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Tuesday, July 2, 2013

उत्तराखंड में आपदा पर हिन्दी समाचार चैनलों का जीवंत प्रसारण प्रशंसनीय-हिन्दी लेख (live telecas on natural calamity in uattarakhan by hindi news chainal-hindi article or editorial)



       
      उत्तराखंड में हादसे के बाद हिन्दी समाचार चैनलों ने जो किया वह प्रशंसनीय है।  यकीनन अगर इन चैनलों ने सीधे जाकर घटनाक्रम का जीवंत प्रसारण नहीं किया होता तो शायद देश के लोग इस आपदा से जुड़ी  अनेक घटनाओं के बारे में जान नहीं पाते। इससे भी बड़ी बात यह कि जितनी सहायता भले ही वह  अपर्याप्त अभी तक अपर्याप्त ाीर हो पर पीड़ितों को मिल पायी, उसका श्रेय इन्ही समाचार चैनलों के माध्यम से मिल पाया। ऐसा लगता है कि उस समय आपदा प्रबंध में लगी शासकीय तथा सामाजिक संस्थायें इन्हीं चैनलों की खबरों के आधार पर पीड़ितों की सहायता को पहुंच रही होंगी।  उससे भी बड़ी बात यह कि लापता लोगों की जानकारी इन चैनलों ने एकत्रित की उसी आधार पर ही मृतकों का आंकड़ा तय होगा यह बात तय है। अभी एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था ने लापता लोगों की संख्या 16000 हजार से अधिक का जो आंकड़ा दिया है लगता  वह इन्हीं चैनलों के समाचार के आधार से एकत्रित किया गया होगा।  कोई अन्य संस्था इसे उपलब्ध करा पाये यह संभव नहीं  है।  अब यह खबर इन्हीं चैनलों ने उस संस्था के हवाले से दी कि उत्तराखंड में मृतकों की संख्या बताई है वह उन्हीं के प्रयासों पर आधारित लगती है।  आजतक, इंडिया, आईबीएन, जी न्यूज, एनडीटीवी, एबीवीपी न्यूज, इंडिया टीवी तथा अन्य चैनलों ने लापता लोगों की सूचनायें एकत्रित कीं।  अगर कोई व्यक्ति इनकी सूची के आधार पर काम करे तो संभवतः तो पूरी तरह न  सही पर कुछ हद तक एक अनुमानित संख्या मिल सकती है। 
         हालांकि यह चैनल हमेशा ही फालतू खबरें देते हैं। कभी कभी एक खबर को इतना लंबा खींच देते हैं कि बोरियत हो जाती है। मुख्य बात यह है कि खोजी पत्रकारिता का इन चैनलों में पूरी तरह से अभाव दिखता है। इसका कारण यह है कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इन पर उन्हीं  पूंजीपतियों का हाथ है जिनका देश की अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण है।  इसलिये अपने सेठों के अनुकूल प्रतिकूल खबरों का चयन इनको करना पड़ता होगा यह बात तय है। ऐसे में खोजी पत्रकारिता के अपने जोखिम हैं।  किसी बड़े औद्योंगिक घराने की पोल खोले जाने की संभावना इसलिये बन भी नहीं सकती।  जब कोई विशेष खबर न हो तो क्रिकेट और फिल्म की खबरें चलाते हैं।  विभिन्न चैनलों में प्रसारित कॉमेडी और बोरियत भरे सामाजिक धारावाहिकों के अंश प्रसारित करते हैं। एक तरह से वह पूंजीपतियों के विज्ञापन दिखाने वाले यह प्रचार माध्यम समाचारों की सामगं्री इस तरह जुटाते हैं जैसे कि वह कोई सामाजिक दायित्व निभा रहे हों।   वास्तविकता यह है कि आज भी भारत सरकार का उपक्रम दूरदर्शन  केवल  समाचार सुनने वालों के लिये एक उपयुक्त माध्यम हैं
   हिन्दी भाषी क्षेत्रों की जनंसख्या अधिक होने कारण इन चैनलों को विज्ञापन भी खूब मिलते हैं।  ऐसे में अब यह चैनल बहसें भी चलाने लगे हैं।  उसमें भी सभी के पर्दे पर  दिल्ली और मुंबई में बैठे चंद विद्वान ही आते हैं।  क्रिकेट, फिल्म और राजनीति की छोटी छोटी बातों पर बड़ी बड़ी बहस होती है।  तय चेहरे होने के कारण यह बात तो साफ पता लग ही जाती है कि यह ऐसे किसी नये व्यक्ति को ला नहंी सकते जिससे किसी आक्रामक और विवादास्पद स्थिति पैदा हो।  सामाजिक, राजनीतिक, फिल्म, क्रिकेट तथा अन्य जनाभिमुख क्षेत्रों में कार्यरत शिखर पुरुषों के  ट्विटर, ब्लॉग, फेसबुक तथा बेवसाईटों पर कही गयी छोटी बात को भी यह चैनल उछालते हैं पर आम ब्लॉग लेखक की बड़ी बात पर भी चर्चा नहीं करते।  दोष इनका नहीं समाज का है जो लेखक किसी को तभी मानता है जब उसके पास पद, पैसे और प्रतिष्ठा का शिखर हो।  सच बात तो यह है कि हमें लगने लगा है कि हम अंतर्जाल सक्रिय हिन्दी के अनेक ऐसे लेखकों को देख रहे हैं जो इन कथित विद्वानों से अधिक तेजस्वी है। अनेक विषयों पर बहसें देखकर हमें लगता है कि अगर हम अगर वहां होते तो शायद अपनी बात अपने ढंग से कहते और यकीन मानिए सुनने वाले हतप्रभ रह जाते।
      दरअसल अंतर्जाल के आम लेखकों को पूंजीपतियों के वरतहस्त के कारण प्रचारकर्मी आम प्रयोक्ता ही मानते हैं।  यही कारण है कि अनेक लेखकों की रचनायें बिना नाम दिये अखबार में छप रही हैं तथा उनके विचारों को बहसों में इस तरह अनेक विद्वान शामिल करते हैं जैसे  कि वह उनके मौलिक हो।  भारत में अंतर्जाल  आये इतना समय हो गया पर एक भी हिन्दी लेखक को यह प्रचार माध्यम प्रतिष्ठित नहीं कर पाये यह इनकी कमी है।  यह कहना बेकार है कि हिन्दी में ब्लॉग पर लिखा कम जा रहा है।  अनेक बार हमारे मन में आता है कि हमने इतना लिखा है पर किसी ने आज तक ध्यान नहीं दिया तो इसमें हमारी कमी नहीं वरन् समाज की कमी है।  हालांकि एक यह भी है कि हम लिख रहे हें पर इससे कमा क्या रहे हैं? आज के भौतिक युग में किसी क्षेत्र के अकमाऊ व्यक्तित्व को आदर्श बनाकर प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।            
          इधर केदारनाथ, गंगोत्री, बद्रीनाथ तथा यमुनोत्री पर विपदा आयी तो उनकी मदद के लिये दान मांगने  का सिलसिला प्रारंभ हो गया।  यह कहना कठिन है कि कितने लोग पीड़ितों के लिये धन लेंगे और कितना अपने पास रखेंगे। संभव है कुछ वह अपने आगे वाले की तरफ बढ़ायें और कुछ हिस्सा अपने पास रखें। एक बात तय है कि उत्तराखंड  में मदद पहुंचाना आसान नहीं है। वहां सड़कें, पुल और तमाम तरह की इमारतें नष्ट हो गयीं हैं।  बिजली का संकट भी है।  ऐसे में कोई वहां पहुंचकर पहले की तरह सुविधाजनक स्थिति में नहीं रहेगा।  मदद देने के लिये बहुत चढ़ाई चढ़ने के साथ ही पैदल भी चलना होगा।  अपनी देह भारी कष्ट देकर पीड़ितों की मदद करना ही संभव है।  ऐसे में यह भी देखना होगा कि मदद के लिये योजना बना रहे लोगों का शरीर पुष्ट है भी कि नहीं, कहीं वह सुविधाओं के भोग के कारण जर्जर तो नहीं हो गया।  एक ज्ञान तथा योग साधक होने के नाते हमारी दृष्टि इस पर गयी है।  हम नियमित साइकिल चलाने वाले हैं। कभी कभी सप्ताह भर साइकिल नहीं चलाते तो अगली बार उसको चलाने में ऐसा लगता है कि हमारी टांगे जवाब दे रही हैं।  अंतर्जाल के कारण लंबी दूरी तक साइकिल नहीं चलाते। घर के आसपास दो तीन किलोमीटर की दूरी तय कर लेते हैं।  सात आठ किलोमीटर साइकिल चलाने का विचार आता है पर फिर छोड़ देते हैं।  ऐसे में मदद की घोषणा कर दूसरे से पैसा लेने वालों की फिटनेस का विचार हमारे मन में आता है। 
        टीवी चैनल वाले जब उत्तराखंड की आपदा का जीवंत प्रसारण दे रहे थे तब उनको हांफता देखकर हमें तरस आ रहा था। यह उनके लिये शायद पहला अवसर था जब उनको सामग्री स्वतः जुटानी पड़ रही थी।  अभी तक तो वह फिल्म, क्रिकेट, राजनीति और कला से जुड़े शिखर पुरुषों की सनसनी पर उनके समाचार प्रसारण चलते रहे थे। बहरहाल इन समस्त चैनलों को अपने प्रसारण के लिये हम इस मायने में आभार व्यक्त करते हैं कि उन्होंने पीड़ितों की मदद के लिये बहुत काम किया।  

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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Sunday, April 24, 2011

धार्मिक संत का देहावसान, क्रिकेट का खिलाड़ी का जन्म दिन और विज्ञापन-हिन्दी लेख (death of sant, birth day of one cricket player and advertisment-hindi lekh)

         हिन्दी समाचार टीवी चैनलों का तो कहना ही क्या? क्रिकेट के भगवान का जन्म दिन, धार्मिक संत का परमधाम गमन दिवस और क्लब स्तरीय क्रिकेट प्रतियोगिता के प्रचार को को बड़ी चालाकी से विज्ञापनों में एक साथ प्रसारित कर शोक, खुशी और नाच से संयोजित कार्यक्रम प्रसारित किए। क्रिकेट के भगवान को धार्मिक संत का महान शिष्य बता दिया जबकि अभी तक यह बात किसी को पता नहीं थी। दोनों एक साथ काम किये। संत को बड़ा बनाया तो खिलाड़ी को धार्मिक! सभी के हिन्दी समाचार टीवी चैनलों के कार्यक्रमों में गज़ब की एकरूपता है जिसे देखकर लगता नहीं कि उनके मालिक अलग अलग हैं। अगर मालिकों के नाम अलग अलग हों तो फिर लगता है कि उनका प्रायोजक कोई एक ही होना चाहिए जिसके अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष इशारों पर ही उनके कार्यक्रम चलते हैं। अगर किसी फिल्म अभिनेता, अभिनेत्री या क्रिकेट खिलाड़ी का जन्म दिन है तो एक ही समय पर उससे संबंधित कार्यक्रम सभी टीवी चैनलों पर एक साथ आता है। उससे दर्शक के विकल्प नहीं रहता। किसी बड़ी शख्सियत का वार्तालाप अगर एक पर सीधे प्रसारित होता है तो सभी पर वही दिखाई देता है।
         इस तरह की एकरूपता शक पैदा करती है कि कोई एक व्यक्ति या समूह अपने पैसे की दम पर टीवी चैनलों पर प्रभाव डाल रहा है। वरना यह संभव नहीं है। जिन लोगों को पत्रकारिता का अनुभव है वह जानते हैं कि सभी अखबारों में खबरें एक जैसी होती हैं पर उनके क्रम में एकरूपता नहंी होती। कई बार तो प्रमुख खबरों में ही अंतर हो जाता है। इसका कारण यह है कि हर अखबार के संपादक का अपना अपना नजरिया होता है और यह संभव नहीं है कि सभी का एक जैसा हो जाये।
         इन हिन्दी समाचार टीवी चैनलों की व्यवसायिक चालाकियों का भी एक ही तरीका है और संभव है कि एक दूसरे की नकल पर आधारित हो, पर जिस तरह देश के दर्शकों को नादान तथा चेतनाविहीन इन लोगों ने समझा है वह शक पैदा करता है कि ऐसा करने के लिये कोई उनको प्रेरित करता है। वैसे तारीफ करना चाहिए इन लोगों की व्यवसायिक चालाकी की पर मुश्किल यह है कि वह ऐसा कर यह संदेश देते हैं कि उनका अस्तित्व स्वतंत्र नहीं है और वह दृश्यव्य तथा अदृश्व्य धनदाताओं के आधीन ही वह कार्य करते हैं।
क्रिकेट खिलाड़ी का जन्म दिन पड़ा तो धार्मिक संत ने भी उसी दिन देह त्यागी। बताया गया कि क्रिकेट के भगवान उन धार्मिक संत के बहुत बड़े भक्त हैं। वह आज क्लब स्तरीय क्रिकेट प्रतियोगिता में अपना मैच नहीं खेलना चाहते। वह अपना जन्म दिन नहीं मना रहे। बताया तो यह गया कि क्रिकेट के भगवान ने अपने को कमरे में बंद कर लिया है। इस तरह क्लब स्तरीय प्रतियोगिता का प्रचार हुआ। क्रिकेट खिलाड़ी के जन्म दिन पर कसीदे भी पढ़ते हुए बताया गया कि वह तो सत्य साई के भक्त हैं। क्रिकेट के भगवान के साईं शीर्षक के कार्यक्रम प्रसारित हुए। फिर यह बताना भी नहीं भूले कि उस क्रिकेट के भगवान को लोगों ने जन्मदिन की बधाई दी।
        पुट्टापर्थी के धार्मिक संत सत्य साईं बाबा के निधन पर उनके भक्त दुःखी हैं। उन्होंने अपने क्षेत्र मेें बहुत काम किया। इस पर विवाद नहीं है पर उनके निधन पर घड़ियाली आंसु बहाता हुऐ हिन्दी समाचार चैनल अन्य लोगों के लिये हास्य का भाव पैदा कर रहे हैं। सच कहें तो एक तरह से वह शोक मना रहे हैं जिसमें क्रिकेट खिलाड़ी का जन्म दिन भी शामिल कर लिया तो क्लब स्तरीय क्रिकेट भी शामिल होना ही था। सारी दुनियां जानती हैं कि प्रचार माध्यम किसी के मरने पर कितना दुःखी होते हैं। सत्य साईं के निधन पर दुःख व्यक्त करना यकीनन प्रचार प्रबंधकों की व्यवसायिक मज़बूरी है। उनकी संपत्ति चालीस हजार करोड़ की बताई गयी है जो कि मामूली नहीं है। यकीनन उनके संगठन की पकड़ कहीं न कहीं न वर्तमान बाज़ार पर रही होगी। इसलिये उनके भावी उत्तराधिकारियों  को प्रसन्न करने के लिये यह प्रसारण होते रहे। बाज़ार के सौदागरों ने स्पष्ट रूप से प्रचार प्रबंधकों को इशारा किया होगा कि यह सब होना है। अगर ऐसा नहीं होता तो शोक जैसा माहौल बना रहे इन समाचार चैनलों ने विज्ञापन कतई प्रसारित नहीं किये होते।
              अगर ऐसा नहीं भी हो रहा है तो यह मानना पड़ेगा कि हिन्दी टीवी चैनलों के संगठनों के पास समाचार, विश्लेषण तथा चर्चाओं के लिये विद्वान नहीं है इसलिये वह क्रिकेट, फिल्म और मनोरंजन चैनलों की कतरनों के सहारे चल रहे हैं। इनके मालिक कमा खूब रहे हैं पर अपने चैनल पर खर्च कतई नहंी कर रहे। भले ही देश में ढेर सारे समाचार चैनल हैं पर प्रतियोगिता इसलिये नहीं है क्योंकि उनको विज्ञापन मिलने ही है चाहे जैसे भी कार्यक्रम प्रसारित करें। उनको बड़ी कंपनियां कार्यक्रमों या अपने उत्पाद के प्रचार के लिये प्रचार माध्यमों को विज्ञापन नहीं देती बल्कि उनके दोष सार्वजनिक रूप से लोगों के सामने नहीं आयें इसलिये देती है। यही कारण है कि प्रयोक्ताओं की पसंद नापसंद की परवाह नहीं है और थोपने वाले समाचार और विश्लेषण प्रस्तुत किये जा रहे हैं। अर्थशास्त्र पढ़ने वाले जानते हैं कि भारत में धन की कमी नहीं पर फिर भी लोग गरीब हैं क्योंकि यहां प्रबंध कौशल का अभाव है। पहले यह सरकारी क्षेत्र के बारे में कहा जाता था पर निजी क्षेत्र भी उससे अलग नहीं दिखता यह सब प्रमाणित हो रहा है।
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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
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Friday, February 11, 2011

कन्या भ्रुण हत्या से मध्ययुग की तरफ बढ़ता समाज-हिन्दी लेख (kanya bhrun hatya aur madhya yug ki taraf samaj-hindi lekh

हो सकता है कि कुछ लोग हमारी बुद्धि पर ही संशय करें, पर इतना तय है कि जब देश के बुद्धिजीवी किसी समस्या को लेकर चीखते हैं तब उसे हम समस्या नहीं बल्कि समस्याओं या सामाजिक विकारों का परिणाम मानते हैं। टीवी और समाचार पत्रों के समाचारों में लड़कियों के विरुद्ध अपराधों की बाढ़ आ गयी है और कुछ बुद्धिमान लोग इसे समस्या मानकर इसे रोकने के लिये सरकार की नाकामी मानकर हो हल्ला मचाते हैं। उन लोगों से हमारी बहस की गुंजायश यूं भी कम जाती हैं क्योंकि हम तो इसे कन्या भ्रुण हत्या के फैशन के चलते समाज में लिंग असंतुलन की समस्या से उपजा परिणाम मानते है। लड़की की एकतरफ प्यार में हत्या हो या बलात्कार कर उसे तबाह करने की घटना, समाज में लड़कियों की खतरनाक होती जा रही स्थिति को दर्शाती हैं।
इस देश में गर्भ में कन्या की हत्या करने का फैशन करीब बीस साल पुराना हो गया है। यह सिलसिला तब प्रारंभ हुआ जब देश के गर्भ में भ्रुण की पहचान कर सकने वाली ‘अल्ट्रासाउंड मशीन’ का चिकित्सकीय उपयोग प्रारंभ हुआ। दरअसल पश्चिम के वैज्ञानिकों ने इसका अविष्कार गर्भ में पल रहे बच्चे तथा अन्य लोगों पेट के दोषों की पहचान कर उसका इलाज करने की नीयत से किया था। भारत के भी निजी चिकित्सकालयों में भी यही उद्देश्य कहते हुए इस मशीन की स्थापना की गयी। यह बुरा नहीं था पर जिस तरह इसका दुरुपयोग गर्भ में बच्चे का लिंग परीक्षण कराकर कन्या भ्रुण हत्या का फैशन प्रारंभ हुआ उसने समाज की स्थिति को बहुत बिगाड़ दिया। फैशन शब्द से शायद कुछ लोगों को आपत्ति हो पर सच यह है कि हम अपने धर्म और संस्कृति में माता, पिता तथा संतानों के मधुर रिश्तों की बात भले ही करें पर कहीं न कहीं भौतिक तथा सामाजिक आवश्यकताओं की वजह से उनमें जो कृत्रिमता है उसे भी देखा जाना चाहिए। अनेक ज्ञानी लोग तो अपने समाज के बारे में साफ कहते हैं कि लोग अपने बच्चों को हथियार की तरह उपयोग करना चाहते हैं जैसे कि स्वयं अपने माता पिता के हाथों हुए। मतलब दैहिक रिश्तों में धर्म या संस्कृति का तत्व देखना अपने आपको धोखा देना है। जिन लोगों को इसमें आपत्ति हो वह पहले कन्या भ्रुण हत्या के लिये तर्कसंगत विचार प्रस्तुत करते हुए उस उचित ठहरायें वरना यह स्वीकार करें कि कहीं न कहीं अपने समाज के लेकर हम आत्ममुग्धता की स्थिति में जी रहे हैं।
जब कन्या भ्रुण हत्या का फैशन की शुरुआत हुई तब समाज के विशेषज्ञों ने चेताया था कि अंततः यह नारी के प्रति अपराध बढ़ाने वाला साबित होगा क्योंकि समाज में लड़कियों की संख्या कम हो जायेगी तो उनके दावेदार लड़कों की संख्या अधिक होगी नतीजे में न केवल लड़कियों के प्रति बल्कि लड़कों में आपसी विवाद में हिंसा होगी। इस चेतावनी की अनदेखी की गयी। दरअसल हमारे देश में व्याप्त दहेज प्रथा की वजह से लोग परेशान रहे हैं। कुछ आम लोग तो बड़े आशावादी ढंग से कह रहे थे कि ‘लड़कियों की संख्या कम होगी तो दहेज प्रथा स्वतः समाप्त हो जायेगी।’
कुछ लोगों के यहां पहले लड़की हुई तो वह यह सोचकर बेफिक्र हो गये कि कोई बात नहीं तब तक कन्या भ्रुण हत्या की वजह से दहेज प्रथा कम हो जायेगी। अलबत्ता वही दूसरे गर्भ में परीक्षण के दौरान लड़की होने का पता चलता तो उसे नष्ट करा देते थे। कथित सभ्य तथा मध्यम वर्गीय समाज में कितनी कन्या भ्रुण हत्यायें हुईं इसकी कोई जानकारी नहीं दे सकता। सब दंपतियों के बारे में तो यह बात नहीं कहा जाना चाहिए पर जिनको पहली संतान के रूप में लड़की है और दूसरी के रूप में लड़का और दोनों के जन्म के बीच अंतर अधिक है तो समझ लीजिये कि कहीं न कहंी कन्या भ्रुण हत्या हुई है-ऐसा एक सामाजिक विशेषज्ञ ने अपने लेख में लिखा था। अब तो कई लड़किया जवान भी हो गयी होंगी जो पहली संतान के रूप में उस दौर में जन्मी थी जब कन्या भ्रुण हत्या के चलते दहेज प्रथा कम होने की आशा की जा रही थी। मतलब यह कि यह पच्चीस से तीस साल पूर्व का सिलसिला है और दहेज प्रथा खत्म होने का नाम नहीं ले रही। हम दहेज प्रथा समाप्ति की आशा भी कुछ इस तरह कर रहे थे कि शादी का संस्कार बाज़ार के नियम पर आधारित है यानि धर्म और संस्कार की बात एक दिखावे के लिये करते हैं।
इसका कारण यह है कि देश में आर्थिक असमानता तेजी से बढ़ी है। मध्यम वर्ग के लोग अब निम्न मध्यम वर्ग में और निम्न मध्यम वर्ग के गरीब वर्ग में आ गये हैं पर सच कोई स्वीकार नहीं कर रहा। लड़कियों के लिये वर ढूंढना इसलिये भी कठिन है क्योंकि रोजगार के आकर्षक स्तर में कमी आई है। अपनी बेटी के लिये आकर्षक जीवन की तलाश करते पिता को अब भी भारी दहेज प्रथा में कोई राहत नहीं है। उल्टे शराब, अश्लील नृत्य तथा विवाहों में बिना मतलब के व्यय ने लड़कियों की शादी कराना एक मुसीबत बना दिया है। इसलिये योग्य वर और वधु का मेल कराना मुश्किल हो रहा है।
फिर पहले किसी क्षेत्र में लड़कियां अधिक होती थी तो दीवाने लड़के एक नहीं  तो दूसरी को देखकर दिल बहला लेते थे। दूसरी नहीं तो तीसरी भी चल जाती। अब स्थिति यह है कि एक लड़की है तो दूसरी दिखती नहीं, सो मनचले और दीवाने लड़कों की नज़र उस पर लगी रहती है और कभी न कभी सब्र का बांध टूट जाता है और पुरुषत्व का अहंकार उनको हिंसक बना देता है। लड़कियों के प्रति बढ़ते अपराध कानून व्यवस्था या सरकार की नाकामी मानना एक सुविधाजनक स्थिति है और समाज के अपराध को दरकिनार करना एक गंभीर बहस से बचने का सरल उपाय भी है।
हम जब स्त्री को अपने परिवार के पुरुष सदस्य से संरक्षित होकर राह पर चलने की बात करते हैं तो नारीवादी बुद्धिमान लोग उखड़ जाते हैं। उनको लगता है कि अकेली घूमना नारी का जन्मसिद्ध अधिकार है और राज्य व्यवस्था उसको हर कदम पर सुरक्षा दे तो यह एक काल्पनिक स्वर्ग की स्थिति है। यह नारीवादी बुद्धिमान नारियों पर हमले होने पर रो सकते हैं पर समाज का सच वह नहीं देखना चाहते। हकीकत यह है कि समाज अब नारियों के मामले में मध्ययुगीन स्थिति में पहुंच रहा है। हम भी चुप नहीं  बैठ सकते क्योंकि जब नारियों के प्रति अपराध होता है तो मन द्रवित हो उठता है और लगता है कि समाज अपना अस्तित्व खोने को आतुर है।
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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Friday, May 21, 2010

हाशिए पर ही न खड़े रहें-हिन्दी संपादकीय लेख

आज एक ब्लाग पर नज़र पड़ गयी जिसमें किसी अखबार का संपादकीय ‘मस्तराम’ संबंधी साहित्य हिन्दी ब्लाग जगत पर लाने की आलोचना की गयी थी। साथ ही उसमें अनेक ब्लागों की भाषा में झगड़े फसाद तथा अभद्र लेखन को भी इंगित किया गया। अक्सर हिन्दी ब्लाग के बारे में अखबारों में चर्चा पढ़ने को मिलती है जिसमें इसी तरह की बातें प्रकाशित की जाती हैं।
हम यहां किसी प्रकाशित लेख या संपादकीय की आलोचना नहीं करने जा रहे मगर नज़रिये पर सवाल तो उठा ही सकते हैं। मुख्य बात यह है कि आप हिन्दी ब्लाग जगत के बारे में अपनी राय किस तरह कायम करते हैं। क्या आप किसी एक दिन में एक साथ सौ ब्लाग देखते हैं? दूसरा सवाल यह है कि आप कहां हिन्दी ब्लाग देखते हैं, सर्च इंजिनों में या प्रायोजित फोरमों पर जाकर।
जब आप सर्च इंजिनों में किसी विषय संबंधी खोज करते हैं तो उससे संबंधित ही सामग्री ही सामने आती है, अगर आप मस्तराम शब्द से ढूंढेंगे तो दूसरा विषय शायद न आये। ऐसे में आप यह तो कह नहीं सकते कि केवल मस्तराम विषय पर ही लिखा जा रहा है। अगर आप हिन्दी ब्लाग जगत में लड़ाई झगड़े या अभद्र भाषा लिखे जाने की बात कर रहे हैं तो इसका सीधा आशय है कि आप ब्लागवाणी या चिट्ठाजगत के हाशिये पर ही पढ़ते हैं, मुख्य क्षेत्र में पृष्ठ बदलकर देखने में आपको असुविधा लगती है। ऐसे में आप यह कैसे कह सकते हैं कि हिन्दी ब्लाग जगत में सब कुछ बुरा लिखा जा रहा है।
चिट्ठाजगत या ब्लागवाणी प्रायोजित फोरम है-उनके संचालकों के इस दावे पर यकीन करना मुश्किल है कि वह हिन्दी समाज सेवा के लिये हैं-इसलिये उनके सानिध्य में लिखने वाले ब्लाग लेखकों को हिट अधिक दिखाने ही पड़ते हैं-यह उनका निजी विषय है और इस पर कोई टिप्पणी करना ठीक नहीं। इन फोरमों के लेखकों के पाठ प्रतिदिन ही हाशिए पर सबसे ऊपर देखते हैं। अब यह कहना कठिन है कि संचालन मंडल से जुड़े लोग यह करते हैं या कुछ तेज तर्रार ब्लाग लेखक चालाकी से अपने पाठों को हिट कर ऊपर पहुंचाते हैं-वैसे अनेक ब्लाग लेखक ऐसे सीधे आरोप अपने पाठों में लगाते रहते हैं। एक बात तय रही कि इस ब्लागवाणी तथा चिट्ठाजगत का हाशिया ही सब कुछ नहीं है-कुछ ब्लाग लेखक तो कहते हैं कि वहां कुछ भी आम पाठक के लिये पढ़ने के लिये नहीं होता। दिल्ली तथा अन्य बड़े शहरों के प्रभावशाली लेखकों का वर्चस्व यहां ऐसे ही दिखता है जैसे कि हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता मे। सच बात तो यह है कि जिस तरह कहा जाता है कि आदमी अपने जिंदगी में थक जाने के बाद ऐसे ही हाशिए ढूंढता है जहां से वह महत्वपूर्ण दिखे भले ही कोई प्रभावशाली काम न करे। आप साहित्य, समाज अन्य कला गतिविधियों में लगी संस्थाओं के पत्रों के प्रारूप पर दृष्टिपात करें तो भूतपूर्व प्रभावशाली लोग अपना नाम लिखाते हैं-वैसे कोई डाक्टर दवा लिखता है तो उसके पर्चे के हाशिए पर भी कुछ अस्पतालों या अन्य सहयोगी चिकित्सकों के नाम होते हैं। अपने देश के लोगों के पास भी समय बहुत है। पत्र मिलने के बाद पढ़ते हैं फिर भी उनके पास इतना समय तो रह जाता है कि वह कथित प्रभावशाली लोगों का नाम पढ़ें। पाठकों की इसी कमी का लाभ समाज सेवक और लेखक उठाना चाहते हैं। इसके विपरीत जो बूढ़े हो गये पर अभी भी अपने क्षेत्र में सक्रिय हैं वह कभी हाशिए पर जाने का विचार नहीं करते।
यह हाशिए का मोह हिन्दी जगत की सबसे बड़ी समस्या है अब अंतर्जाल पर भी यही होता लग रहा है। ब्लागवाणी या चिट्ठाजगत की गतिविधियां कैसी हैं यह चर्चा का विषय नहीं है बल्कि यहां ब्लाग पढ़ने वाले पाठकों को हाशिए से अलग मुख्य क्षेत्र में आकर ब्लाग पढ़ना चाहिए। एक ब्लाग लेखक होने के नाते हाशिए के हिट ब्लाग यह लेखक भी देखता है पर इसका आशय यह नहीं है कि दूसरे ब्लाग न देखें। जब आप हिन्दी ब्लाग जगत पर संपूर्णतया से लिखना चाहते हैं तो फिर आप इस हाशिए से दूर ही रहें क्योंकि वहां पर सीमित रहने का मतलब यह है कि आप अपने विषय को सीमित ही रख पायेंगे। अगर इन फोरमों से ब्लाग सूची बनायेंगे तो वह आठ से दस से अधिक नहीं होगी। अनुभवी ब्लाग लेखकों से चाहें तो ऐसी सूची मांग लें। वह पाठ देखते ही समझ जाते हैं कि आज यह टिप्पणियां, पसंद तथा पाठक संख्या अधिक लेकर दोनों फोरमों के हाशिए की शोभा बढ़ायेंगें। यकीनन यह हिट ब्लाग लेखक बहुत अच्छा लिखते हैं क्योंकि उनकी छह लाईनों के पाठ पर लोग साठ दूसरे ब्लाग लेखक पाठ लिख डालते हैं। पंद्रह दिनों तक बहस चलती है। अभी तक दो ब्लाग लेखक नंबर एक के दावेदार थे अब तीसरा भी खड़ा हो गया है। तीसरेे को देखकर चार पांच दूसरे भी तैयार हो गये हैं। हम उनके लिखने को चुनौती नहीं दे रहे पर अंततः यह तय बात है कि उन पर हिन्दी ब्लाग जगत का केंद्रीय बिन्दू स्थापित नहीं है। फोरमों के हाशिए प्रतिदिन शीर्ष पर रहने वाले दो तीन लेखकों को छोड़कर बाकी के बारे में यह कहना कठिन है कि आम पाठक के लिये कुछ अधिक महत्व रखते हैं अलबत्ता ब्लाग लेखक जिज्ञासावश उनको पढ़ते हैं वह भी इसलिये क्योंकि उनको सुविधाजनक लगता है।
ऐसे में अगर आप फोरम पर ब्लाग देख रहे हैं तो हाशिए के हिट देखने की बजाय मुख्य क्षेत्र में ब्लाग देखें। पृष्ठ बदलने का कष्ट उठायें क्योंकि शौकिया तथा गंभीर ब्लाग लेखकों से परिचित हुआ जा सके। हिन्दी को बहुत बड़ा सफर अंतर्जाल पर तय करना है और कोई नहीं जानता वह क्या क्या रूप लेकर आगे बढ़ेगी। कम से कम पाठकों तथा विश्लेषकों को हाशिए पर ही खड़े नहीं रहना चाहिए।
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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Friday, February 5, 2010

दूसरे की लोकप्रियता भुनाने का प्रयास अंतर्जाल पर न करें-हिन्दी आलेख (lokpriyata aur internet-hindi lekh)

तीन वर्ष से जारी हमारी निजी ‘चिट्ठाचर्चा’ में पहली बार दो ऐसे शब्दों से सामना हुआ जिनके अर्थ और भाव से हम आज तक परिचित नहीं थे। वह हैं ‘साइबर स्कवैटिंग’ और ‘टाइपो स्क्वैटिंग’। मुश्किल तो यही है कि भाई लोग अंग्रेजी हिज्जे नहीं लिखते जिससे उनका शुद्ध उच्चारण और हिन्दी अर्थ कहीं से पता करें। बहरहाल ‘साइबर स्कवैटिंग’ और ‘टाइपो स्क्वैटिंग’ को दूसरे के नाम की लोकप्रियता का उपयोग अपने हित में भुनाने के प्रयास को कह सकते हैं। ‘साइबर स्कवैटिंग’ का मतलब यह है कि किसी लोकप्रिय नाम या संस्था के आधार पर अपनी वेबसाईट या ब्लाग का पता और नाम तय करना। ‘टाईपो स्क्वैटिंग’ का मतलब है कि किसी लोकप्रिय नाम या संस्था के नाम से मिलता जुलता नाम रखना ताकि लोग भ्रमित होकर वहां आयें।
अंतर्जाल पर जब हमने लिखना शुरु किया तब ऐसा प्रयास किया था कि जिससे दूसरे मशहूर नामों का लाभ हमें मिले। तब इस बात का आभास नहीं था कि जिनको सामान्य जीवन को हम गलत समझते आये हैं वही हम करने जा रहे हैं। वैसे इस विषय पर हिन्दी ब्लाग जगत में विवाद भी चल रहा है पर इस पाठ का उससे कोई लेना देना नहीं है क्योंकि यह विषय अत्यंत व्यापक है और इस बारे में नये लेखकों के साथ आम लोगों तक भी यह संदेश पहुंचाना जरूरी है कि इस तरह लोकप्रियता का उपयोग विवाद पैदा कर सकता है।
आपने देखा होगा कि अनेक बार बाजारों में ऐसे दृश्य दिखाई देते हैं जहां एक ही वस्तु की दुकाने होती हैं। जिनमें एक नाम ‘अमुक’ होता है तो दूसरा ‘न्यू अमुक’ कर लिखता है। अनेक शहरों में चाट, गजक, नमकीन तथा मिठाई की प्रसिद्ध दुकानें होती हैं और उसका उपयोग अन्य लोग ‘न्यू’ या अन्य शब्द जोड़कर करते हैं। कई बार तो ऐसा भी होता है कि किसी शहर की कोई दुकान अपनी चीज के कारण प्रसिद्ध है तो ठीक उसी नाम से दूसरे शहर में खुल जाती है। अनेक बार उपभोक्ता वहां जाते भी हैं और पूछने पर मालिक लोग उसी की शाखा होने का दावा करते हैं। अब यह अलग बात है कि दूसरे शहर जाने पर जब उस मशहूर दुकान वाले से पूछा जाता है तो इसका खंडन हो जाता है। कोटा की प्याज कचौड़ी मशहूर है और उसे बनाने वाले की दूसरे शहर में कोई दुकान नहीं है पर दूसरे शहरों के कुछ दुकानदार ऐसा दावा करते हैं।
दूसरे की लोकप्रियता भुनाने का यह प्रयास कोई नया नहीं है पर सचाई यह है कि यह कानूनी या नैतिक रूप से गलत न भी हो पर इससे स्वयं की छबि प्रभावित जरूर होती है-कई लोग तो नकलची तक कह देते हैं। ऐसा करते समय अगर हम यह न सोचें कि दूसरा क्या कहेगा पर यह तो देखें कि हम ऐसा करते हुए दूसरों के बारे में क्या सोचते हैं? ऐसे में हमारी मेहनत ईमानदार होती है पर फिर भी उसमें नेकनीयती की कमी से हमारी छबि प्रभावित होती है।
जब हम अंतर्जाल पर लोकप्रिय नामों से जुड़ने का प्रयास कर रहे थे तब अपनी गलती का पता नहीं था, और एक वर्ष पहले तक ही यह आभासा हो पाया कि यहां ब्लाग के पते और नाम से अधिक ताकतवर तो उसमें लिखी गयी सामग्री है। पहले कुछ ब्लागों में नाम उपयोग किये तो कहीं पते भी लोकप्रिय नामों से लिये गये। बाद में उनमें से अनेक हटा लिये। इस लेखक के ब्लाग स्पाट और वर्डप्रेस पर बीस ब्लाग हैं जिनमें अब एक ब्लाग ऐसा बचा है भले ही वह एक लोकप्रिय नाम से मिलता है पर उसकी लोकप्रियता अब भी कम है। प्रसंगवश इसी लेखक ने अपने दो छद्म ब्लाग भी बनाये थे पर यह संयोग ही था कि वह उत्तरप्रदेश के एक प्रसिद्ध लेखक से उसके नाम और पते मेल खा गये। दरअसल वह नाम भी ऐसा ही था जिसे लेकर इस लेखक की नानी उसे बचपन में बुलाती थी। उन पर दो वर्ष से कुछ नहीं लिखा पर आठ दस पाठक उन पर आ ही जाते हैं-उन ब्लाग को लेकर मन में कोई गलती अनुभव भी नहीं होती। अलबत्ता अब तो यह सोच रहे हैं कि उस अपने एक ब्लाग स्पाट के ब्लाग का पता भी बदल दें क्योंकि आगे चलकर लोग यही कहेंगे कि देखो यह दूसरे की लोकप्रियता भुना रहा है।
मुख्य बात यह है कि अंतर्जाल पर अगर तात्कालिक उद्देश्य पूरे करना हों तो यह ठीक हो सकता है पर कालांतर में इसका कोई लाभ नहीं होता। जिनको लंबे समय तक टिकना है उन्हें तो इससे दूर ही रहना चाहिए। अगर आपने वेबसाईट या ब्लाग का नाम किसी दूसरे की लोकप्रियता को बनाया तो वह आपकी छबि को भी प्रभावित कर सकता है। दूसरी बात यह है कि हम जहां अपने शब्द लिखते हैं उनकी शक्ति का समझना जरूरी है। उस क्षेत्र को एच.टी.एम.एल कहा जाता है। हम जो शीर्षक, सामग्री या लेबल टैग लगाते हैं वह हमारे ब्लाग को सच इंजिनों में ले जाते हैं-एक तरह से शब्द ही चालक हैं अगर आपको किसी की लोकप्रियता का लाभ उठाना है तो बस अपने शीर्षक में ही उसका उपयोग करें कि दूसरे को यह न लगे कि आपने उसके नाम का उपयोग किया है। अगर वह आपका मित्र या जानपहचान वाला हो तो उसकी प्रशंसा में एक दो पाठ लिख दें-उसका नाम शीर्षक के साथ दें। याद रहे यहां किसी की निंदा या आलोचना करते हुए नाम लेने से बचें। ब्लाग का पता या नाम अगर किसी लोकप्रिय नाम पर लिखेंगे तो उससे अपना छबि को स्वतंत्र रूप से नहीं स्थापित कर पायेंगे। फिर उससे आप स्वयं ही संकीर्ण दायरे में यह सोचकर सिमट जायेंगे कि आप तो वैसे ही हिट हैं और नवीन प्रयोग और रचना नहीं कर पायेंगे।
आगरा का पेठा मशहूर है तो भारत की हिन्दी-अभिप्राय है कि सार्वज्निक महत्व के नामों को लेकर झगड़ा नहीं होता। इतना तो चल जाता है पर निजी लोकप्रिय नामों के उपयोग को लेकर अनेक जगह झगड़ा भी होता है। दूसरी बात यह भी है कि व्यक्ति की निजी लोकप्रियता को तभी भुनाने का प्रयास करें जब आपके पास हूबहू उस नाम के प्रयोग का पुख्ता आधार हो। अगर राजनीति, साहित्य, कला, फिल्म या अन्य किसी क्षेत्र में कोई प्रसिद्ध नाम है और उसका आप इस्तेमाल करते हैं तो वह कानून का मामला बन सकता है। अभी अंतर्जाल पर ऐसा कोई कानून है कि पता नहीं पर इसका आशय यह नहीं है कि चाहे किसी का नाम भी उपयेाग किया जा सकता है। ब्लाग या वेबसाईट का पता भले ही आसानी से मिल जाये पर किसी मामले पर अदालतें संज्ञान ले सकती हैं। एक बात याद रखिये संस्थान पंजीकृत होते हैं पर निजी लोकप्रियता नहीं। इसका मतलब यह नहीं है कि किसी भी लोकप्रिय व्यक्ति का नाम कोई उपयोग करने लगे-लोगों की निजी लोकप्रियता की रक्षा न्याय के दायरे में है भले ही उसके लिये कोई कानून न बना हो। संभवतः अदालतों में आत्मुग्धता का तर्क नहीं चले कि ‘यह तो हमें मिल गया, हमने हड़पा नहीं है’। एक प्रसिद्ध नेता के नाम पर बनी वेबसाईट को गलत ठहराया जा चुका है-ऐसा उसी लेख में पढ़ने को मिला जिसमें ‘साइबर स्कवैटिंग’ और ‘टाइपो स्क्वैटिंग’ मिले।
कहने का अभिप्राय यह है कि जितना हो सके अपनी लोकप्रियता अपने पाठों से जुटाने का प्रयास करें। अपने ब्लाग और वेबसाईटों के पतों में लोकप्रिय नामों का उपयोग करने से क्या लाभ? यह काम तो एक पाठ से किया जा सकता है। दूसरी बात यह है कि अधिक से अधिक सकारात्मक लेखन करें तो स्वतः ही अंतर्जाल पर आपकी लोकप्रियता बढ़ेगी। दुकानों का बोर्ड तो लोग इसलिये बनाते हैं ताकि ग्राहक उसे देखकर आयें। इस प्रयास में होता यह है कि अच्छी चीज बनायें या बेचें पर फिर भी उनकी छबि नकलची की ही होती है। लोग कमाने के लिये झेलते हैं क्योंकि वह रोज बोर्ड बदल नहीं सकते जबकि ब्लाग या वेबसाईट पर तो एक नहीं हजारों बोर्ड शीर्षक बनाकर लगाये जा सकते हैं। इसलिये यहां दूसरे की लोकप्रियता को भुनाने का प्रयास कर अपनी छबि न बिगाड़े तो ही अच्छा! कानून यह नैतिकता के प्रश्न से बड़ी बात यह है कि हम अपनी छबि वैसे ही बनायें जैसी कि दूसरों से अपेक्षा करते हैं।
संदर्भ के लिये यह दिलचस्प पाठ अवश्य पढ़ें।
http://nilofer73.blogspot.com/2010/02/blog-post.html


कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
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3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
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Tuesday, November 17, 2009

लोग अपने से बात करते हुए पाठ अंतर्जाल पर पढ़ना चाहते हैं-संपादकीय

आज यह ब्लाग/पत्रिका की पाठ पठन/पाठक संख्या एक लाख को पार कर गयी। इस ब्लाग/पत्रिका के साथ इसके लेखक संपादक के दिलचस्प संस्मरण जुड़े हुए हैं।  यह ब्लाग जब बनाया तब लेखक का छठा ब्लाग था। उस समय दूसरे ब्लाग/पत्रिकाओं पर यूनिकोड में न रखकर सामान्य देव फोंट में रचनाएं लिख रहा था। वह किसी के समझ में  नहीं आते थे।  ब्लाग स्पाट के हिंदी ब्लाग से केवल शीर्षक ले रहा था।  इससे हिन्दी ब्लाग लेखक उसे सर्च इंजिन में पकड़ रहे थे पर बाकी पाठ उनकी समझ में नहीं आ रहा था। यूनिकोड में रोमन लिपि में लिखना इस लेखक के लिये कठिन था।  एक ब्लाग लेखिका ने पूछा कि ‘आप कौनसी भाषा में लिख रहे हैं, पढ़ने में नहीं आ रहा।’ उस समय इस ब्लाग पर छोटी क्षणिकायें रोमन लिपि से यूनिकोड में हिन्दी में लिखा इस पर प्रकाशित की गयीं।  कुछ ही मिनटों में किसी अन्य ब्लाग लेखिका ने इस पर अपनी टिप्पणी भी रखी।  इसके बावजूद यह लेखक रोमन लिपि में यूनिकोड हिंदी लिखने को तैयार नहीं था।  बहरहाल लेखिका को इस ब्लाग का पता दिया गया और उसने बताया कि इसमें लिखा समझ में आ रहा है। उसके बाद वह लेखिका फिर नहीं दिखी पर लेखक ने तब यूनिकोड हिन्दी में लिखना प्रारंभ किया तब धीरे धीरे बड़े पाठ भी लिखे।
उसके बाद तो बहुत अनुभव हुए। यह ब्लाग प्रारंभ से ही पाठकों को प्रिय रहा है।  यह ब्लाग तब भी अधिक पाठक जुटा रहा था जब इसे एक जगह हिन्दी के ब्लाग दिखाने वाले फोरमों  का समर्थन नहीं मिलता था। आज भी यहां पाठक सर्वाधिक हैं और एक लाख की संख्या इस बात का प्रमाण है कि हिन्दी अपनी गति से अंतर्जाल पर बढ़ रही है।  मुख्य बात है विषय सामग्री की।  इस ब्लाग पर अध्यात्मिक रचनाओं के साथ व्यंग, कहानी, कवितायें भी हैं।  हास्य कवितायें अधिक लोकप्रिय हैं पर अध्यात्मिक रचनाओं की तुलना किसी भी अन्य विधा से नहीं की जा सकती।  लोगों  की अध्यात्मिक चिंतन की प्यास इतनी है कि उसकी भरपाई कोई एक लेखक नहीं कर सकता।  इसके बाद आता है हास्य कविताओं का।  यकीनन उनका भाव आदमी को हंसने को मजबूर करता है। हंसी से आदमी का खून बढ़ता है।  दरअसल एक खास बात नज़र आती है वह यह कि यहां लोग समाचार पत्र, पत्रिकाओं तथा किताबों जैसी रचनाओं को अधिक पसंद नहीं करते।   इसके अलावा क्रिकेट, फिल्म, राजनीति तथा साहित्य के विषय में परंपरागत विषय सामग्री, शैली तथा विधाओं से उन पर प्रभाव नहीं पड़ता।  वह अपने से बात करती हुऐ पाठ पढ़ना चाहते हैं।  अंतर्जाल पर लिखने वालों को यह बात ध्यान रखना चाहिये कि उनको अपनी रचना प्रक्रिया की नयी शैली और विधायें ढूंढनी होंगी।  अगर लोगों को राजनीति, क्रिकेट, फिल्म, आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक विषयों पर परंपरागत ढंग से पढ़ना हो तो उनके लिये अखबार क्या कम है? अखबारों जैसा ही यहां लिखने पर उनकी रुचि कम हो जाती है। हां, यह जरूर है कि अखबार फिर यहां से सामग्री उठाकर छाप देते हैं। कहीं नाम आता है कहीं नहीं।  इस लेखक के गांधीजी तथा ओबामा पर लिखे गये दो पाठों का जिस तरह उपयोग  एक समाचार पत्र के स्तंभकार ने किया वह अप्रसन्न करने वाला था।  एक बात तय रही कि उस स्तंभकार के पास अपना चिंतन कतई नहीं था। उसने इस लेखक के  तीन पाठों से अनेक पैरा लेकर छाप दिये।  नाम से परहेज! उससे यह लिखते हुए शर्म आ रही थी कि ‘अमुक ब्लाग लेखक ने यह लिखा है’।  सच तो यह है कि इस लेखक ने अनेक समसामयिक घटनाओं पर चिंतन और आलेख लिखे पर उनमें किसी का नाम नहीं दिया। उनको संदर्भ रहित लिखा गया इसलिये कोई समाचार पत्र उनका उपयोग नहीं कर सकता  क्योंकि समसामयिक विषयों पर हमारे प्रचार माध्यमों को अपने तयशुदा नायक और खलनायकों पर लिखी सामग्री चाहिये। इसके विपरीत यह लेखक मानता है कि प्रकृत्तियां वही रहती हैं जबकि घटना के नायक और खलनायक बदल जाते हैं। फिर समसामयिक मुद्दों पर क्या लिखना? बीस साल तक उनको बने रहना है इसलिये ऐसे लिखो कि बीस साल बाद भी ताजा लगें-ऐसे में किसी का नाम देकर उसे बदनाम या प्रसिद्ध करने से अच्छा है कि अपना नाम ही करते रहो।

मुख्य बात यह है कि लोग अपने से बात करते हुऐ पाठ चाहते हैं। उनको फिल्म, राजनीति, क्रिकेट तथा अन्य चमकदार क्षेत्रों के प्रचार माध्यमों द्वारा निर्धारित पात्रों पर लिख कर अंतर्जाल पर प्रभावित नहीं किया जा सकता।  अपनी रचनाओं की भाव भंगिमा ऐसी रखना चाहिये जैसी कि वह पाठक से बात कर रही हों। यह जरूरी नहीं है कि पाठक टिप्पणी रखे और रखे तो लेखक उसका उत्तर दे।  पाठक को लगना चाहिये कि जैसे कि वह अपने मन बात उस पाठ में पढ़ रहा है या वह पाठ पढ़े तो वह उसके मन में चला जाये।  अगर वह परंपरागत लेखन का पाठक होता तो फिर इस अंतर्जाल पर आता ही क्यों?  अपने मन की बात ऐसे रखना अच्छा है जैसे कि सभी को वह अपनी लगे।

इस अवसर पर बस  इतना ही। हां, जिन पाठकों को इस लेखक के समस्त ब्लाग/पत्रिकाओं का संकलन देखना हो वह हिन्द केसरी पत्रिका को अपने यहां सुरक्षित कर लें। इस पत्रिका के पाठकों के लिये अब इस पर यह प्रयास भी किया जायेगा कि ऐसे पाठ लिखे जायें जो उनसे बात करते हुए लगें।

Sunday, October 18, 2009

दीपावली का पर्व निकल गया-आलेख

होश संभालने के बाद शायद जिंदगी में यह पहली दिवाली थी जिसमें मिठाई नहीं खाई। कभी इसलिये मिठाई नहीं खाते थे कि बस अब दिवाली आयेगी तो जमकर खायेंगेे। हमें मिठाई खाने का शौक शुरु से रहा है और कुछ लोग मानते हैं कि मिठाई के शौकीन झगड़ा कम करते हैं क्योंकि उनकी वाणी में मधुरता आ जाती है। हम भी इस बात को मानते हैं पर वजह दूसरी है। दरअसल अधिक मीठा खाने वाले मोटे हो जाते हैं इसलिये उनके झगड़ा करने की ताकत कम होती है। अगर कहीं शारीरिक श्रम की बात आ जाये तो हांफने लगते हैं। हमारे साथ भी यही होता रहा है, अलबत्ता हमने शारीरिक श्रम खूब किया है और साइकिल तो आज भी चलाते हैं। हां, यह सच है कि मोटे अपने खाने की चिंता अधिक करते हैं क्योंकि उनके खाली पेट मेें जमा गैस उनको सताने लगती है जिसे हम भूख भी कहते हैं। इसके बावजूद हम मानते हैं कि मोटे लोग शांतिप्रिय होते हैं-कहने वाले कहते रहें कि डरपोक होते हैं पर यह सच है कि कोई उन पर आसानी से हाथ डालने की भी कोई नहीं सोचता।
दिवाली के अगली सुबह बाजार में निकले तो देखा कि बाजार में मिठाईयां बिक रही थीं। बिकने की जगह देखकर ही मन दुःखी हो रहा था। इधर हम घर पर ही जब कभी खाने की कोई सामग्री देखने को मिलती है तो उसे हम स्वतः ही प्लेट से ढंकने लगते हैं। मंगलवार हनुमान जी का प्रसाद ले आये और अगर कभी उसका लिफाफा खुला छूट गया तो फिर हम न तो खाते हैं न किसी को खाने देते हैं। मालुम है कि आजकल पर्यावरण प्रदूषण की वजह से अनेक प्रकार की खतरनाक गैसें और कीड़े हवा में उड़कर उसे विषाक्त कर देते हैं। ऐसे में बाजार में खुली जगह पर रखी चीज-जिसके बारे में हमें ही नहीं पता होता कि कितनी देर से खुले में पड़ी है-कैसे खा सकते हैं। पिछले सात वर्षों से योग साधना करते हुए अब खान पान की तरह अधिक ही ध्यान देने लगे हैं तब जब तक किसी चीज की शुद्धता का विश्वास न हो उसे ग्रहण नहीं करते। यही कारण है कि बीमार कम ही पड़ते हैं और जब पड़ते हैं तो दवाई नहीं लेते क्योंकि हमें पता होता है कि हम क्या खाने से बीमार हुए हैं? उसका प्रभाव कम होते ही फिर हमारी भी वापसी भी हो जाती है।
बाजार में सस्ती मिठाईयां गंदी जगहों के बिकते देखकर हम सोच रहे थे कि कैसे लोग इसे खा रहे होंगे। कई जगह डाक्टरों की बंद दुकानें भी दिखीं तब तसल्ली हो जाती थी कि चलो आज इनका अवकाश है कल यह उन लोगों की मदद करेंगी जो इनसे परेशान होंगे। वैसे मिठाई के भाव देखकर इस बात पर यकीन कम ही था कि वह पूरी तरह से शुद्ध होंगी।
ज्यादा मीठा खाना ठीक नहीं है अगर आप शारीरिक श्रम नहीं करते तो। शारीरिक श्रम खाने वाले के लिये मीठा हजम करना संभव है मगर इसमें मुश्किल यह है कि उनकी आय अधिक नहीं होती और वह ऐसी सस्ती मिठाई खाने के लिये लालायित होते हैं। संभवतः सभी बीमार इसलिये नहीं पड़ते क्योंकि उनमें कुछ अधिक परिश्रमी होते हैं और थोड़ा बहुत खराब पदार्थ पचा जाते हैं पर बाकी के लिये वह नुक्सानदेह होता है। वैसे इस बार अनेक हलवाईयों ने तो खोये की मिठाई बनाई हीं नहीं क्योंकि वह नकली खोए के चक्कर में फंसना नहीं चाहते थे। इसलिये बेसन जैसे दूध न बनने वाले पदार्थ उन्होंने बनाये तो कुछ लोगों ने पहले से ही तय कर रखा था कि जिस प्रकार के मीठे में मिलावट की संभावना है उसे खरीदा ही न जाये।
पटाखों ने पूरी तरह से वातावरण को विषाक्त किया। अब इसका प्रभाव कुछ दिन तो रहेगा। अलबत्ता एक बात है कि हमने इस बार घर पर पटाखों की दुर्गंध अनुभव नहीं की। कुछ लोगों ने शगुन के लिये पटाखे जलाये पर उनकी मात्रा इतनी नहीं रही कि वह आसपास का वातावरण अधिक प्रदूषित करते। महंगाई का जमाना है फिर अब आज की पीढ़ी-कहीं पुरानी भी- लोग टीवी और कंप्यूटर से चिपक जाती है इसलिये परंपरागत ढंग से दिवाली मनाने का तरीका अब बदल रहा है।
अपनी पुरानी आदत से हम बाज नहीं आये। घर पर बनी मिठाई का सेवन तो किया साथ ही बाजार से आयी सोहन पपड़ी भी खायी। अपने पुराने दिनों की याद कभी नहीं भूलते। अगर हमसे पूछें तो हम एक ही संदेश देंगे कि शारीरिक श्रम को छोटा न समझो। दूसरा जो कर रहा है उसका ख्याल करो। उपभोग करने से सुख की पूर्ण अनुभूति नहीं होती बल्कि उसे मिल बांटकर खाने में ही मजा है। इस देश में गरीबी और बेबसी उन लोगों की समस्या तो है जो इसे झेल रहे हैं पर हमें भी उनकी मदद करने के साथ सम्मान करना चाहिए। ‘समाजवाद’ तो एक नारा भर है हमारे पूरे अध्यात्मिक दर्शन में परोपकार और दया को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है ताकि समाज स्वतः नियंत्रित रहे। यह तभी संभव है जब अधिक धन वाले अल्प धन वालों की मदद बिना प्रचार के करें। कहते हैं कि दान देते समय लेने वाले से आंखें तक नहीं मिलाना चाहिए। इसके विपरीत हम देख रहे हैं कि हमारे यहां के नये बुद्धिजीवी डंडे और नियम कें जोर पर ऐसा करना चाहते हैं। इसके लिये वह राज्य को मध्यस्थ की भूमिका निभाने का आग्रह करते हैं। इसका प्रभाव यह हुआ है कि समाज के धनी वर्ग ने सभी समाज कल्याण अब राज्य का जिम्मा मानकर गरीबों की मदद से मूंह फेर लिया है और हमारे सामाजिक विघटन का यही एक बड़ा कारण है।
खैर, इस दीपावली के निकल जाने पर मौसम में बदलाव आयेगा। सर्दी बढ़ेगी तो हो सकता है कि मौसम बदलने से भी बीमारी का प्रभाव बढ़े। ऐसे में यह जरूरी है कि सतर्कता बरती जाये।
इधर ब्लाग पर अनेक टिप्पणीकर्ता लिखते हैं कि आप अपना फोटो क्यों नहीं लगाते? या लिखते हैं कि आप अपना फोन नंबर दीजिये तो कभी आपके शहर आकर आपके दीदार कर ले। हम दोनों से इसलिये बच रहे हैं कि कंप्यूटर पर लिखने की वजह से हमारा पैदल चलने का कार्यक्रम कम हो गया है इसलिये पेट अधिक बाहरं निकल आया है। फोटो भी अच्छा नहीं खिंच रहा। इसलिये सोचा है कि कल से योगासन का समय बढ़ाकर अपना चेहरा मोहरा ठीक करें तो फोटो खिंचवाकर लगायेंगे और नंबर भी ब्लाग पर लिखेंगे।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://dpkraj.blogspot.com
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