Wednesday, September 3, 2014

पूर्व से ही आ सकती है स्वतंत्र मानसिकता की खुशबू-हिन्दी चिंत्तन लेख(poorva se hee aa saktee hai swatantra mansikta ki khushbu-hindi chinntan article)




            अभी हाल ही में भारतीय प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्रमोदी ने जापान का दौरा किया। वहां उन्होंने वहां के प्रधानमंत्री को भारत का पवित्र ग्रंथ श्रीमद्भागवत गीता उपहार में दिया।  इस यात्रा के राजनीतिक संदर्भ चाहें जो भी हों अध्यात्मिक विचार धारा के पोषक भारतीय समाज के लिये यह एक नवीन विषय बन गया है जब किसी राजनीतिक मंच पर श्रीगीता का नाम इस तरह लिया गया हो।  अभी तक भारत के शिखर पुरुष पश्चिम की तरफ देखते थे पर यह पहला अवसर है जब पूर्व से रिश्ता बनाने में विशेष दिलपस्पी देखी गयी है।
            इस पर पारंपरिक दृष्टिकोण से अलग हटकर विचार करें तब यह निष्कर्ष सामने आता है कि हम अपने भौतिक विकास का स्वरूप पश्चिम की बजाय पूर्व के आधार पर तय करें तो शायद बेहद अच्छा रहे।  जापान दुनियां एक धनी राष्ट्र है।  द्वितीय विश्वयुद्ध में उस पर अमेरिका ने परमाणु  बम फैंका था।  यह मलाल आज भी वहां के लोगों के मन में है।  अमेरिका ने अभी तक एशियाई देशों पर ही बम बरसाये हैं।  दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन राजपुरुषों ने अमेरिका से दोस्ती की अंततः वह उनका ही दुश्मन बना। सद्दाम हुसैन इसका एक सबसे अच्छा उदाहरण है। ऐसे में उस पर यकीन करना हमेशा ही कठिन रहता है।  मूलतः भारत का अमेरिका से कोई बैर नहंी है पर उसकी रणनीतियां हमेशा ही संदिग्ध मानी जाती हैं।  दूसरी बात यह कि वह दुनियां का सबसे अमेरिका विश्व  का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र है पर उसकी अर्थव्यवस्था पराश्रित मानी जाती है।  इसके विपरीत जापान एक आत्मनिर्भर राष्ट्र है।  सबसे बड़ी बात यह कि वह एशियाई क्षेत्र होने के साथ ही सहधर्मी राष्ट्र है।  वहां बौद्धधर्म प्रचलित हैं जिसके प्रवर्तक भगवान बौद्ध हमारी धरती पर ही प्रकट हुए थे। जापान विश्व में दूसरों को कर्ज और दान देने वाला राष्ट्र है पर यह बात अलग है कि छोटा होने के कारण उसे वह सम्मान नहीं मिलता।  अगर भारत जैसा विशाल देश उसके साथ हो जाये तो सामरिक दृष्टि से भी उसका आत्मविश्वास बढ़ सकता है।  हमारे यहां का भी जाता है कि हरा भरा वृक्ष ही इंसान का सहायक होता है सूखा पेड़ किसी काम का नहीं हो सकता।
            तकनीकी रूप से जापान हमारे पड़ौसी चीन से कहीं बेहतर है। अमेरिका हमारे साथ संपर्क इसलिये बढ़ा रहा है क्योंकि यहां उसके लिये रोजगार के अवसर हैं।  जापान को पूंजी लगाने का स्थान चाहिये जिससे हमारे विशाल राष्ट्र में हमारे लिये तो हमें भी रोजगार के अवसर बन सकते हैं। सांस्कृतिक और वैचारिक रूप से भी जापान हमारा निकटस्थ सहयोगी बन सकता है। मूल बात यह कि हम आर्थिक, वैचारिक, साहित्यक तथा संस्कारिक दृष्टि से हम पश्चिम की तरफ देखकर निराश हो चुके हैं।  पश्चिम से आई हवा ने हमारे यहां तनाव पैदा किया है इसलिये अब पूर्व की तरफ रुख करना चाहिये। हम पश्चिम की साम्राज्यवादी और मध्य एशिया की हिंसक गतिविधियों से जुड़कर अपना समय व्यर्थ ही बरबाद करते हैं।  मध्य एशिया में हिंसक संघर्ष कभी थम नहीं सकता।  ऐसा लगता है यह उनका स्वभाव है। वर्षों पुराना इतिहास गवाह है कि पश्चिमी राष्ट्र साम्राज्य बढ़ाने तो मध्य एशिया के राष्ट्र आपस मे उलझकर विश्व में हिंसा का संकट पैदा करते रहे हैं।  दूसरी बात यह कि पश्चिमी से आई हवा यहां गुलाम पैदा करती है जबकि पूर्व से आई हवा में स्वतंत्र मानसिकता की खुशबू आती है।  वैसे भी हमारे देश में सदियों से पूर्व की तरफ देखकर पूजा, आरती या प्रणाम करने की परंपरा रही है।
            एक सज्जन पलंग पर दो वर्ष तक पश्चिम की सिर कर सोते रहे।  लगातार तनाव में गुजारा। एक दिन उनके ही अध्यात्मिक ज्ञानी मित्र ने  उनको घर पर ऐसा करते पाया तो उसे चेताया कि पूर्व या दक्षिण की तरफ सिर रखकर सोया करो। उत्तर की तरफ सिर करने से से उष्णता तो पश्चिम की तरफ सोने से कुंठा पैदा होती है।  उस मित्र को यह बात लग गयी।  बाद में उन्होंने बताया कि उस अध्यात्मिक मित्र की सलाह मानने के बाद वह अलग तरीके से ही सुखदायक जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
            अध्यात्मिक तथा ज्ञान साधक पूर्व की तरफ मुख कर ही योग साधना करते हैं। लोग उगते हुए सूरज को जल देते हैं जो पूर्व से ही उगता है।  पश्चिम के लोग हमारे आर्थिक सहायक कतई नहीं है।  जिस तरह चीन और जापान की चीजें बाज़ार में बिकती हैं उससे यह साफ लगता है कि विकास के तत्व तो पूर्व में ही मौजूद हैं।  बहरहाल यह हमारी एक राय भर है जो अध्यात्मिक लेखक होने के नाते लिखी गयी है जो कि इस अवसर श्रीमद्भागवत गीता का उल्लेख होने पर पैदा हुई।  यह किसी आर्थिक या राजनीतिक विश्लेषक की रचना नहीं है जिसमें पूर्व बेहतर संपर्क होने से अन्य लाभों या हानियां का आंकलन प्रस्तुत किया जा सके।
           

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Thursday, August 28, 2014

असहजता-हिन्दी कविता(asahajata-hindi poem)



यश प्राप्ति की इच्छा
समाज में हास्य का पात्र भी
बना देती है।

धन के पीछे दौड़
कर देती विचार अनियंत्रित
पांव अपराधिक कीचड़ में
पूरी तरह से सना देती है।

ऊंचे पद पर चढ़ने की ललक
अगर डगमगाये कदम
तब त्रास घना देती है।

कहें दीपक बापू प्रगति की राह
असहजता से चलने पर
सहृदयों से ठना देती है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Wednesday, August 27, 2014

चिंता की लकीरों के बीच-हिन्दी कविता(chinta ki lakiron ke beech zindagi-hindi poem)



न महंगाई घटेगी
न भ्रष्टाचार रुकेगा
चिंताओं की लकीरों के बीच
जिंदगी यूं ही बीत जायेगी।

कोई हालातों से मजबूर है,
कोई सामानों के भंडार से भरपूर है,
जिनको हंसने की आदत नहीं
उनकी रोनी सूरत
कभी नहीं जीत पायेगी।

कहें दीपक बापू जिंदगी बिताने के
अंदाज सभी के अलग हैं
किसी ने पायी दौलत
खर्च करना आया नही,ं
कोई सुंदर है
बुद्धि से रिश्ता निभाया नहीं,
सच यह फांकों से भी
कर ली जिसने दोस्ती
जिंदगी उसके ही गीत गायेगी।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Tuesday, August 19, 2014

समस्याओं की चिंता-हिन्दी कविता(samasyaon ki chinta-hindi poem)



उनको देश मे
भुखमरी की समस्या पर
बहुत चिंता है।

उनको देश में
बेरोजगारी की समस्या पर
बहुत चिंता है।

उनको देश में
गरीबी की समस्या पर
बहुत चिंता है।

कहें दीपक बापू चिंता के व्यापारी
ढूंढते  हमेशा
समस्याओं के प्रचार में
नये नये साधन
विज्ञापन से हल करने के लिये
उनको भारी चंदा जुटाने की
बहुत चिंता है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Tuesday, August 12, 2014

भारत माता के घर का पता-आजादी के पर्व पर व्यंग्य कविता(bharat mata ke ghar ka pata-special hini poem on indepandent day or swantantra diwas diwas par vishesh hindi kavita)

15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस का
महत्व हम नहीं समझे
या कोई हमें समझा नहीं पाया।

जिस अंग्रेजी भाषा से लड़ी हिन्दी
राष्ट्रभाषा के सम्मान के लिये
हमने उसे आज तक लड़ते पाया।

स्वदेशी का नारा लगा था
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान
खोई नहीं उसकी यादें
यदाकदा उसे अब भी सुनते पाया।

अंग्रेजों के गुलामी और मालिक के खेल
क्रिकेट को मनोरंजन का धर्म बना लिया
पागलों की तरह लोगों को
गेंद की तरह उसके पीछे भागते पाया।

आज अंग्रेजों की धरती पर गये लोग
इतराते हैं उनकी तरह
भारत को इंडिया से जूझते पाया।

कहते हैं कि जो अंग्रेजी नहीं पढ़ेगा
वह तरक्की की राह नहीं चलेगा
समझ में नहीं आता
अंग्रेजों को किसने कब कैसे क्यों और कहां
इस देश से भगाया।

कहें दीपक सभी के साथ
हम भी भारत माता की जय का
नारा लगा लेते हैं
हम ढूंढते उसका अपना घर
जिसका पता किसी ने नहीं बताया।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Monday, August 4, 2014

ताज़े और नये चेहरे-हिन्दी कविता(taze aur naye chehare-hindi poem's)



जहां कभी खेत थे
समय के साथ सीमेंट और लोहे के
चमकदार मकान बन गये।

जहां कभी लगती थी चाय की गुमटी
समय के साथ पांच सितारे लिये
होटल तन गये।

जहां कभी पेड़ पौद्यों से भरे उद्यान थे
समय के साथ इतिहास में दर्ज
महान लोगों के प्रस्तर बुंत जम गये।

कहें दीपक बापू भावनायें यथावत
तब रूप बदलना
नयेपन की पहचान नहीं होती
यह अलग बात है
बाज़ार के सौदागर
बुढ़ा चुके सामानों और चेहरों पर
रंग पोतकर बना देते उनको ताजे और नये।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Sunday, July 27, 2014

बुद्धिमानी का कोई भाग नहीं है-हिन्दी कविता(buddhmain ka koyee bhag nahin hai-hindi poem)



इंसानों के भावविहीन चेहरे
संवेदनाहीन व्यवहार
हृदय  में  प्रेम की आग नहीं है।

जुबान से निकलती शब्दों की भीड़
रुखे है उनके अर्थ
भावनाओं का उनमें राग नहीं है।

चमक है पहनावे में
महंगे हैं अमीरों  के बिछौने
फैला भ्रम कि उन पर कोई दाग नहीं है।

कहें दीपक बापू प्रभावी लोग भ्रमित हैं
कोई देखता नहीं उनके काले कारनामे
जिंदगी के इस खेल में
बुद्धिमानी का कोई भाग नहीं है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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