Saturday, May 28, 2011

जमीर और धोखा-हिन्दी शायरियां (zamir aur dhokha-hindi shayriyan)

दर दर से
वफा के नाम पर धोखा खाते हुए
यकीन टूट गया लगता है,
पर घर घर में टूटे हुए दिलों को
रोता देखकर होता है अहसास
तरसे हैं लोग वफादारी के लिये
पर किसी से करना उनको गवारा नहंी
ऐसे में अपना यकीन
अपने जमीर में जिंदा लगता है।
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चमचागिरी करने वालों की
तारीफ तो हम भी किये जाते हैं,
कितना माद्दा है उनके दिल में
बिना ज़मीर के जिये जाते हैं।
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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Sunday, May 15, 2011

औरत की जिंदगी और इज्जत पर पहरा-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (woman ki izzat aur pahara-hindi vyangya kavitaen)


औरत की जिंदगी और इज्जत
बचाने का शोर चारों तरफ मचा है,
लालची और कायर इस ज़माने में
भला कहां कोई वफादार पहरेदार बचा है।
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औरत की जिंदगी और इज्जत
बचाने के लिये आतुर कई मेहरबान
दिखाई देते हैं,
लगाते हैं जो चौराहे पर नारे
बंद कमरे में वही लोग
अपनी नीयत पर नकाब लगा लेते हैं।
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औरत की इज्जत और जिंदगी
सुरक्षा के लिये
जिसके हाथ में दी जाती है,
उसी आदमी के पांव तले
वही कुचली जाती है,
वैसे भी पति तो स्वामी है
पता नहीं उसे पहरेदार की
पदवी क्यों दी जाती है।
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हिन्दी शायरी-नाम के मालिक (naam ke malik-hindi shayari)

आंसुओ को आँखों   से बाहर
आने से रोके रहे,
चाहे रोने के आते कितने भी मौके
हंसकर देते उनको धोखे रहे,
गैरों के हमलों की क्या शिकायत करते
अपनों के हाथ ही
हमारी खुशियों का गला घौंटे रहे।
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ज़मीन के सौदे हो जाते हैं
इंसानों के बीच
कागज पर नाम बदल जाते हैं।
खड़ी रहती है वह अपनी जगह
फसलों की जगह
पत्थर उसे बनाते अपनी पहचान की वजह,
इंसान मरकर
इतिहास के कागजों में चले जाते
अपनी स्वामिनी ज़मीन स्वयं है
नाम के मालिक तो
नाम के लिये आते और जाते हैं।
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कौम के सपने रह जाते बिखर कर-हिन्दी कविता (kaum ke sapane rah jate bikhar kar-hindi kavita)

वह इंसानी बुत
आंख से देखते हुए भी
सभी को दिखते,
अपनी कलम से पद पाने की हसरत में
हाथ से अपील भी लिखते,
कान आगे बढ़ाकर आदमी की
शिकायत भरी आवाज भी सुनते,
चेहरे पर अपनी अदाओं से
गंभीरता की लकीरें भी बुनते
फिर चढ़ जाते हैं सीढ़ियां
बैठ जाते शिखर पर।

अगली बार नीचे आने तक
वह लाचार हो जाते,
हर हादसे के लिये
अपने मातहत को जिम्मेदार
और खुद को बेबस बताते
अपनी बेबसी यूं ही दिखाते हैं,
लोकतंत्र के यज्ञ में
सेवा का पाखंड
किस कदर है कि
ज़माने की हर परेशानी के हल का
दावा करने वाले
महलों में घुसते ही बनकर राजा
अनुचरों के हाथ, पांव, कान तथा नाक के घेरे में ही
अपना सिंहासन सजाते हैं,
कौम के सपने रह जाते हैं बिखर कर।
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Saturday, April 30, 2011

हिन्दी शायरी-उस्ताद और शागिर्द (hindi shayri-ustad aur shagird)

उस्तादों ने
वफादारी का रास्ता दिखाया
पर कैसे की जाती है
यह नहीं सिखाया।
इसलिये ज़माने भर के शगिर्द
करते हैं यकीन निभाने की बात
मगर वफादारों में 
कभी किसी ने नाम नहीं लिखाया।
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हिन्दी शायरी-हम बेजुबान हो गये (hindi shayari-ham bejuban ho gaye)

जिनको पहनाया ताज़
वही दौलत के गुलाम हो गये,
जिन ठिकानों पर यकीन रखा
वही बेवफाई की दुकान हो गये।
किसे ठहरायें अपनी बेहाली का जिम्मेदार
दूसरों की कारिस्तानियों से मिली जिंदगी में ऐसी हार
कि अपनी ही सोच पर
ढेर सारे शक और
मुंह से निकलते नहीं लफ्ज़
जैसे कि हम बेजुबान हो गये।
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Sunday, April 24, 2011

धार्मिक संत का देहावसान, क्रिकेट का खिलाड़ी का जन्म दिन और विज्ञापन-हिन्दी लेख (death of sant, birth day of one cricket player and advertisment-hindi lekh)

         हिन्दी समाचार टीवी चैनलों का तो कहना ही क्या? क्रिकेट के भगवान का जन्म दिन, धार्मिक संत का परमधाम गमन दिवस और क्लब स्तरीय क्रिकेट प्रतियोगिता के प्रचार को को बड़ी चालाकी से विज्ञापनों में एक साथ प्रसारित कर शोक, खुशी और नाच से संयोजित कार्यक्रम प्रसारित किए। क्रिकेट के भगवान को धार्मिक संत का महान शिष्य बता दिया जबकि अभी तक यह बात किसी को पता नहीं थी। दोनों एक साथ काम किये। संत को बड़ा बनाया तो खिलाड़ी को धार्मिक! सभी के हिन्दी समाचार टीवी चैनलों के कार्यक्रमों में गज़ब की एकरूपता है जिसे देखकर लगता नहीं कि उनके मालिक अलग अलग हैं। अगर मालिकों के नाम अलग अलग हों तो फिर लगता है कि उनका प्रायोजक कोई एक ही होना चाहिए जिसके अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष इशारों पर ही उनके कार्यक्रम चलते हैं। अगर किसी फिल्म अभिनेता, अभिनेत्री या क्रिकेट खिलाड़ी का जन्म दिन है तो एक ही समय पर उससे संबंधित कार्यक्रम सभी टीवी चैनलों पर एक साथ आता है। उससे दर्शक के विकल्प नहीं रहता। किसी बड़ी शख्सियत का वार्तालाप अगर एक पर सीधे प्रसारित होता है तो सभी पर वही दिखाई देता है।
         इस तरह की एकरूपता शक पैदा करती है कि कोई एक व्यक्ति या समूह अपने पैसे की दम पर टीवी चैनलों पर प्रभाव डाल रहा है। वरना यह संभव नहीं है। जिन लोगों को पत्रकारिता का अनुभव है वह जानते हैं कि सभी अखबारों में खबरें एक जैसी होती हैं पर उनके क्रम में एकरूपता नहंी होती। कई बार तो प्रमुख खबरों में ही अंतर हो जाता है। इसका कारण यह है कि हर अखबार के संपादक का अपना अपना नजरिया होता है और यह संभव नहीं है कि सभी का एक जैसा हो जाये।
         इन हिन्दी समाचार टीवी चैनलों की व्यवसायिक चालाकियों का भी एक ही तरीका है और संभव है कि एक दूसरे की नकल पर आधारित हो, पर जिस तरह देश के दर्शकों को नादान तथा चेतनाविहीन इन लोगों ने समझा है वह शक पैदा करता है कि ऐसा करने के लिये कोई उनको प्रेरित करता है। वैसे तारीफ करना चाहिए इन लोगों की व्यवसायिक चालाकी की पर मुश्किल यह है कि वह ऐसा कर यह संदेश देते हैं कि उनका अस्तित्व स्वतंत्र नहीं है और वह दृश्यव्य तथा अदृश्व्य धनदाताओं के आधीन ही वह कार्य करते हैं।
क्रिकेट खिलाड़ी का जन्म दिन पड़ा तो धार्मिक संत ने भी उसी दिन देह त्यागी। बताया गया कि क्रिकेट के भगवान उन धार्मिक संत के बहुत बड़े भक्त हैं। वह आज क्लब स्तरीय क्रिकेट प्रतियोगिता में अपना मैच नहीं खेलना चाहते। वह अपना जन्म दिन नहीं मना रहे। बताया तो यह गया कि क्रिकेट के भगवान ने अपने को कमरे में बंद कर लिया है। इस तरह क्लब स्तरीय प्रतियोगिता का प्रचार हुआ। क्रिकेट खिलाड़ी के जन्म दिन पर कसीदे भी पढ़ते हुए बताया गया कि वह तो सत्य साई के भक्त हैं। क्रिकेट के भगवान के साईं शीर्षक के कार्यक्रम प्रसारित हुए। फिर यह बताना भी नहीं भूले कि उस क्रिकेट के भगवान को लोगों ने जन्मदिन की बधाई दी।
        पुट्टापर्थी के धार्मिक संत सत्य साईं बाबा के निधन पर उनके भक्त दुःखी हैं। उन्होंने अपने क्षेत्र मेें बहुत काम किया। इस पर विवाद नहीं है पर उनके निधन पर घड़ियाली आंसु बहाता हुऐ हिन्दी समाचार चैनल अन्य लोगों के लिये हास्य का भाव पैदा कर रहे हैं। सच कहें तो एक तरह से वह शोक मना रहे हैं जिसमें क्रिकेट खिलाड़ी का जन्म दिन भी शामिल कर लिया तो क्लब स्तरीय क्रिकेट भी शामिल होना ही था। सारी दुनियां जानती हैं कि प्रचार माध्यम किसी के मरने पर कितना दुःखी होते हैं। सत्य साईं के निधन पर दुःख व्यक्त करना यकीनन प्रचार प्रबंधकों की व्यवसायिक मज़बूरी है। उनकी संपत्ति चालीस हजार करोड़ की बताई गयी है जो कि मामूली नहीं है। यकीनन उनके संगठन की पकड़ कहीं न कहीं न वर्तमान बाज़ार पर रही होगी। इसलिये उनके भावी उत्तराधिकारियों  को प्रसन्न करने के लिये यह प्रसारण होते रहे। बाज़ार के सौदागरों ने स्पष्ट रूप से प्रचार प्रबंधकों को इशारा किया होगा कि यह सब होना है। अगर ऐसा नहीं होता तो शोक जैसा माहौल बना रहे इन समाचार चैनलों ने विज्ञापन कतई प्रसारित नहीं किये होते।
              अगर ऐसा नहीं भी हो रहा है तो यह मानना पड़ेगा कि हिन्दी टीवी चैनलों के संगठनों के पास समाचार, विश्लेषण तथा चर्चाओं के लिये विद्वान नहीं है इसलिये वह क्रिकेट, फिल्म और मनोरंजन चैनलों की कतरनों के सहारे चल रहे हैं। इनके मालिक कमा खूब रहे हैं पर अपने चैनल पर खर्च कतई नहंी कर रहे। भले ही देश में ढेर सारे समाचार चैनल हैं पर प्रतियोगिता इसलिये नहीं है क्योंकि उनको विज्ञापन मिलने ही है चाहे जैसे भी कार्यक्रम प्रसारित करें। उनको बड़ी कंपनियां कार्यक्रमों या अपने उत्पाद के प्रचार के लिये प्रचार माध्यमों को विज्ञापन नहीं देती बल्कि उनके दोष सार्वजनिक रूप से लोगों के सामने नहीं आयें इसलिये देती है। यही कारण है कि प्रयोक्ताओं की पसंद नापसंद की परवाह नहीं है और थोपने वाले समाचार और विश्लेषण प्रस्तुत किये जा रहे हैं। अर्थशास्त्र पढ़ने वाले जानते हैं कि भारत में धन की कमी नहीं पर फिर भी लोग गरीब हैं क्योंकि यहां प्रबंध कौशल का अभाव है। पहले यह सरकारी क्षेत्र के बारे में कहा जाता था पर निजी क्षेत्र भी उससे अलग नहीं दिखता यह सब प्रमाणित हो रहा है।
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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
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