Saturday, October 17, 2015

मुद्रा द्रव्य-हिन्दी कविता(Money as A liquad Dream-HindiKavita)

पेट की भूख
मिटाने वाली रोटी का
कोई रूप नहीं है।

मन में लगी आग
बुझाकर ठंडा करे
पानी का कोई कूप नहीं है।

कहें दीपकबापू बुद्धि से
बैर रखने वालों पर
तरस आता है
मुद्रा द्रव्य में डूबे
उनके सपनो को सुखा सके
ऐसी  कोई धूप नहीं है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Wednesday, October 7, 2015

दीपकबापूवाणी (DeepakBapuWani Sum Hindi Dohe)


सिंहासन के लिये चलती जंग, अमन कराना तो बहाना है।
‘दीपकबापू’ रखें पुजने का ख्याल, सेवा से मेवा कमाना है।।
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भक्ति से बड़ी  भूख है, मुफ्त खाने वाले नहीं समझेंगे।
दीपकबापू आराम से रहते, पसीने को पानी ही समझेंगे।।
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लाशों का झुंड शहर में, विज्ञापन दिलाने वाली मशहूर है।
दीपकबापू जिंदगी समझे, क्या पता मरने में भी शऊर है।।
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दंगे की प्रतीक्षा में खड़े, खून होते ही विज्ञापन चलायेंगे।
दीपकबापू बहस में मस्त, अक्लमंद कीमती आंसु बहायेंगे।।
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हृदय का भाव नापते नहीं, भय से धर्म सभी निभा रहे हैं।
‘दीपकबापू’ मंत्र जापते नहीं, धनतंत्र की भक्ति सिखा रहे हैं।
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रात के अंधेरे में लगाते आग, दिन में बुझाने का बजाते राग।
‘दीपकबापू’ भलाई के ठेकेदार, इंसान क्या छोड़ेंगे खायें नाग।।
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पांच तत्वों से बना संसार, संजोग होते जीवों के मेल।
‘दीपकबापू’ तमाशा न करना, पल में बने बिगड़े यहां खेल।।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Thursday, October 1, 2015

रंगबिरंगी दुनियां-हिन्दी कविता(Rangbirangi Duniya-HindiKavita

अपनी नज़रिये से ही
देखोगे सभी को
दायरों में सिमट जाओगे।

बिन सोचे खेलोगे
अपनी जिंदगी से
खेल में पिट जाओगो।

कहें दीपकबापू रंगबिरंगी दुनियां है
अपने ही रंग पर
अगर हमेशा इतराये
हर रंग में मिट जाओगे।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Saturday, September 26, 2015

जिंदगी के पेड़ के लिये-हिन्दी कविता(Zindagi ke ped ke liye-HindiPoem)

दूर के ढोल
सुहावने लगते हैं
दूर ही रहने दो।

लोगों का काम है कहना
तुम चलते रहो
उनको कहने दो।

कहें दीपकबापू अपने इरादे से
पीछे हट जाना
सहज लगता है
फिर ज़माने का बहकाना
महज लगता है
जिंदगी के पेड़ के लिये
अपने अंतर्मन की धारा
अविरल बहने दो।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Thursday, September 17, 2015

डेंगू की फिक्र नहीं है-हिन्दी कविता(Dengu kifikra nahin hai-HindiPoem)

 डेंगू की खबर से भी
उसके चेहरे पर
फिक्र नही है।

महंगे इलाज की भी
उसके दिमाग में
 फिक्र नहीं है।

‘दीपकबापू’ पसीना बहाने वाला
मजदूर जानता है
बीमारी आकर उसे ले जायेगी
जिंदगी की जंग में जीतहार की
 फिक्र नहीं है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Friday, September 11, 2015

दीपक बापू वाणी (DeepakBapuWani)some poems


जोड़ जोड़ कर जग मुआ, दूजा कुुबेर भया न कोय।
कहें दीपक बापू फकीरी जोड़ी, वही सवा सेर होय।।
झूठ के नहीं होते पांव, सच भी न पाये कहीं छांव।
कहें दीपकबापू लालच में इंसान, खेलता अपने दांव।।
मांस खाकर भी जग जिया नहीं, कुंभकर्ण हमेशा सोया।
कहें दीपकबापू खुशी से मरा खायें, तभी पायेंगे हम खोया।।
महंगाई पर हर इंसान रोता, सामानों में भी दिल बोता।
कहें दीपकबापू नकदी का खेल, हार पर ही खत्म होता।।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Wednesday, September 2, 2015

दुनियां के मजदूरों समझदार हो जाओ-हिन्दी कविता(duniya ke mazdoor samajhdar ho jao-hindi poem)

दुनियां के मज़दूरों
अब समझदार भी हो जाओ।

करते हैं जो तुम्हें महलों का
स्वामी बनाने का दावा
दौलतमंदों के लिये
करते छलावा
हड़ताल पर मत जाओ।

कहें दीपकबापू हंसिया हथौड़ा
तुम्हारी मजदूरी के हथियार हैं
हुड़दंग का चिन्ह न बनाओे
 दलाल भेड़ों की भीड़ की तरह
तुम्हें चौराहों पर सजाते हैं
उनके बहकावे में न आओ।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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