Friday, March 29, 2013

बदलाव के नारे-हिन्दी कविता (badlav ke nare-hindi poem)


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जमाने को बदल देने का नारा
वह रोज  सुनायेंगे,
कुछ गीत और गजलें
बस यूं ही  गुनगुनायेंगे।
कहें दीपक बापू
खुद कभी बदलने का प्रयास करते नहीं,
नियमों की जंजीरों से बंधें उनके हाथ
लाचारी जताते
वादे करते कभी नहीं थकते
किसी की झोली आस से भरते नहीं,
बहता रहेगा समय अपनी चाल से
लोग भूलेंगे, उनके घर भरेंगे माल से
इसी तरह वह नारों को हमेशा भुनायेंगे।

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
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Sunday, February 24, 2013

किराये पर मिली खुशी जोश नहीं देती-हिन्दी कविता (kiraye par milee khushi josh nahin dete-hindi poem)

कमजोर  नीयत
जुबां से मजबूत लफ्ज
बाहर आने नहीे देती,
खराब ख्याल में डूबें हों
कोई तस्वीर आंखों में गहराई नहीं लेती
कहें दीपक बापू
दुनियां तो अपने ही  दिल का खेल है
जब तक खेलें हम खुद
सब ठीक है
खिलाने लगे कोई दूसरा
तब अपनी ही इंसानी सोच
मुर्दा जैसी शक्ल लेती।
कीमत पर मिली खुशी
जिंदगी को कोई जोश नहीं देती।
लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, Madhya pradesh
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
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Saturday, February 23, 2013

बेहतर लेखन के लिये पढ़ना और प्रभावी वार्तालाप के लिये सुनना जरूरी-विशिष्ट रविवारीय हिन्दी लेख (behtar lekhan ke liye padhna aur prabhavi vartalap ke liye sunna jaroori-vishisht ravivariya hindi lekhj)

                     अनेक लोगों का मन करता है कि वह कुछ लिखें।  कुछ लोग शेरो शायरी कर दूसरे को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। कुछ लोग अंग्रेजी कहावतों को सुनाकर यह कोशिश करते हैं कि सामने वाला आदमी उनकी बुद्धि का लोहा माने।  वैसे अपनी बात कहने में तुलसीकृत रामचरित मानस  का अध्ययन करने वालों का जवाब नहीं है।  खास अवसरों पर वह उसके दोहे सुनाकर अपने गहन अध्ययन को प्रमाणित कर देते हैं पर उसमें उनका स्वरचित कुछ नहीं होता।  समाज पर प्रभाव तो वही डाल सकता है जो स्वयं रचनाकार हो।  वैसे आजकल शेरो शायरी कर अपनी बात का प्रभावपूर्ण ढंग से कहने का रिवाज चल पड़ा है पर यह हमारे पारंपरिक वार्तालाप का कोई स्थाई भांग नहीं है। कई विषयों पर कबीर, रहीम और तुलसी की रचनायें इतना प्रभाव रखती हैं कि उनके उद्धरण उर्दू की शायरी से बेहतर प्रभावी रहते हैं।  इन सबके बावजूद यह सच्चाई है कि आदमी का मन स्वरचना की अभिव्यक्ति के लिये तड़पता है।  लिखना और बोलना  सहज लगता है   पर वह उनके दूसरे को मस्तिष्क और हªदय को अंदर तक प्रभावित कर दे ऐसी बात लिखना  या बोलना आसान नहीं है। प्रभावी लेखन और वार्तालाप के लिये आवचश्यक है कि हम दूसरे का लिखा धीरज से पढ़ें और कही गयी बात सुने।
          ब्लॉग लेखन के प्रारंभिक दौर में अनेक पाठकों ने हमसे पूछा कि आप इतना लिख कैसे लेते हैं? इसका सीधा जवाब तो यह था कि हम पढ़ते बहुत हैं पर किसी को दिया नहीं!  सोचते कि अपने हर राज को बांटना जरूरी नहीं है।  सच्चाई यह है कि   जितना ज्यादा पढ़ोगे उतना ही ज्यादा लिखोगे।  जितना अच्छा सुनोगे उतना अच्छा बोलोगे।  तय बात है कि अपनी प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति के लिये पुस्तक प्रेम और बेहतर संगत का होना जरूरी है।  मूर्खों में बैठकर गल्तियां न करना सीखा जा सकता है पर बुद्धिमानों की संगत में बिना गल्तियां किये काम करने की  मिलने वाली प्रेरणा ही असली ही शक्ति होती है।
         इधर जब फेसबुक पर अपने निजी तथा सार्वजनिक संपर्क वाले लोगों को देखते हैं तो उनके अंदर अपनी अभिव्यक्ति की कभी शांत न होने वाली भूख साफ दिखाई देती है।  उनके पास कंप्यूटर और इंटरनेट की सुविधा है। उन्होंने फेसबुक पर खाते खोल लिये हैं।  मोबाइल से फोटो खींचकर उसमें डाल देते हैं।  दूसरे की पठनीय और दर्शनीय सामग्री अपने फेसबुक पर लाने के लिये उन्हें शेयर करना पड़ता है।  कई लोग तो ऐसे हैं जो शेयर करते समय एक शब्द भी नहीं लिखते। लिखते भी है तो रोमन में हिन्दी लिखकर अपनी भूख शांत करते हैं।  ऐसे में उनकी अभिव्यक्ति की भूख साफ दिखती है। भूख और प्यास की व्याकुलता हमने स्वयं भी झेली है पर खुशी होती है यह देखकर अभिव्यक्ति के लिये कभी तड़पना नहीं पड़ता।  हिन्दी और अंग्रेजी टाईप का शैक्षणिक काल में ज्ञान प्राप्त किया और तीस वर्ष पहले कंप्यूटर से ही अपनी जिंदगी शुरु की थी।  इसलिये वर्तमान समय में बिना हिचक इंटरनेट पर लिख लेते हैं।  लिखने के विषय का टोटा नहीं रहा पर अध्यात्मिक विषयों की पुस्तकें पढ़कर चिंत्तन लिखते हुए जीवन का ज्ञान स्वतः ही आता रहा।  हमारे अध्यात्मिक विषयों पर लिखे गये पाठों को देखकर पाठक सोचते हैं कि यह कोई पुराना ज्ञानी है पर सच्चाई यह है कि लिखते लिखते ही बहुत सारा ज्ञान आ गया है।
     इस ज्ञान साधना ने जीवन के प्रति विश्वास दिया पर व्यंग्य विद्या कोे छीन लिया।  अनेक बार व्यंग्य लिखने का मन करता है पर कहीं न कहीं ज्ञान उसमें बाधा बन जाता है।  व्यंग्य विषय गंभीरता के रंग में डूब जाता है।  अपने ही बचपन गुजारने के बाद जवानी में परे हुए लोगों के फेसबुक देखते हैं।  उनको हम ढूंढते हैं पर वह भुलाये बैठे है।  हम उनके पास अपने मित्र बनने का कोई प्रस्ताव नहीं भेजते।  इसका कारण यह है कि अनेक बार वह हमारे व्यंग्यों और चिंत्तनों का हिस्सा बने हैं।  दूसरी बात यह कि हमारे लेखकीय और पाठकीय संस्कारों से न उनका कोई वास्ता है और न ही हमारी इच्छा है कि वह हमसे बिना हृदय के फेसबुक से  जुड़ें।
          हम अपने उन बिछड़े लोगों का एबीसी समूह बनाकर बात करते हैं। इनमें हम बी नाम से हैं।   हम अपने ही शहर में रहे पर ए और सी बाहर जाकर बसे हैं।  इंटरनेट पर फुरसत के समय बहुत दिन तक  ए नाम के व्यक्ति का फेसबुक ढूंढा पर मिला नहीं।  अब दो महीने उन्होंने बनाया तो हमारे दृष्टिपथ में आ गया। सी की स्थिति यह थी कि उनकी पत्नी का फेसबुक  मिला। उन पर सी का फोटो क्या  नाम तक नहीं था।  चेहरे से पहचाना कि यह जान पहचान वाली भद्र महिला है।  परसों  उस पर  सी का फोटो देखने को मिला।  अपनी बेटी और दामाद के साथ सी और उसकी पत्नी ने फोटो खिंचवाया और फेसबुक  पर डाला।  ए और उसके  बेटे और बहु का फेसबुक रोज देखते हैं।
      उस दिन ए का फोन बहुत दिन बाद आया।  उसे किसी दूसरे आदमी का फोन नंबर चाहिये था।  उस समय उसके बेटे के फेसबुक को ही देख रहे थे जो अधिक सक्रिय है।  हमने उसे नहीं बताया कि क्या कर रहे हैं।  संभावना यह  भी है कि सी से भी अगले सप्ताह उसके शहर आने पर मुलाकात होगी पर उससे फेसबुक की चर्चा बिल्कुल नहीं करेंगे।  दरअसल इसका कारण यह है कि हमारा लिखा देखकर लोग पूछते हैं कि इसका तुम्हें मिलता क्या है?
     यहां हम स्वयं को ही प्रभाहीन अनुभव करते हैं।  यह कहते हुए शर्म आती है कि हम फोकटिया हैं। लिखने का अभ्यास इतना है कि एक हजार शब्दों का लेख हम बीस मिनट में सोचते हुए लिख देते हैं।  यह सहज इसलिये होता है कि हमारी दृष्टि हमेशा समय मिलते ही पठनीय सामग्री पर चली जाती है।  यह आवश्यक है कि उसे देखकर ही हम कुछ लिखें पर कहीं न लिखने की प्रेरणा उससे ही मिलती है।  ए और सी के साथ  उनके परिवार  के सदस्यों के फेसबुक देखकर लगता है कि हम भाग्यशाली हैं कि लिखने की शक्ति मिली है।  हालांकि इसमें अच्छा पढ़ने और सुनने का भी योगदान है।
लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, Madhya pradesh
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
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Monday, January 28, 2013

अपना निष्कर्ष-हिंदी कविता (apna nishkarsh-hindi kavita or self dicision-poem)

चिंत्तन  कुछ यूं भटक गया है,
जिस रास्ते हम चले
वही है यह
तय नहीं कर पा रहे
लगता है कभी कभी
नहीं तय हो रही दूरी
लक्ष्य ही शायद आकाश में अटक गया है।
कहें दीपक बापू
महाबहसें सुनते सुनते
बुद्धि हो जाती कभी कभी कुंद
दूसरों की सोच सुनते सुनते
लगता है यूं
अपना निष्कर्ष ही कहीं टपक गया है।

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लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Saturday, January 5, 2013

मोमबत्तियों से हमदर्दी-हिन्दी कविता (mombattiyon se hamdardi-hindi kavita)


हादसों पर मोमबत्तियां जलाकर
मातम मनाओ
बच्चों को यह सिखा दिया,
सामाजिक है हम लोग
सारे संसार को दिखा दिया।
कहें दीपक बापू
सड़क पर कराहता कोई घायल,
नहीं सुनता कोई चीख
डरते हैं सभी कोई मदद की न मांगे भीख,
मुंह फेर जाते हैं देखने वाले,
लगाकर अपनी सोच पर ताले,
ज़माने पर लगता है मतलबपरस्ती का आरोप
रौशनी से चकाचौंध सड़क पर
यूं मोमबत्तियां जलाकर
जख्मों से हमदर्दी जता रहे है,
सर्दी में अपने शरीर को सता रहे हैं,
रोने में हम भी नहीं किसी से कम
दुनियां को यह बता दिया,
न हल्दी लगे न फिटकरी
रंग आयेगा चोखा
यह नयी पीढ़ी को अच्छी तरह सिखा दिया।


लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, Madhya pradesh
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Thursday, December 27, 2012

जुल्म से लड़ने के लिये हमेशा तैयार रहें-हिन्दी कविता

अपने कदम इस तरह बढ़ाओ
हादसे के खतरे कम रहें,
अपने होश काबू में रखो
हालातों से बेहोश होना अच्छा नहीं
जब जंग सामने हो
हाथ और पांव से बोलें
मुंह से कुछ न कहें।
कहें दीपक बापू
सड़क पर फरिश्ते भी चलते हैं,
शैतान भी खडे हैं जिनके दिल जलते हैं,
पता नहीं किसकी नीयत काली है किसकी सफेद
कौन प्यार करेगा कौन हमला
यह कहना मुश्किल है
दिल-ओ-दिमाग पर रखें काबू
जुल्म से जूझने को हमेशा तैयार रहें।
लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior, Madhya pradesh
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Friday, November 30, 2012

आम आदमी नाम जहाज है-हिन्दी व्यंग्य (aam admi naam jahaj hai-hindi vyangya lekh, comman man nam is a ship-hindi satire article))

       आम आदमी अब एक लोकप्रिय प्रचलित शब्द हो गया है।  जो लोग राजनीति, साहित्य, कला, फिल्म, पत्रकारिता, आर्थिक कार्य और समाज सेवा में शिखर पुरुष न होकर आम आदमी की तरह सक्रिय हैं उन्हें इस बात पर प्रसन्न नहीं होना चाहिए कि उनकी इज्जत बढ़ रही है क्योंकि उनका आम आदमी होना मतलब भीड़ में भेड़ की तरह ही है।  हां, एक बात जरूर अच्छी हो गयी है कि अब देश में गरीब, बेरोजगार, बीमार, नारी, बच्चा आदि शब्दों में समाज बांटकर नहीं बल्कि आम आदमी की तरह छांटा जा रहा है।  वैसे कुछ लोग जो टीवी के पर्दे पर लगातार दिखने के साथ ही अखबारों में चमक  रहे हैं उनको आम आदमी का दावा नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे प्रचार माध्यमों की खास आदमी के नाम से लाभ उठाने की मौलिक प्रवृत्ति बदल नहीं रही। अगर वह किसी कथित आम आदमी के नाम को चमका रहे हैं तो केवल इसलिये कि उनके बयानों पर बहस का समय विज्ञापन प्रसारण में  अच्छी  तरह पास होता रहा है।
         सच बात तो यह है कि हर आम आदमी  समाज के सामने खास होकर चमकना चाहता है। हाथ तो हर कोई मारता है पर जो आम आदमी में गरीब, बीमार, बेरोजगार  तथा  अशिक्षित जैसी संज्ञायें लगाकर भेद करते हुए उनके कल्याण के नारे लगाने के साथ ही नारी उद्धार की बात करता है उनको ही खास बनने का सौभाग्य प्राप्त हो्रता है।  अब लगता है कि आम आदमी का कल्याण करने का नारा भी कामयाब होता दिख रहा है।
        उस दिन अकविराज दीपक बापू सड़क पर  टहल रहे थे। एक आदमी ने पीछे आया और  नमस्ते की तो वह चौंक गये।  उन्होंने भी हाथ जोड़कर उसका अभिवादन किया।  आदमी  ने कहा‘‘ क्या बात है आज अपना पुराना फटीचर स्कूटर कहां छोड़ दिया?’’
           दीपक बापू चौंक गये फिर बोले-‘‘हमने आपको पहचाना नहीं।  हम जैसे आम आदमी के साथ आप इस तरह बात कर रहे हैं जैसे कि बरसों से परिचित हैं।’’
           वह आदमी उनके पास आया और उन्हें घूरकर देखने लगा फिर बोला-‘माफ कीजिऐ, मैंने आपको फंदेबाज समझ लिया। वह मेरा दोस्त है और आपको गौर से नहीं देखा इसलिये लगा कि कहीं आप हैं।  आपने अभी यह कहा कि आप आदमी हैं, पर कभी आपको टीवी पर नहीं देखा।’’
         दीपक बापू हंसे और बोले-‘‘आपकी बात सुनकर हैरानी हो रही है।  एक तो आपने पुराने फटीचर स्कूटर की बात की उसे सुनकर मुझे लगा कि आप शायद परिचित हैं पर पता लगा कि मेरे जैसा भी कोई आम आदमी है जिसे आप जानते हैं।  रही बात टीवी पर दिखने की तो भई उनके पर्दे पर हमारे जैसे आम आदमियों के लिये भला कोई जगह है? इस तरह तो मैंने भी कभी आपको टीवी पर नहीं देखा। आप भी आम आदमी ही है न?’’
      वह आदमी बोला-‘‘मुझे कैसे देखेंगे? मैं तो नौकरी करता हूं!  आजकल टीवी पर आम आदमी की बहुत चर्चा है सोचा शायद कभी आप वहां पर अवतरित हुए हों!  आजकल आम आदमी टीवी पर ही दिखते हैं।’’
        दीपक बापू हंसकर बोले-‘‘हां, हम भी देख रहे हैं पर वही  लोग पर्दे पर अपने को आम  आदमी  की तरह चमका सकते हैं जिन पर खास लोगों का आशीर्वाद हो।  आप और हम जैसे आम आदमी तो इसी तरह सड़कों पर घूमेंगे।’’
          वह आदमी बोला-‘‘क्या बात कर रहे हें? मैं आम आदमी नहीं नौकरीपेशा आदमी हूं।  किसी ने सुन लिया तो मेरी शामत भी आ सकती है। यह आम आदमी की पदवी आप अपने पास ही रख लीजिऐ।’’
      वह तो चला गया पर दीपक बापू थोड़ा चौंक गये।  आम आदमी का मतलब क्या बेरोजगार, लाचार, गरीब और कम पढ़ा लिखा होना ही है?  सच बात तो यह है कि समाज को एक पूरी इकाई मानकर बरगलाना बहुत कठिन काम है इसलिये गरीब-अमीर, व्यापारी-बेरोजगार, स्त्री-पुरुष, तथा स्वस्थ-बीमार का भेद कर कल्याण करने के नारे लगते हैं।  इसका कारण यह है कि छोटे वर्ग के आदमी को यह खुशफहमी रहती है कि बड़े वर्ग से लेकर उसका पेट भरा जायेगा।  यह होता नहीं है।  अभी तक आम आदमी को लेकर कोई वर्ग नहीं बना था।  अमीर, पुरुष, और शिक्षित वर्ग में कोई भी आम आदमी नहीं हो सकता है यह भ्रम फैलाया गया है।  वह वर्ग जो अपनी मेहनत से कमा कर परिवार का पेट भरता है उसका तो दोहन करना ही है पर जो उसके घर में जो बेरोजगार पुत्र या पुत्री, गृहस्थ कर्म में रत स्त्री और घर में रहने वाले बड़े बुजुर्ग का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करने के लिये उनके भले के नारे लगते रहे।  कमाऊ पुरुष एक तरह से राक्षस माना गया जो अपने पर आश्रित लोगों का शोषण करने के साथ उपेक्षा का भाव रखता है।  सड़क, कार्यालय या दुकान पर वह जो परेशानियां झेलता है उसकी चर्चा कहीं नहीं होती।
        वह उपेक्षित आम आदमी था। न ऐसे लोग कभी भले करने के नारों पर भटकते हैं न ही उसे यकीन था कि कोई उसके साथ है।  अब जबसे आम आदमी का नाम टीवी पर आने लगा है उससे सभी चौंक गये हैं।  इधर अंतर्जाल पर भी लाखों आम आदमी मौजूद है।  उनके ब्लॉग, फेसबुक और ट्विटर पर खाते हैं पर केवल खाताधारी है। उनको लेखक, कवि, कार्टूनिस्ट और पत्रकार का दर्जा प्राप्त नहीं है। जिनको मिला है वह खास लोगो की कृपा है।  ऐसा लगता है कि पहले गरीब, बेरोजगार, बीमार, बुजुर्ग और महिलाओं के कल्याण का नारा अब बोरियत भरा हो गया लगा है इसलिये प्रचार माध्यमों ने आम आदमी बनाये हैं।  अपने आम आदमी!  जिनके ब्लॉग, फेसबुक और ट्विटर पर खाते हैं पर उनको वैसा ही सम्मान मिल रहा है जिसे कि अभिनय, राजनीति, फिल्म, टीवी और समाचार पत्रों के शिखर पुरुषों को प्राप्त है।  खास लोग अगर इंटरनेट पर अपने छींकने की खबर भी रख दें तो वह टीवी पर दिखाई जाती है।  आम आदमी जो शब्दिक प्रहार कर रहा है उसकी चर्चा कोई नहीं कर रहा। यह आम आदमी नाम जहाज प्रचार के समंदर में केवल उन्हीं को पार लगायेगा जो कि खास आदमी से आशीर्वाद लेकर उसमें चढ़ेंगे।  ऐसे में दीपक बापू जो स्वयं को आम आदमी कहते थे अब कहने लगे हैं कि हम तो ‘‘शुद्ध आम आदमी है।’’
लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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