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Friday, February 11, 2011

कन्या भ्रुण हत्या से मध्ययुग की तरफ बढ़ता समाज-हिन्दी लेख (kanya bhrun hatya aur madhya yug ki taraf samaj-hindi lekh

हो सकता है कि कुछ लोग हमारी बुद्धि पर ही संशय करें, पर इतना तय है कि जब देश के बुद्धिजीवी किसी समस्या को लेकर चीखते हैं तब उसे हम समस्या नहीं बल्कि समस्याओं या सामाजिक विकारों का परिणाम मानते हैं। टीवी और समाचार पत्रों के समाचारों में लड़कियों के विरुद्ध अपराधों की बाढ़ आ गयी है और कुछ बुद्धिमान लोग इसे समस्या मानकर इसे रोकने के लिये सरकार की नाकामी मानकर हो हल्ला मचाते हैं। उन लोगों से हमारी बहस की गुंजायश यूं भी कम जाती हैं क्योंकि हम तो इसे कन्या भ्रुण हत्या के फैशन के चलते समाज में लिंग असंतुलन की समस्या से उपजा परिणाम मानते है। लड़की की एकतरफ प्यार में हत्या हो या बलात्कार कर उसे तबाह करने की घटना, समाज में लड़कियों की खतरनाक होती जा रही स्थिति को दर्शाती हैं।
इस देश में गर्भ में कन्या की हत्या करने का फैशन करीब बीस साल पुराना हो गया है। यह सिलसिला तब प्रारंभ हुआ जब देश के गर्भ में भ्रुण की पहचान कर सकने वाली ‘अल्ट्रासाउंड मशीन’ का चिकित्सकीय उपयोग प्रारंभ हुआ। दरअसल पश्चिम के वैज्ञानिकों ने इसका अविष्कार गर्भ में पल रहे बच्चे तथा अन्य लोगों पेट के दोषों की पहचान कर उसका इलाज करने की नीयत से किया था। भारत के भी निजी चिकित्सकालयों में भी यही उद्देश्य कहते हुए इस मशीन की स्थापना की गयी। यह बुरा नहीं था पर जिस तरह इसका दुरुपयोग गर्भ में बच्चे का लिंग परीक्षण कराकर कन्या भ्रुण हत्या का फैशन प्रारंभ हुआ उसने समाज की स्थिति को बहुत बिगाड़ दिया। फैशन शब्द से शायद कुछ लोगों को आपत्ति हो पर सच यह है कि हम अपने धर्म और संस्कृति में माता, पिता तथा संतानों के मधुर रिश्तों की बात भले ही करें पर कहीं न कहीं भौतिक तथा सामाजिक आवश्यकताओं की वजह से उनमें जो कृत्रिमता है उसे भी देखा जाना चाहिए। अनेक ज्ञानी लोग तो अपने समाज के बारे में साफ कहते हैं कि लोग अपने बच्चों को हथियार की तरह उपयोग करना चाहते हैं जैसे कि स्वयं अपने माता पिता के हाथों हुए। मतलब दैहिक रिश्तों में धर्म या संस्कृति का तत्व देखना अपने आपको धोखा देना है। जिन लोगों को इसमें आपत्ति हो वह पहले कन्या भ्रुण हत्या के लिये तर्कसंगत विचार प्रस्तुत करते हुए उस उचित ठहरायें वरना यह स्वीकार करें कि कहीं न कहीं अपने समाज के लेकर हम आत्ममुग्धता की स्थिति में जी रहे हैं।
जब कन्या भ्रुण हत्या का फैशन की शुरुआत हुई तब समाज के विशेषज्ञों ने चेताया था कि अंततः यह नारी के प्रति अपराध बढ़ाने वाला साबित होगा क्योंकि समाज में लड़कियों की संख्या कम हो जायेगी तो उनके दावेदार लड़कों की संख्या अधिक होगी नतीजे में न केवल लड़कियों के प्रति बल्कि लड़कों में आपसी विवाद में हिंसा होगी। इस चेतावनी की अनदेखी की गयी। दरअसल हमारे देश में व्याप्त दहेज प्रथा की वजह से लोग परेशान रहे हैं। कुछ आम लोग तो बड़े आशावादी ढंग से कह रहे थे कि ‘लड़कियों की संख्या कम होगी तो दहेज प्रथा स्वतः समाप्त हो जायेगी।’
कुछ लोगों के यहां पहले लड़की हुई तो वह यह सोचकर बेफिक्र हो गये कि कोई बात नहीं तब तक कन्या भ्रुण हत्या की वजह से दहेज प्रथा कम हो जायेगी। अलबत्ता वही दूसरे गर्भ में परीक्षण के दौरान लड़की होने का पता चलता तो उसे नष्ट करा देते थे। कथित सभ्य तथा मध्यम वर्गीय समाज में कितनी कन्या भ्रुण हत्यायें हुईं इसकी कोई जानकारी नहीं दे सकता। सब दंपतियों के बारे में तो यह बात नहीं कहा जाना चाहिए पर जिनको पहली संतान के रूप में लड़की है और दूसरी के रूप में लड़का और दोनों के जन्म के बीच अंतर अधिक है तो समझ लीजिये कि कहीं न कहंी कन्या भ्रुण हत्या हुई है-ऐसा एक सामाजिक विशेषज्ञ ने अपने लेख में लिखा था। अब तो कई लड़किया जवान भी हो गयी होंगी जो पहली संतान के रूप में उस दौर में जन्मी थी जब कन्या भ्रुण हत्या के चलते दहेज प्रथा कम होने की आशा की जा रही थी। मतलब यह कि यह पच्चीस से तीस साल पूर्व का सिलसिला है और दहेज प्रथा खत्म होने का नाम नहीं ले रही। हम दहेज प्रथा समाप्ति की आशा भी कुछ इस तरह कर रहे थे कि शादी का संस्कार बाज़ार के नियम पर आधारित है यानि धर्म और संस्कार की बात एक दिखावे के लिये करते हैं।
इसका कारण यह है कि देश में आर्थिक असमानता तेजी से बढ़ी है। मध्यम वर्ग के लोग अब निम्न मध्यम वर्ग में और निम्न मध्यम वर्ग के गरीब वर्ग में आ गये हैं पर सच कोई स्वीकार नहीं कर रहा। लड़कियों के लिये वर ढूंढना इसलिये भी कठिन है क्योंकि रोजगार के आकर्षक स्तर में कमी आई है। अपनी बेटी के लिये आकर्षक जीवन की तलाश करते पिता को अब भी भारी दहेज प्रथा में कोई राहत नहीं है। उल्टे शराब, अश्लील नृत्य तथा विवाहों में बिना मतलब के व्यय ने लड़कियों की शादी कराना एक मुसीबत बना दिया है। इसलिये योग्य वर और वधु का मेल कराना मुश्किल हो रहा है।
फिर पहले किसी क्षेत्र में लड़कियां अधिक होती थी तो दीवाने लड़के एक नहीं  तो दूसरी को देखकर दिल बहला लेते थे। दूसरी नहीं तो तीसरी भी चल जाती। अब स्थिति यह है कि एक लड़की है तो दूसरी दिखती नहीं, सो मनचले और दीवाने लड़कों की नज़र उस पर लगी रहती है और कभी न कभी सब्र का बांध टूट जाता है और पुरुषत्व का अहंकार उनको हिंसक बना देता है। लड़कियों के प्रति बढ़ते अपराध कानून व्यवस्था या सरकार की नाकामी मानना एक सुविधाजनक स्थिति है और समाज के अपराध को दरकिनार करना एक गंभीर बहस से बचने का सरल उपाय भी है।
हम जब स्त्री को अपने परिवार के पुरुष सदस्य से संरक्षित होकर राह पर चलने की बात करते हैं तो नारीवादी बुद्धिमान लोग उखड़ जाते हैं। उनको लगता है कि अकेली घूमना नारी का जन्मसिद्ध अधिकार है और राज्य व्यवस्था उसको हर कदम पर सुरक्षा दे तो यह एक काल्पनिक स्वर्ग की स्थिति है। यह नारीवादी बुद्धिमान नारियों पर हमले होने पर रो सकते हैं पर समाज का सच वह नहीं देखना चाहते। हकीकत यह है कि समाज अब नारियों के मामले में मध्ययुगीन स्थिति में पहुंच रहा है। हम भी चुप नहीं  बैठ सकते क्योंकि जब नारियों के प्रति अपराध होता है तो मन द्रवित हो उठता है और लगता है कि समाज अपना अस्तित्व खोने को आतुर है।
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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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Friday, May 21, 2010

हाशिए पर ही न खड़े रहें-हिन्दी संपादकीय लेख

आज एक ब्लाग पर नज़र पड़ गयी जिसमें किसी अखबार का संपादकीय ‘मस्तराम’ संबंधी साहित्य हिन्दी ब्लाग जगत पर लाने की आलोचना की गयी थी। साथ ही उसमें अनेक ब्लागों की भाषा में झगड़े फसाद तथा अभद्र लेखन को भी इंगित किया गया। अक्सर हिन्दी ब्लाग के बारे में अखबारों में चर्चा पढ़ने को मिलती है जिसमें इसी तरह की बातें प्रकाशित की जाती हैं।
हम यहां किसी प्रकाशित लेख या संपादकीय की आलोचना नहीं करने जा रहे मगर नज़रिये पर सवाल तो उठा ही सकते हैं। मुख्य बात यह है कि आप हिन्दी ब्लाग जगत के बारे में अपनी राय किस तरह कायम करते हैं। क्या आप किसी एक दिन में एक साथ सौ ब्लाग देखते हैं? दूसरा सवाल यह है कि आप कहां हिन्दी ब्लाग देखते हैं, सर्च इंजिनों में या प्रायोजित फोरमों पर जाकर।
जब आप सर्च इंजिनों में किसी विषय संबंधी खोज करते हैं तो उससे संबंधित ही सामग्री ही सामने आती है, अगर आप मस्तराम शब्द से ढूंढेंगे तो दूसरा विषय शायद न आये। ऐसे में आप यह तो कह नहीं सकते कि केवल मस्तराम विषय पर ही लिखा जा रहा है। अगर आप हिन्दी ब्लाग जगत में लड़ाई झगड़े या अभद्र भाषा लिखे जाने की बात कर रहे हैं तो इसका सीधा आशय है कि आप ब्लागवाणी या चिट्ठाजगत के हाशिये पर ही पढ़ते हैं, मुख्य क्षेत्र में पृष्ठ बदलकर देखने में आपको असुविधा लगती है। ऐसे में आप यह कैसे कह सकते हैं कि हिन्दी ब्लाग जगत में सब कुछ बुरा लिखा जा रहा है।
चिट्ठाजगत या ब्लागवाणी प्रायोजित फोरम है-उनके संचालकों के इस दावे पर यकीन करना मुश्किल है कि वह हिन्दी समाज सेवा के लिये हैं-इसलिये उनके सानिध्य में लिखने वाले ब्लाग लेखकों को हिट अधिक दिखाने ही पड़ते हैं-यह उनका निजी विषय है और इस पर कोई टिप्पणी करना ठीक नहीं। इन फोरमों के लेखकों के पाठ प्रतिदिन ही हाशिए पर सबसे ऊपर देखते हैं। अब यह कहना कठिन है कि संचालन मंडल से जुड़े लोग यह करते हैं या कुछ तेज तर्रार ब्लाग लेखक चालाकी से अपने पाठों को हिट कर ऊपर पहुंचाते हैं-वैसे अनेक ब्लाग लेखक ऐसे सीधे आरोप अपने पाठों में लगाते रहते हैं। एक बात तय रही कि इस ब्लागवाणी तथा चिट्ठाजगत का हाशिया ही सब कुछ नहीं है-कुछ ब्लाग लेखक तो कहते हैं कि वहां कुछ भी आम पाठक के लिये पढ़ने के लिये नहीं होता। दिल्ली तथा अन्य बड़े शहरों के प्रभावशाली लेखकों का वर्चस्व यहां ऐसे ही दिखता है जैसे कि हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता मे। सच बात तो यह है कि जिस तरह कहा जाता है कि आदमी अपने जिंदगी में थक जाने के बाद ऐसे ही हाशिए ढूंढता है जहां से वह महत्वपूर्ण दिखे भले ही कोई प्रभावशाली काम न करे। आप साहित्य, समाज अन्य कला गतिविधियों में लगी संस्थाओं के पत्रों के प्रारूप पर दृष्टिपात करें तो भूतपूर्व प्रभावशाली लोग अपना नाम लिखाते हैं-वैसे कोई डाक्टर दवा लिखता है तो उसके पर्चे के हाशिए पर भी कुछ अस्पतालों या अन्य सहयोगी चिकित्सकों के नाम होते हैं। अपने देश के लोगों के पास भी समय बहुत है। पत्र मिलने के बाद पढ़ते हैं फिर भी उनके पास इतना समय तो रह जाता है कि वह कथित प्रभावशाली लोगों का नाम पढ़ें। पाठकों की इसी कमी का लाभ समाज सेवक और लेखक उठाना चाहते हैं। इसके विपरीत जो बूढ़े हो गये पर अभी भी अपने क्षेत्र में सक्रिय हैं वह कभी हाशिए पर जाने का विचार नहीं करते।
यह हाशिए का मोह हिन्दी जगत की सबसे बड़ी समस्या है अब अंतर्जाल पर भी यही होता लग रहा है। ब्लागवाणी या चिट्ठाजगत की गतिविधियां कैसी हैं यह चर्चा का विषय नहीं है बल्कि यहां ब्लाग पढ़ने वाले पाठकों को हाशिए से अलग मुख्य क्षेत्र में आकर ब्लाग पढ़ना चाहिए। एक ब्लाग लेखक होने के नाते हाशिए के हिट ब्लाग यह लेखक भी देखता है पर इसका आशय यह नहीं है कि दूसरे ब्लाग न देखें। जब आप हिन्दी ब्लाग जगत पर संपूर्णतया से लिखना चाहते हैं तो फिर आप इस हाशिए से दूर ही रहें क्योंकि वहां पर सीमित रहने का मतलब यह है कि आप अपने विषय को सीमित ही रख पायेंगे। अगर इन फोरमों से ब्लाग सूची बनायेंगे तो वह आठ से दस से अधिक नहीं होगी। अनुभवी ब्लाग लेखकों से चाहें तो ऐसी सूची मांग लें। वह पाठ देखते ही समझ जाते हैं कि आज यह टिप्पणियां, पसंद तथा पाठक संख्या अधिक लेकर दोनों फोरमों के हाशिए की शोभा बढ़ायेंगें। यकीनन यह हिट ब्लाग लेखक बहुत अच्छा लिखते हैं क्योंकि उनकी छह लाईनों के पाठ पर लोग साठ दूसरे ब्लाग लेखक पाठ लिख डालते हैं। पंद्रह दिनों तक बहस चलती है। अभी तक दो ब्लाग लेखक नंबर एक के दावेदार थे अब तीसरा भी खड़ा हो गया है। तीसरेे को देखकर चार पांच दूसरे भी तैयार हो गये हैं। हम उनके लिखने को चुनौती नहीं दे रहे पर अंततः यह तय बात है कि उन पर हिन्दी ब्लाग जगत का केंद्रीय बिन्दू स्थापित नहीं है। फोरमों के हाशिए प्रतिदिन शीर्ष पर रहने वाले दो तीन लेखकों को छोड़कर बाकी के बारे में यह कहना कठिन है कि आम पाठक के लिये कुछ अधिक महत्व रखते हैं अलबत्ता ब्लाग लेखक जिज्ञासावश उनको पढ़ते हैं वह भी इसलिये क्योंकि उनको सुविधाजनक लगता है।
ऐसे में अगर आप फोरम पर ब्लाग देख रहे हैं तो हाशिए के हिट देखने की बजाय मुख्य क्षेत्र में ब्लाग देखें। पृष्ठ बदलने का कष्ट उठायें क्योंकि शौकिया तथा गंभीर ब्लाग लेखकों से परिचित हुआ जा सके। हिन्दी को बहुत बड़ा सफर अंतर्जाल पर तय करना है और कोई नहीं जानता वह क्या क्या रूप लेकर आगे बढ़ेगी। कम से कम पाठकों तथा विश्लेषकों को हाशिए पर ही खड़े नहीं रहना चाहिए।
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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Wednesday, December 30, 2009

आम आदमी को जड़ समझना गलत-आलेख चिंतन (coman man and thinkar-hindi lekh)

यह पेज

हिटलर तानाशाह पर उसने जर्मनी पर राज्य किया। कहते हैं कि वह बहुत अत्याचारी था पर इसका मतलब यह नहीं है कि उसने हर जर्मनी नागरिक का मार दिया। उसके समय में कुछ सामान्य नागरिक असंतुष्ट होंगे तो तो कुछ संतुष्ट भी रहेंगे। कहने का मतलब यह कि वह एक तानाशाह पर उसके समय में जनता का एक बहुत बड़ा वर्ग शांति से रह रहा था। सभी गरीब नहीं थे और न ही सभी अमीर रहे होंगे। इधर हम दुनियां के अमीर देशों में शुमार किये जाने वाले जापान को देखते हैं जहां लोकतंत्र है पर इसका मतलब यह नहीं है कि वहां की सारी जनता अपनी व्यवस्था से खुश होगी। वहां भी अमीर और गरीब होंगे।
किसी राज्य में प्रजाजनों में सभी अमीर होंगे तो भी सभी संतुष्ट नहीं होंगे सभी गरीब होंगे तो सभी असंतुष्ट भी नहीं होंगे। कहने का मतलब यही है कि राज्य की व्यवस्था तानाशाही वाली है या प्रजातंात्रिक, आम आदमी को मतलब केवल अपने शांतिपूर्ण जीवन से है। अधिकतर लोग अपनी रोजी रोटी के साथ ही अपने सामाजिक जीवन में दायित्व निर्वाह के साथ ही धाार्मिक, जातीय, भाषाई तथा क्षेत्रीय समाजों द्वारा निर्मित पर्वों को मनाकर अपना जीवन अपनी खुशी और गमों के साथ जीते हैं। अलबत्ता पहले अखबार और रेडियो में समाचार और चर्चाओं से सामान्य लोगों को राजनीतिक दृष्टि विकसित होती थी । अब उनके साथ टीवी और इंटरनेट भी जुड़ गया है। लोग अपने मनपसंद विषयों की सामग्री पढ़ते, देखते और सुनते है और इनमें कुछ लोग भूल जाते हैं तो कुछ थोड़ी देर के लिये चिंतन करते है जो कि उनका एक तरह से बुद्धि विलास है। सामान्य आदमी के पास दूसरे की सुनने और अपनी कहने के अलावा कोई दूसरा न तो उपाय होता है न सक्रिय येागदान की इच्छा। ऐसे में जो खाली पीली बैठे बुद्धिजीवी हैं जो अपना समय पास करने के लिये सभाओं और समाचारों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। जिनके साथ अब टीवी चैनल भी जुड़ गये हैं। इनकी बहसों पेशेवर बौद्धिक चिंतक भाग लेते हैं। ऐसा नहीं है कि चिंतक केवल वही होते हैं जो सार्वजनिक रूप से आते हैं बल्कि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो चिंतन की अभिव्यक्ति केवल अपने व्यक्ति गत चर्चाओं तक ही सीमित रखते हैं।
ऐसे जो गैर पेशेवर बुद्धिजीवी हैं उनके लिये अपना चिंतन अधिक विस्तार नहीं पाता पर पेशेवर बुद्धिजीवी अपनी चर्चा को अधिक मुखर बनाते हैं ताकि प्रचार माध्यमों में उनका अस्तित्व बना रहे। कहते हैं कि राजनीति, पत्रकारिता तथा वकालत का पेशा अनिश्चिताओ से भरा पड़ा है इसलिये इसमें निरंतर सक्रियता रहना जरूरी है अगर कहीं प्रदर्शन में अंतराल आ गया तो फिर वापसी बहुत मुश्किल हो जाती है। यही कारण है कि आधुनिक लोकतंत्र के चतुर्थ स्तंभ पत्रकारिता-समाचार पत्र पत्रिकाओं, टीवी चैनलों तथा रेडियो- में अपनी उपस्थित दर्ज कराने के लिये पेशेवर बौद्धिक चिंतक निरंतर सक्रिय रहते हैं। यह सक्रियता इतनी नियमित होती है कि उनके विचार और अभिव्यक्ति का एक प्रारूप बन जाता है जिसके आगे उनके लिये जाना कठिन होता है और वह नये प्रयोग या नये विचार से परे हो जाते हैं। यही कारण है कि हमारे देश के बौद्धिक चिंतक जिस विषय का निर्माण करते हैं उस पर दशकों तक बहस चलती है फिर उन्हें स्वामित्व में रखने वाले राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक शिखर पुरुष अपना नाम निरंतर चर्चा में देख प्रसन्न भी होते हैं। इधर अब यह भी बात समाचार पत्र पत्रिकाओं में आने लगी है कि इन्हीं बौद्धिक चिंतकों के सामाजिक, आर्थिक शिखर पुरुषों से इतने निकट संबंध भी होते हैं कि वह अपनी व्यवसायिक, राजनीतिक तथा अन्य गतिविधियों के लिये उनसे सलाह भी लेते हैं-यह अलग बात है कि इसका पता वर्षों बाद स्वयं उनके द्वारा बताये जाने पर लगता है। यही कारण है कि देश के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक ढांचे में बदलाव की बात तो सभी करते हैं पर जिन पर यह जिम्मेदारी है उनके पास कोई चिंतन नहीं है और उनके आत्मीय बौद्धिक लोगों के पास चिंतन तो है पर उसमें बदलाव का विचार नहीं है। बदलाव लाने के लिये सभी तत्पर हैं पर स्वयं कोई नहीं लाना चाहता क्योंकि उसे उसमें अपने अस्तित्व बने रहने की गुंजायश नहीं दिखती।
लार्ड मैकाले वाकई एतिहासिक पुरुष है। उसने आज की गुलाम शिक्षा पद्धति का अविष्कार भारत पर अपने देश का शासन हमेशा बनाये रखने के लिये किया था पर उसने यह नहीं सोचा होगा कि उसके शासक यह देश छोड़ जायेंगे तब भी उनका अभौतिक अस्तित्व यहां बना रहेगा। इस शिक्षा पद्धति में नये चिंतन का अभाव रहता है। अगर आपको कोई विचार करना है तो उसके लिये आपके सामने अन्य देशों की व्यवस्था के उदाहरण प्रस्तुत किये जायेंगे या फिर विदेशी विद्वानों का ज्ञान आपके सामने रखा जायेगा। भारतीय सामाजिक सदंर्भों में सोचने की शक्ति बहुत कम लोगों के पास है-जो कम से कम देश में सक्रिय पेशेवर बुद्धिजीवियों के पास तो कतई नहीं लगती है।
इसका कारण यही है कि संगठित प्रचार माध्यमों-प्रकाशन संस्थान, टीवी चैनल और रेडियो-पर अभिव्यक्ति में भी एक तरह से जड़वाद हावी हो गया है। आपके पास कोई बड़ा पद, व्यवसाय या प्रतिष्ठा का शिखर नहीं है तो आप कितना भी अच्छा सोचते हैं पर आपके विचारों को कोई महत्व नहीं दिया जायेगा जितना पेशेवर बौद्धिक चिंतकों को दिया जाता है। आप बहुत अच्छा लिखते हैं तो क्या आपक पत्र संपादक के नाम पत्र में छपेगा न कि किसी नियमित स्तंभ में। कई बार टीवी और रेडियो पर जब सम सामयिक विषयों पर चर्चा सुनते हैं तो लोग संबंधित पक्षों पर आक्षेप, प्रशंसा या तटस्थता के साथ अभिव्यक्त होते हैं। किसी घटना में सामान्य मनुष्य की प्रकृतियों और उसके कार्यों के परिणाम के कारण क्या हैं इस पर कोई जानकारी नहीं देता। एक बात याद रखना चाहिये कि एक घटना अगर आज हुई है तो वैसी ही दूसरी भी कहीं होगी। उससे पहले भी कितनी हो चुकी होंगी। ऐसे में कई बार ऐसा लगता है कि यह विचार या शब्द तो पहले भी सुने चुके हैं। बस पात्र बदल गये। ऐसी घटनाओं पर पेशेवर ंिचंतकोें की बातें केवल दोहराव भर होती है। तब लगता है कि चितकों के शब्द वैसे ही हैं जैसे पहले कहे गये थे।
चिंताओं की अभिव्यक्ति को चिंतन कह देना अपने आप में ही अजीब बात है। उनके निराकरण के लिये दूरगामी कदम उठाने का कोई ठोस सुझाव न हो तो फिर किसी के विचार को चिंतन कैसे कहा जा सकता है। यही कारण है कि आजकल जिसे देखो चिंता सभी कर रहे हैं। सभी को उम्मीद है कि समाज में बदलाव आयेगा पर यह चिंतन नहीं है। जो बदलाव आ रहे हैं वह समय के साथ स्वाभाविक रूप से हैं न कि किसी मानवीय या राजकीय प्रयास से। हालांकि यह लेखक इस बात से प्रसन्न है कि अब राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक शिखर पर कुछ ऐसे लोग सक्रिय हैं जो शांति से काम करते हुए अभिव्यक्त हो रहे हैं पर उनकी संख्या नगण्य है। फिर मुश्किल यह है कि बौद्धिक चिंतकों का भी अपना महत्व है जो प्रचार माध्यमों पर अपनी ढपली और अपना राग अलापते हैं। फिर आजकल यह देखा जा रहा है कि प्रचार माध्यमों में दबाव में कार्यकारी संस्थाओं पर भी पड़ने लगा है।
आखिरी बात यह है कि देश के तमाम बुद्धिजीवी समाज में राज्य के माध्यमों से बदलाव चाहते हैं जबकि वास्तविकता यह है राज्य का समाज में कम से कम हस्तक्षेप होना चाहिये। समाज के सामान्य लोगों को बुद्धिहीन, आदर्शहीन तथा अकर्मण्य मानकर चलना अहंकार का प्रमाण है। एक बात तय रही कि दुनियां में सभी अमीर, दानी ओर भले नहीं हो सकते। इसके विपरीत सभी खराब भी नहीं हो सकते। राजनीतिक, आर्थिक, और सामजिक शिखर पर बैठे लोग भी सभी के भाग्यविधाता नहीं बल्कि मनुष्य को निचले स्तर पर सहयेाग मिलता है जिसकी वजह वह चल पाता है। इसलिये देश के बुद्धिजीवी अपने विचारों में बदलाव लायें और समाज में राज्य का हस्तक्षेप कम से कम हो इसके लिये चिंतन करें-कम से कम जिन सामाजिक गतिविधियों में दोष है पर किसी दूसरे पर इसका बुरा प्रभाव नहीं है तो उसे राज्य द्वारा रोकने का प्रयास नहीं करना चाहिए।
भारत के सर्वश्रेष्ठ व्यंगकार स्वर्गीय शरद जोशी जी ने अपने एक व्यंग्य में बरसों पहले लिखा था कि ‘हम इसलिये जिंदा हैं क्योंकि किसी को हमें मारने की फुरतस नहीं है। जो लोग यह काम करते हैं उनके पास लूटमार करने के लिये बहुत अमीर और बड़े लोग मौजूद हैं ऐसे में हम पर वह क्यों दृष्टिपात करेंगे।’ कहने का तात्पर्य यह है कि आम आदमी इसलिये जिंदा है क्योंकि सभी आपस में मिलजुलकर चलते हैं न कि राज्य द्वारा उनको कोई प्रत्यक्ष मदद दी जाती है। ऐसे में समाज सहजता से चले और उसमें आपसी पारिवारिक मुद्दों पर कानून न हो तो ही अच्छा रहेगा क्योंकि देखा यह गया है कि उनके दुरुपयोग से आपस वैमनस्य बढ़ता है।
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप
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Monday, December 28, 2009

अंतर्जाल पर लिखने के तीन वर्ष पूरे-संपादकीय (three year hindi writing on internet-hindi editoial)

अंतर्जाल पर लिखते हुए तीन वर्ष का समय हो गया। कहना कठिन है कि अपना उद्देश्य कहां तक प्राप्त किया। वैसे ही लिखने को लेकर अपनी सफलता या असफलता का विचार नहीं किया। न ही इस बात पर विचार किया कितने लोगों ने पढ़ा? अलबत्ता अपने जीवन में लिखना शुरु करने से आज तक एक बात का अनुभव किया कि इस संसार में ऐसे मित्र लेखन के क्षेत्र में ही मिलते हैं जो आपके प्रशंसक और आलोचक होने के साथ ही व्यक्तिगत रूप से हितैषी होते हैं। अंतर्जाल पर छद्म नामों को लेकर समस्या न हो तो यह कहना सरल है कि यहां भी इस लेखक को बहुत अच्छे मित्र अधिक संख्या में मिले। कम से कम एक बात में उन्होंने निभाया कि ‘जबरन सफल’ बनाने का कोई प्रयास न कर नये प्रयोगों के लिये प्रेरणा तो दी।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि अभी अपनी सफलता के दावे करना मूर्खता होगी तो अपनी असफलता को लेकर कुंठा पालना उससे भी अधिक मूर्खता! इस लेखक के पांच ब्लाग गूगल की पैज रैंक में चार अंक ले चुके हैं।
1.शब्द लेख सारथी पत्रिका
2.दीपक बापू कहिन
3.ई-पत्रिका
4.शब्द पत्रिका
5.शब्द लेख पत्रिका
कुल बीस ब्लाग/पत्रिका में 12 अन्य तीन अंक लिये हुए हैं। पांच ब्लाग का चार अंक में होना शायद इतना अधिक सफल होना न लगे-क्योंकि अंतर्जाल पर हिन्दी लिखने को लेकर अनेक भ्रम है-मगर अपने लेखकीय कर्म से एक बात अनुभव कर ली है कि अंग्रेजी पर बहुत कुछ समाग्री इस अंतर्जाल पर है पर इसका मतलब यह नहीं है कि उसके ब्लाग या वेबसाईटें हिन्दी से अधिक पाठक जुटाती हैं। ब्लाग/वेबसाईटें की रैंक बताने वाली एक वेबसाईट पर इस लेखक का एक ब्लाग साहित्य श्रेणी में है जो कल चतुर्थ वरीयता तक पहुंचा था और उसके पीछे 106 ब्लागों में बहुत सारे अंग्रेजी के थे। हिन्दी की एक व्यवसायिक वेबसाईट भी उसके बहुत पीछे थी। इस रैंकिंग वाली साईट पर अपने ब्लाग पंजीकृत करने पड़ते हैं इसलिये जो पंजीकृत नहीं है उनसे मुकाबला करना ठीक नहीं हैं पर इतना जरूर है कि हिन्दी के ब्लाग को अंग्रेजी से बढ़त नहीं मिलेगी यह सोचना भी गलत है-इससे यह बात समझ में आती है। इसी वेबसाईट पर अन्य श्रेणियों में भी इस लेखक के ब्लाग पंजीकृत हैं और उन्होंने अंग्रेजी ब्लागों पर बढ़त बनायी है।
अगर देश के हिन्दी विद्वान या संगठित क्षेत्रों की संस्थायें हिन्दी ब्लाग लेखक को अदना समझ रही हैं तो यह उनका अल्पज्ञान है। आधुनिक काल के लेखकों को लेकर भले ही संगठित प्रकाशन संस्थायें अभी भी आशावादी बनी हुईं हैं पर उनको यह जानकर निराशा होगी कि वैश्विक काल में दाखिल हो चुकी हिन्दी के लिये अब भी स्वर्ण काल या भक्ति काल की रचनायें ऊर्जा प्रदान करेंगी और आधुनिक काल के लेखकों की रचनायें यहां अधिक सफल नहंी होती दिख रही बल्कि अंतर्जाल पर ‘गागर में सागर’ भरने वाले नये लेखक ही अब उसे आगे ले जायेंगे और यकीनन वह उनके नियंत्रण से बाहर होंगे।
एक रोचक किस्सा है जिसका संबंध अंतर्जाल पर लिखने को लेकर ही है। एक अखबार अक्सर इस लेखक के अध्यात्मिक ब्लाग से रचनायें उठाकर अपने यहां बिना नाम के छाप रहा था। यह अखबार लेखक के घर भी आता था। एक दिन लेखक की नज़र अध्यात्मिक स्तंभ की तरफ गयी तो यह देखकर दंग रह गया था कि वह जस की तस इस लेखक के ब्लाग से उठायी गयी थी। तब इस लेखक ने अन्य दिनों अंक भी चेक किये। उसी अखबार में प्रकाशित एक लेख में उसके स्तंभकार ने ओबामा और गांधी जी पर नोबल पुरस्कार पर लिखे गये इस लेखक के तीन लेखों के अनेक अंशों को जस की तस नहीं छापा तो शब्दों का हेरफेर भी अधिक नहीं थी। दो अक्टूबर गांधी जयंती को लेकर भी इस लेखक के लेख केे अंशों का उसमें उपयोग किया गया था।
इस लेखक ने उसके संपादक को फोन किया। संपादक ने अध्यात्मिक विषयों को लेकर कहा-‘यह तो अच्छी बात है कि आपके संदेशों का प्रसारण सभी जगह हो रहा है।’
इस लेखक ने कहा-‘उससे हम नहीं रोक रहे, मगर लेखक का नाम तो दें।’
उसने बड़ी मासूमियत से कहा-‘उसे वैसे के वैसे नहीं लिया होगा। कुछ तो शब्दों में हेरफेर होगा।’
इस लेखक को हंसी आ गयी। उसने कहा-‘नहीं, वैसे के वैसे ही उठाये गये हैं।
संपादक ने कहा-‘ठीक है! हमने अपने संबंधित संपादक को मना कर देंगे कि वह आपके लेख न ले। ले तो नाम छापे। वैसे हम उसे मना ही कर देंगे कि आपके लेख की कापी न करे।’
उसके बोलने से किसी को दुःख होता पर इस लेखक को हंसी आयी। उस मासूम संपादक ने प्रकाशन माध्यमों में ब्लाग लेखकों की सोच का ज्ञान दिया था और इस मामले में उसे गुरु कहना ठीक रहेगा।
उसकी ईमानदारी पर तारीफ करना चाहिये कि फिर उसने अभी तक ऐसा नहीं किया। अलबत्ता इस लेखक ने उस स्तंभकार की शिकायत नहीं की क्योंकि यह उस संपादक की या अखबार की जिम्मेदारी नहीं थी। फिर स्तंभकार का नाम तो याद रहेगा। अब इस समस्या पर संपादक या स्तंभकार को दोष देना भी गलत लगता है क्योंकि मानवीय प्रवृत्तियों पर भी विचार करना चाहिये। वह संपादक और स्तंभकार मेरी तरह ही सामान्य वर्ग के होंगे। अपने रोजगार से जुड़े होने के कारण शायद वह अंतर्जाल के बारे में इतना नहीं जानते होंगे। जैसा प्रचार माध्यम प्रचारित कर रहे हैं वैसे ही लोग अपने विचार बनाते हैं। यह स्वतंत्र दिखने वाले प्रचार माध्यम क्या हैं, इस पर बहस इस लेख में नहीं करना है पर उनके प्रभाव से इंकार नहीं किया जा सकता। आजादी के बाद बड़े बड़े लेखक हुए हैं पर बताईये किसने कोई अमरकृति दी है और दी है तो भला वह इनसे जुड़ा रहा है? अंग्रेजी शिक्षा पद्धति का नियम है कि उतना ही पढ़ो जितना रोजगार के काम आये। जितना पढ़ो उतना ही सोचो वरना कहीं के नहीं रहोगे। कहने का तात्पर्य यह है कि एक तयशुदा प्रारूप है जिस पर सभी चले रहे हैं और नये प्रयोगों से हर कोई घबड़ाता है। दूसरी बात यह है कि जिसके पास भी थोड़ी बहुत शक्ति है वह उसका उपयोग करना चाहता है। किसी दूसरे को बढ़ाने की मनोवृत्ति अब नहीं रही जिस तरह तीन साल इस लेखक को लगे हैं उतने शायद ही अन्य कोई बर्बाद करना चाहे-क्योंकि इसके लिये यह जरूरी है कि आपका नियमित रोजगार होना चाहिये।
फिल्म, टीवी चैनल और पत्रकारिता में मौलिक लेखकों का अभाव है तो चिंतक के नाम शून्य। चिंतक कौन हैं? जो पुराने विचारों को ही आगे बढ़ा रहे हैं पर नये संदर्भों में व्याख्या करने के लिये जिस बौद्धिक क्षमता की जरूरत है वह कितनों में है? दरअसल हिन्दी में तत्काल कमाने की चाहत ने इसे आर्थिक संरक्षण से परे कर दिया है और जो मिल रहा है वह कोई नया प्रयोग करने की इजाजत नहीं देगा पर अंतर्जाल पर इसकी गुंजायश है अगर आप धन कमाने की इच्छा की बजाय लिखने में अधिक रुचि रखते हैं। वैसे भी समाचार पत्र पत्रिकाओं में लिफाफा भेजकर थक जाने से अच्छा है कि यहां टंकित कर थका जाये। इसके अलावा एक बाद दूसरी भी है कि अगर आप किसी पद, पैसे और प्रतिष्ठा के शिखर पर हैं तो आपको समाचार पत्र पत्रिकाओं में स्थान नियमित रूप से मिल सकता है वरना तो एकाध बार छपे फिर भूल जाओ। समाचार पत्र पत्रिकाओं में पत्रकार के रूप में कार्यरत लोगों को कितना संघर्ष करना पड़ रहा है यह बात अंतर्जाल पर ही उनके लेखों से पता लगता है पर क्या कोई अन्य प्रकाशन उनको अपने यहां स्थान देगा? सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर आप शिखर पुरुष नहीं हैं तो हिन्दी में लिखकर ही आप लोकप्रिय न हों यह जाने अनजाने पूंजी बाजार ने तय कर लिया है। अंतर्जाल इस चक्र को तोड़ने जा रहा है। एक आम ब्लाग लेखक को कब तक अदना समझेंगे? नयी पीढ़ी के लेखक इधर आयेंगे तब क्या होगा? संभव है कि आगे चलकर लिखने वाले अंतर्जाल पर ही वैसे लिखना प्रारंभ करें जैसे कि पुराने लेखक अपने शैक्षणिक कागजों पर करते थे।
उस स्तंभकार को गुरु मानना चाहिये जिसने इस लेखक के अंश लेकर यही प्रमाणित किया कि ऐसा चिंतन वह नहीं कर सकता था भले ही उसका नाम चमक रहा हो। पाठक इसे अतिश्योक्ति न समझें। गांधीजी, नोबल और ओबामा पर लिखे गये लेख देखें तो यह बात समझ में आ जायेगी कि उसमें लिखी गयी बातें पहले किसी ने नहीं लिखी थी। देश का विभाजन और उसके बाद हुई हिंसा पर बहुत लिखा गया पर यह किसने लिखा कि अंग्रेज और उनके पिट्ठुओं की यह योजना थी कि गांधी के देश में हिंसा हो ताकि लोगों को बतायें कि इसका संदेश एक धोखा है। उनको डर था कि वह उनके इष्ट देव की जगह गांधी जी पूरे विश्व में पुजने लगेंगे और इसलिये वह इस देश को हानि पहुंचाकर गांधी जी को महत्वहीन करना चाहते थे।
अखबारों में छपने का मोह वैसे ही नहीं रहा। इतना छप चुके पर यहां लिखने का मतलब यह था कि समझदार लोगों को अपने मन की बात बतायें ताकि उनका विस्तार होता रहे। चिंतन के बारे में क्या कहें? लिखता और सोचता कोई और है हम टाईप करते हैं। एक दृष्टा की तरह जीने की आदत होती जा रही है। हमारे एक निजी मित्र एल.एन. त्रिवेदी ने -जिन्होंने बाद में अनुरक्ति के नाम से ब्लाग बनाया-कहा था कि ‘तुम तो चिंतन लिखा करो कविताओं में मजा नहीं आता।’
सबसे पहले ब्लाग का नाम ही रखा था ‘चिंतन’। उस दिन अंतर्जाल के एक मित्र श्री रवीद्र प्रभात ने भी ‘गंभीर चिंतन’ में हमें विशिष्ट ब्लागर मान लिया तो डर गये। जल्दी अपने को संभाल लिया क्योंकि हम दृष्टा की तरह देखने लगे थे। त्रिवेदी जी और प्रभात जी के बीच में जो था हम उसे देख रहे थे। प्रसंगवश समय पास करने तथा ब्लाग/पत्रिका को अपडेट करने के लिये लिखी गयी कविताओं ने भी कम रंग नहीं जमाया। ऊपर वर्णित पांच ब्लाग में से आखिरी चार वर्डप्रेस के हैं और उनको ऊंचाई पर पहुंचाने में अध्यात्मिक लेखन और इन्हीं कविताओं ने पहुंचाया है। किसी से कोई शिकायत नहीं है। प्रचार माध्यमों में काम रहे पत्रकारों से बस यह आशा करता हूं कि मेरे लेखक को प्रोत्साहित करें तो अच्छा ही है। एक दो अखबार ने अध्यात्मिक ब्लाग छापा है। इसलिये सभी पत्रकार, लेखक, तथा पाठक मित्रों आभार व्यक्त करता हूं। तीन वर्ष पूरे होने पर बस इतना ही।
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप

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