिये।
‘दीपकबापू’ मन में पाले धन का लालच, हाथ में त्याग का झंडा लिये।।
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झूलते चंवरों के बीच देखे कई सिर, इतिहास ने जब दबोचा नहीं दिखे फिर।
‘दीपकबापू’ इतराते रहे सिंहासन पर, दुश्मनों की नज़रों से वही ताज गये घिर।।
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इश्क की कहानी से बाज़ार भरा है, कहीं माशुका कहीं आशिक मरा है।
‘दीपकबापू’ सपने के पांव नहीं होते, आखों के सामने खड़ा सच डरा है।।
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हर पग पर मिलते विषय के व्यापारी, दाम के हिसाब से निभाते यारी।
‘दीपकबापू’ कभी निभाते नहीं स्वयं, दूसरे से मुफ्त चाहें वफादारी।।
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लोगों की भीड़ रोजरोग की शिकार, सुख के नाम लील रहे विकार।
‘दीपकबापू’ चेहरे पर पोत लेते सफेदी, बुद्धि में कभी लाते नहीं निखार।।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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Wednesday, May 18, 2016

चमत्कार के सौदागर-हिन्दी कविता(Chamatkar ke Saudagar-HindiPoem)

अपनी ही तारीफ से
ज़माने की तारीख
बनाये जाते हैं।

अकर्मण्य फल जुटाकर
अनुयायियों के लिये सीख
बनाये जाते हैं।

कहें दीपकाबापू सत्य से
पाखंड का मार्ग सरल है
चमत्कार के सौदागर
कुदरत का खेल
अपना बताये जाते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Wednesday, May 4, 2016

अंधेरा बुझा देते हैं-हिन्दी कविता (Andhera Bujha dete hain-Hindi poem)

आशा का प्रकाशपुंज
प्रतिदिन रखें
फिर बुझा देते हैं।

गर्मी में उगते सूरज का
अभिवादन करते
सुख की चाहत दोपहर में
फिर बुझा देते हैं।

कहें दीपकबापू भरोसे से
प्रतिदिन हारते 
जिंदगी में यही एक सहारा
यही सोच निराशा का अंधेरा 
फिर बुझा देते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Friday, April 29, 2016

इंसान बंदर है-हिन्दी कविता(Insan Bandar Hai-Hindi Poem)

चाहत है तैरने की
घर से बहुत दूर
बह रहा समंदर।

दिल में सपनों के
पानी का  खाली घड़ा
तड़प रहा अंदर।

कहें दीपकबापू मन के खेल में
फंसा इंसान
बेचैनी पालकर
ढूंढता अमन
चाल से लगे एक बंदर।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Monday, April 18, 2016

संगीनों का साया-हिन्दी कविता(Sanginon ka Saya-HindiKavita)


बारातों के जश्न पर
संगीनों का साया है।

घर की गोली से
अपने ज्यादा मरते
आंकड़ों ने बताया है।

कहें दीपकबापू सोच से
हथियार का वास्ता
कभी नहीं रहता
पानी जैसा मन
आग की बात कहता
बने निशाना वह मौन हुए
चलाने वाला पछताया है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Friday, April 8, 2016

चरित्र व्यक्तित्व-हिन्दी कविता (Charitra Vyaktitva-Hindi Poem)

चरित्र पर दाग
व्यक्तित्व की छवि 
तबाह कर देते हैं।

पीते नहीं शराब
जिंदगी में इतनी
अपनों के मन में 
जितनी आह भर देते हैं।

कहें दीपकबापू डूबतों से
बचने के लिये तिनका
मिलना आसान नहीं
मजबूत इरादे हों तो
पार लगने की
चाह भर देते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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