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Sunday, November 7, 2010

साभार कार्यक्रम-हिन्दी व्यंग्य (sabhar karyakram-hindi vyangya

धरती पर विचरने वाला सौर मंडल! कल जब इस विषय पर लेख लिखा था तब यह स्वयं को ही समझ में नहीं आ रहा था कि यह चिंत्तन है कि व्यंग्य! हमें लगने लगा कि यह किसी की समझ में नहीं आयेगा, क्योंकि उस समय दिमाग सोचने पर अधिक काम कर रहा था लिखने में कम! मगर ऐसे में उस पर आई एक टिप्पणी से यह साफ हो गया कि जिन लोगों के लिये लिखा गया उनको समझ में आ गया।
मुश्किल यह है कि चिंत्तन लिखने बैठते हैं तब किसी विषय पर तीव्र कटाक्ष करने की इच्छा होती है, तब कुछ न कुछ व्यंग्यात्मक हो ही जाता है। जब व्यंग्य लिखने बैठते हैं तो अपने विषय से संबंधित कुछ गंभीर चर्चा हो ही जाती है और वह चिंत्तन दिखने लगता है।
ब्लाग पर लिखते हुए पहले हम यह सोचते थे कि दोनों भाव एक साथ न लायें पर जब समाचार चैनलों को समाचार से अधिक खेल, हास्य तथा मनोरंजन से संबंधित अन्य चैनलों की सामग्री प्रसारित करते देखते हैं तो सोचते हैं क्यों न दोनों ही विद्यायें एक साथ चलने दी जायें। हम उनकी तरह धन तो नहीं कमा सकते पर उनकी शैली अपनाने में क्या बुराई है? इधर अमेरिका के राष्ट्रपति का भारत आगमन क्या हुआ? सारे चैनलों के लिये यही एक खबर बन गयी है। कब किधर जा रहे हैं, आ रहे हैं और खा रहे हैं, यह हर पल बताया जा रहा है। ऐसा लगता है कि बाकी पूरा देश ठहर गया है, कहीं सनसनी नहीं फैल रही। कहीं हास्य नहंी हो रहा है। कहीं खेल नहीं चल रहा है।
हैरानी होती है जिस क्रिकेट से यही प्रचार माध्यम अपनी सामग्री जुटा रहे थे उसके टेस्ट मैच-यह भारत और न्यूजीलैंड के बीच अहमदाबाद में चल रहा है-की खबर से मुंह फेरे बैठे हैं। कल इनका कथित महानायक या भगवान चालीस रन बनाकर आउट हो गया जबकि यह उससे पचासवें शतक की आशा कर रहे थे। हो सकता है कि उस महानायक या भगवान ने सोचा हो कि क्यों इनके अस्थाई भगवान यानि अमेरिकी राष्ट्रपति के सामने खड़ा होकर धर्मसंकट खड़ा किया जाये। इस धरती पर विचरने वाले सौर मंडल-पूंजीपति, धार्मिक ठेकेदार, अराजक तत्व तथा उनके दलाल-के लिये स्वर्ग है अमेरिका। वैश्वीकरण ने पूरी दुनियां को एक राष्ट्र बना दिया है अमेरिका! इसलिये अमेरिका के राष्ट्रपति को अब विश्व का दबंग कहकर प्रचारित किया जा रहा है। बाकी राष्ट्रों के प्रमुख क्या हैं, यह वही जाने और उनके प्रचार माध्यम! ऐसे में क्रिकेट के भगवान या महानायक ने चालीस रन पर अपनी पारी निपटाकर प्रचार माध्यमों को संकट से बचा लिया। अगर वह शतक बनाता तो संभव है टीवी चैनल और अखबार में संकट पैदा हो जाता कि किसको उस दिन का महानायक बनाया जाये। अपनी खबर को अगले मैचों तक के लिये रोक कर उसने प्रचार माध्यमों को धर्मसंकट से बचा लिया। ख् वह पचासवां शतक नहीं बना सके-इस खबर से ऐसा लगता है कि जैसे नब्बे तक पहुंच गये थे, पर वह तो चालीस रन बनाकर आउट हो गया। इस तरह इन भोंपूओं ने सारी दुनियां में धरती पर विचरने वाले सौर मंडल को बताया कि देखो कैसे क्रिकेट के भगवान या महानायक ने अपनी वफादारी निभाई।
जिस पूंजीवाद को हम रोते हैं वह अब चरम पर है। अब तो ऐसा लगता है कि विश्व के अनेक विकासशील देशों के राष्ट्रप्रमुख अपने लिये अमेरिका को ही संरक्षक मानने लगे हैं। यही कारण है कि पूंजी के बल पर चलने वाले प्रचार माध्यम भले ही चौथे स्तंभ के रूप में अपनी भूमिका जनाभिमुख होने का होने का दावा करें पर यह सच नहीं है। वह अपने समाचार और विषय जनता पर थोप रहे हैं। कम से कम भारत में अमेरिकी राष्ट्रपति की यात्रा को लेकर जनमानस इतना उत्साहित नहीं है जितना समाचार चैनल उसे दिखा रहे हैं। इस समय देश में दीपावली का पर्व की धूम है। इधर अमेरिका का भव्य विमान भारत में उतर रहा था भारत में लोग तब फटाखे फोड़ने और मिठाई खाने में लोग व्यस्त थे। फिर भाईदूज का दिन भी है जब लोग अपने घरों से इधर उधर जाते और आते हैं। ऐसा लगता है कि यह यात्रा कार्यक्रम ही इस तरह बनाया गया कि भारत के लोग घरों में होंगे तो उन पर अपने महानायक का प्रचार थोपा जायेगा। हालांकि अनेक मनोरंजन और धार्मिक चैनलों के चलते यह संभव नहीं रहा कि कोई एक प्रकार के चैनल अपना कार्यक्रम थोप ले पर समाचारों में दिलचस्पी रखने वालों की संख्या कम नहीं है और अंततः उनको एक कम महत्व का समाचार बार बार देखना पड़ा।
समाचार पत्र पत्रिकाऐं, टीवी चैनल और रेडियो इनको एक प्रकार से लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। पहले केवल प्रकाशन पत्रकारिता को ही चौथा स्तंभ माना जाता था पर अब आधुनिक तकनीकी के उपयोग के चलते बाकी अन्य दोनों माध्यमों को भी इसमें शामिल कर लिया गया है। समाचार चैनलों के कार्यकर्ता यह कहते है कि लोग इसी तरह के कार्यक्रम पसंद कर रहे हैं पर उन्हें यह पता होना चाहिए कि वह अपने मनोरंजन कार्यक्रमों को समाचारों की आड़ में थोप रहे हैं। इतना ही नहीं समाचारों के नाम पर भी अब अपने नायक बनाने लगे हैं। कभी फिल्म तो कभी क्रिकेट तो कभी टीवी धारावाहिकों से जुड़े लोगों को अनावश्यक प्रचार देने लगते हैं।
यह देश के समाचार चैनलों के लिये ही चिंताजनक है कि आम जनमानस में उनको एक समाचार चैनल की तरह नहीं बल्कि मनोरंजन कार्यक्रमों के नाम पर ही जाना जा रहा है। इन चैनलों की छबि भारत में नहीं बल्कि बाहर भी खराब हो गयी है। अगर ऐसा न होता तो ओबामा बराक हुसैन के भारत दौरे में मुंबई के कार्यक्रमों में उनको दूर नहीं रखा जाता। याद रखिये वहां के कार्यक्रमों में केवल दिल्ली दूरदर्शन को ही आने का अवसर मिला। क्या कभी अमेरिका के राष्ट्रपति की यात्रा के दौरन किसी पश्चिमी देश में भी ऐसा होता है कि वहां के समाचार चैनलों में किसी एक को ही ऐसा अवसर मिलता हो। यहां हम देखें तो अपने देश के समाचार चैनल संभव है कि विदेशी समाचार चैनलों से अधिक कमा रहे हों पर उनकी वैसी छबि नहीं है। इसका कारण यह है कि एक समाचार चैनल के नाते उनको जनमानस से सहानुभूति नहीं मिलती और जो उन्होंने खुद ही खोई है। वरना क्या वजह है कि दुनियां के सबसे बड़े लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर दावा करने वाले अनेक समाचार पत्रों तथा टीवी चैनलों की ऐसी उपेक्षा की गयी और वह भी दुनियां के सबसे महान लोकतांत्रिक देश होने का दावा करने वाले अमेरिका के रणनीतिकारों के कम कमलों से। बहरहाल यह तय है कि धरती पर विचरने वाले सौर मंडल के सूर्य कहे जाने पूंजीपतियों का उनको वरदहस्त बराबर मिलेगा क्योंकि उनके महानायक को वैसा ही प्रचार दिया जिसकी चाहत थी। यह पहला अवसर था कि जब कोई समाचार चैनल यह दावा नहीं कर रहा था कि यह सीधा प्रसारण आप हमारे ही चैनल पर देख रहे हैं। सभी ने दूरदर्शन से साभार कार्यक्रम लिया।
एक बुद्धिमान आज सब्जी खरीद रहे थे। पास में उनके एक मित्र आ गये। उन्होंने बुद्धिमान महाशय से कहा-‘आज ओबामा जी का क्या कार्यक्र्रम है? कहंी पढ़ा या सुना था। हमारे यहां तो सुबह से लाईट नहीं थी।’
बुद्धिमान महाशय ने कहा-‘क्या खाक देखते? हमारी भी लाईट सुबह से नहीं है। पता नहीं ओबामा का आज क्या कार्यक्रम है?
सब्जी वाले ने बीच में हस्तक्षेप किया‘यह आप लोग लाईट न होने से किसकी बात कर रहे हो।’
बुद्धिमान ने कहा-‘तू चुपचाप सब्जी बेच, ऐसे समाचार सुनना और देखना हमारे जैसे फालतू लोगों का काम है या कहो मज़बूरी है।’
मित्र ने अपना सिर हिलाया और बोला-‘हां, यह बात सही है।
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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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Sunday, August 29, 2010

हिन्दी भाषा के अंग्रेजीकरण की कोशिश निरर्थक-हिन्दी लेख (hindi bhasha aur devnagari lipi-hindi lekh)

अंतर्जाल पर लिखने में कोई संकट नहीं है जितना कि लोगों की कमेंट पढ़ने में लगती है। जो लोग अपनी टिप्पणियों में वाह वाह या बढ़िया लिख जाते हैं धन्य हैं, और जो थोड़ा विस्तार से लिखे गये पाठ के संदर्भ में नयी बातें लिख जाते हैं वह तो माननीय ही हैं शर्त यह है कि उनकी लिपि देवनागरी होना चाहिए। अगर कहीं रोमन लिपि में हुआ तो भारी तकलीफदेह हो जाता है और काफी देर तक तो यही संशय रहता है कि कहीं वह टिप्पणीकर्ता मजाक तो नहीं उड़ा रहा।
हम बात करें उन लोगों की जो रोमन लिपि में हिन्दी लिखना और पढ़ना चाहते हैं। अपना विचार तो यह है कि रोमन लिपि में हिन्दी लिखने से तो अच्छा है कि सीधे अंग्रेजी में लिखो। इधर सुन रहे हैं कि कुछ विद्वान आधिकारिक रूप से हिन्दी को रोमन लिपि में बांधने के लिये तैयार हो चुके हैं।
अरे, रुको यार पहले हमारी सुनो।
हम तो कह रहे हैं कि नहीं तुम तो बिल्कुल अंग्रेजी को भारत में लादने के लिये कमर कसे रहो। इस पर हमारा पूरा समर्थन है। इधर हम अपने ब्लाग पर हिन्दी में लिखते जायेंगे उधर तुम्हें भी अंग्रेजी के लिये समर्थन देते रहेंगे। कम से कम रोमन लिपि में हिन्दी लिखकर हमारे लिये टैंशन यानि तनाव मत पैदा करो।
होता यह है कि कुछ लोग हमारे लिखने से नाराज होते हैं। अगर वह अंग्रेजी में नकारात्मक टिप्पणी लिखते हैं तो उसे पढ़कर अफसोस नहीं होता।
लिख देते हैं ‘bed poem, you are a bed writer वगैरह वगैरह। हम उनको उड़ा देते हैं। कोई चिंता नहीं! अंग्रेजी में ही हो तो है। किसी ने हिन्दी तो नहीं लिखा। यह तसल्ली इसी तरह की है कि किसी दूसरे शहर में पिटकर आया आदमी अपनी ताकत का बयान अपने शहर में करता है।
अंग्रेजी नहीं आती पर पढ़ लेते है। कोई बात समझ में नहीं आये तो डिक्शनरी की मदद लेते हैं। एक बार एक शब्द आया था जो कविता के बुरे होने की तरफ इशारा कर रहा था। शब्द देखकर लगा कि कम से कम यह अच्छी बात तो नहीं कह रहा। फिर डिक्शनरी की मदद ली। बाद में उस टिप्पणी को हटा दिया। हिन्दी में होती तो सोचते। इससे कुछ लोगों को गलत फहमी हो गयी कि इस लेखक को अंग्रेजी नहीं आती तो अब कभी कभार रोमन लिपि में हिन्दी लिखकर अपनी नकारात्मक राय रखते हैं। यह तकलीफ देह होता है। रखते तो वह भी नहीं है पर पढ़ने में भारी तकलीफ होती है।
अगर कोई लिख देता है कि bakwas तो पढ़ने में क्रष्ट जरूर होता है पर समझने में नहींपर अगर कोई लिखता है bed तो वह तत्काल समझ में आ जाता है उसको भी धन्यवाद देते हैं कि पढ़ने में तकलीफ नहीं हुई। चलो इनसे तो निपट लेते ही हैं पर कुछ लोग पाठों की प्रशंसा में ऐसी टिप्पणियां लिखते हैं जो वाकई उस उसकी चमक बढ़ाते हैं और कहना चाहिये कि पाठ से अधिक प्रशंसनीय तो उनकी टिप्पणी होती है मगर दुःख यह कि वह रोमन लिपि में होती हैं। उनका हटाना पाप जैसा लगता है पर एक बात निश्चित यह है कि हिन्दी का पाठक जब उस पाठ को पढ़ते हुए जब टिप्पणियां पढ़ना चाहेगा तो वह उसे रोमन लिपि में देखकर अपना विचार त्याग देगा और टिप्पणीकर्ता अन्याय का स्वयं ही शिकार होगा।
जिन लोगों को हिन्दी से परहेज है वह उसमें लिखा हुआ लिपि रोमन हो या देवनागरी में कतई नहीं पढ़ेगा क्योंकि उसकी नाराजगी भाषा से है न कि लिपि से। वैसे तो देवनागरी में हिन्दी लिखना इंटरनेट पर कठिन था पर टूलों की उपलब्धता ने उसे समाप्त कर दिया है। अब तो जीमेल पर ही हिन्दी में लिखकर अपना संदेश कट पेस्ट कर कहीं भी रखा जा सकता है। इसलिये आम पाठकों को भी ऐसी शिकायत नहीं करना चाहिये क्योंकि इंटरनेट पर पढ़े लिखे लोग ही सक्रिय हो पाते हैं।
भाषा का संबंध हृदय के भाव से तो लिपि का संबंध मस्तिष्क से होता है। जो लोग रोमन लिपि में हिन्दी लिखना चाहते हैं उनकी निराशाओं को समझ सकते। बहुत प्रयास के बावजूद हिन्दी आम भारतीय की भाषा है। यह अलग बात है कि हिन्दी बाज़ार अंग्रेजीदांओं के कब्जे में है। दरअसल मोबाइल पर एसएमएस लिखवाने के लिये यह बाज़ार विशेषज्ञ अपने प्रायोजित विद्वानों को सक्रिय किये हुए हैं जो रोमन लिपि को यह स्थाई रखना चाहते हैं। उनको लगता है कि बस, रोमन लिपि में यहां का आम आदमी अपना एसएमएस कर अपने हाथ बर्बाद करे। याद रहे कि अधिक एसएमएस करने से लोगों के हाथ बीमार होने की बात भी सामने आ रही है। यह एसएमएस की प्रथा नयी है इसलिये अभी चल रही है और एक दिन लोग इससे बोर हो जायेंगे तब यह रोमन का भूत भी उतर जायेगा। वैसे अनेक लोग यह भी कोशिश कर रहे हैं कि रोमन लिपि से ही ऐसे संदेश हों।
आखिरी बात यह है कि इंटरनेट ने सभी को दिग्भ्रमित कर दिया है। अभी तक देश के आर्थिक, सामाजिक, तथा अन्य प्रतिष्ठित क्षेत्रों में जिन समूहों या गुटों का कब्जा रहा है वह अब आम आदमी पर नियंत्रण खोते जा रहे हैं। अगर भाषा की बात करें तो आज़ादी के बाद हिन्दी में जो लिखा गया है लोग उस पर असंतोष जता रहे हैं। फिल्में पिट रही हैं, अखबार भी अधिक महत्व के नहीं रहे, टीवी चैनल तो आपस में ही लड़ रहे हैं। पहले उनकी सामग्री की चर्चा लोगों के बीच में होती है पर अब बहुतायत के कारण कोई किसी से जुड़ा है तो कोई किसी से।
आम आदमी को भेड़ की तरह चलाने के आदी कुछ लोग इंटरनेट पर सक्रिय लोगों को आज़ाद देखकर घबड़ा रहे हैं। इसलिये अपने चेले चपाटों के माध्यम से अपना खत्म हो रहा अस्तित्व बचाने में जुटे हैं। इसके लिये पहले उन्होंने हिन्दी के फोंट न होने की बात प्रचारित की और वह जब सार्वजनिक हो गये तो अब वह बता रहे हैं कि रोमन लिपि में लिखकर विश्व पर राज करेंगे क्योंकि दूसरे देश भी इसे सीखेंगे। भाषा के सहारे सम्राज्यवाद का उनका सपना केवल एक ढोंग है क्योंकि हिन्दी में लिपि संबंधी बहस से अधिक समस्या उसमें सार्थक लिखने की है। वह भी इस तरह का लेखन करना होगा जो अभी तक बाज़ार में न दिखा हो। जिन्होंने हिन्दी के बाज़ार पर कब्जा कर रखा है वह इंटरनेट पर भी ऐसे सपने देखने लगे हैं। जबकि हमारा मानना है कि जैसे जैसे इंटरनेट पर लोगों की सक्रियता बढ़ेगी उनके बहुत सारे भ्रम टूटेंगे जो उन पर थोपे गये। इंटरनेट पर देवनागरी में हिन्दी लिखने की बढ़ती जा रही सरलता उनको अंततः अपना मार्ग छोड़ने को बाध्य कर देगी। इस तरह हिन्दी भाषा के अंग्रेजीकरण की कोशिश एक निरर्थक कदम है।
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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Saturday, March 27, 2010

माउस, रिमोट और मोबाइल-हिन्दी व्यंग्य (mouse, remote and mobile-hindi satire)

इधर भारत में चल रही एक क्लब स्तरीय क्रिकेट प्रतियोगिता की वजह से अपने ब्लाग पिटने लगे हैं। यह बुरी स्थिति है। क्रिकेट के एक दिवसीय या टेस्ट मैच हैं तो उसी दिन ही ब्लाग पिटते हैं जिस दिन मैच होता है पर क्लब स्तरीय क्रिकेट प्रतियोगिता में रोज मैच होने की वजह से यह स्थिति आ जाती है कि ब्लाग की पाठक संख्या में 40 से 50 प्रतिशत गिरावट दर्ज होती है। जब भारत का कोई मैच होता है तब यह गिरावट दुःखदायी नहीं लगती क्योंकि लगता है कि बाज़ार देश प्रेम बेच रहा है और अगर कुछ लोग उसमें फंस जाते हैं तो कोई बात नहीं। सभी तो ज्ञानी ध्यानी हो नहीं सकते कि इस बात को समझें कि देशप्रेम भी अब बाजार के सौदागरों के लिये बेचने वाली चीज हो गयी है। मगर यह क्लब स्तरीय क्रिकेट प्रतियोगिता के मैचों में तो बाजार के सौदागरों पर ऐसा कोई आरोप नहीं लगाया जा सकता। वह तो शुद्ध रूप से इसे सर्कस की तरह चला रहे हैं फिर भी लोग इसमें इतने व्यस्त हो गये हैं तब लगता है कि वाकई यहां रचनात्मक कार्य करने वालों के लिये कोई जगह नहंी है पर जब बची हुई पाठक संख्या को देखते हैं तो इस बात का दर्द कम हो जाता है और यह यह सोचकर संतोष कर लेते हैं कि पूरा देश अज्ञान के अंधेरे में नहीं भटक रहा। सबसे अधिक अफसोस इस बात का है कि इस देश के लोगों का चालीस प्रतिशत से अधिक वर्ग बाज़ार और उसके द्वारा स्थापित प्रचार तंत्र के प्रचार की जद में है-हां, ब्लाग पर इतनी ही पाठक संख्या की गिरावट दर्ज की गयी है। खुशी इस बात की है कि साठ प्रतिशत भाग अभी भी स्वतंत्र रूप से सोचता है और वह क्लब स्तरीय क्रिकेट प्रतियोगिता के जाल में नहीं फंसा।
दरअसल लोग हमेशा मनोरंजन चाहते हैं और वह जो उन्हें बैठे ठाले आंखों के सामने प्रकट हो जाये या उनकी उंगली के इशारे के आदेश पर ही सामने दृश्य चले। यहां हर आदमी उंगलियों के इशारे सभी को नचाने का ख्वाब देखता है और ऐसे में उसे रिमोट, माउस तथा मोबाइल जैसे साधन खिलौने की तरह मिल गये हैं। इन पर उंगलियां दबाने से जो दबाव दिमाग पर पड़ता है और उससे शरीर पर उसका क्या दुष्प्रभाव होता है यह अब स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताने लगे हैं। एक लड़की रोज अनेक एस. एम. एस. संदेश भेजती थी और नतीजा यह रहा कि उसकी उंगलियों ने काम करना बंद कर दिया।
इस लेखक ने कई बार देखा है कि मोबाइल, रिमोट तथा माउस पर उंगलियों दबाने से दिमाग पर काफी दबाव पड़ता है तब सोचते हैं कि पता नहीं कैसे लोग इससे इतना चिपके रहते हैं। लोग टीवी पर रिमोट से कार्यक्रम बदल कर खुश होते हैं कि आसानी से मनोंरजन मिल रहा है। कंप्यूटर पर भी जो बैठते हैं वह केवल माउस से ही काम चलाते हैं। इधर बड़े बड़े चैनल भी लोगों को एस. एम. एस. करने के लिये प्रेरित करते रहते हैं। लोग हैं कि उसमें व्यस्त हो जाते हैं। अगर हम यह कहें कि लोग एक तरह से अपनी उंगलियों के द्वारा ही अपने शरीर से खिलवाड़ कर रहे हैं तो गलत नहीं होगा। यह हमारा नहीं बल्कि स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है।
एक सवाल यह है कि आखिर लोग क्लब स्तरीय क्रिकेट प्रतियोगिता को क्यों देख रहे हैं? दरअसल मनोरंजन के लिये उत्सुक लोगों के लिये बाजार के सौदागरों तथा उनके प्रचार प्रबंधकों ने अधिक अवसर छोड़े ही नहीं हैं। जब भारत में निजी चैनलों का प्रवेश हो रहा था उसी समय ही दूरदर्शन पर कार्यक्रमों का स्तर एकदम गिर गया था। हालत यह हो गयी थी कि शनिवार और रविवार को भी कार्यक्रम अच्छे नहीं दिखते थे। उस समय मंडी हाउस क्या कर रहा था, कुछ पता नहीं जबकि वह देश मनोरंजन कार्यक्रमों के निर्धारण के लिये के लिये एक केंद्र बिंदु था-प्रसंगवश उसके मुखिया हिन्दी भाषा के एक विद्वान ही थे। नतीजा यह रहा कि निजी टीवी चैनल छा गये। इन चैनलों ने कार्यक्रम अच्छे प्रस्तुत किये पर जल्द ही उनकी कमाई जरूरत से ज्यादा हो गयी। अब बाजार के बंधक हो गये हैं। इसलिये वह बाजार द्वारा प्रायोजित कार्यक्रमों को जनता के समक्ष लाने के लिये अपने कार्यक्रमों का स्तर गिरा रहे हैं। मनोरंजन और समाचार चैनलों में कोई अधिक अंतर नहीं  रहा है। मनोरंजन चैनलों के हास्य कार्यक्रमों में भी क्लब स्तरीय क्रिकेट प्रतियोगिता का नाम किसी न किसी रूप में लिया जाता है ताकि उसके दर्शक जरूर याद रखें। मतलब वह मनोंरजन चैनल जो कि क्लब स्तरीय क्रिकेट प्रतियोगिता का सीधा प्रसारण नहंी करते वह भी इस बात के लिये तैयार रहते हैं कि उनका दर्शक अगर वह मैच नहीं देखता तो जाकर देखे। यह कोई त्याग नहीं बल्कि बाजार और प्रचार तंत्र के अटूट संबंधों का प्रमाण है।
लोगों के पास इंटरनेट है पर उन्होंने उसे मनोरंजन के साधन के रूप में लिया है इसलिये हिन्दी के पाठक कम ही मिलते हैं पर जब क्लब स्तरीय क्रिकेट प्रतियोगिता चलती है तब उनमें संख्या कम तो हो ही जाती है। लोग माउस से कष्ट उठाने से बच जाते हैं क्योंकि यह काम वह टीवी पर रिमोट के जरिये करते हैं। इस तरह रिमोट, माउस और मोबाइल के बीच में भारतीय समाज अपनी उंगलियां फंसाए हुए है। इन तीनों का अविष्कार अमेरिका की देन है जिसके स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार अपनी उंगलियां बचाने के लिये सुझाव दे रहे हैं कि ऐसा काम करो जिससे दोनों हाथ सक्रिय रहे। यह काम तो केवल ब्लाग लेखन से ही हो सकता है। गनीमत हम यही कर रहे हैं अलबत्ता अनेक बार दूसरी वेब साईटें देखने के लिये माउस का सहारा लेते हैं पर अब सोच रहे है कि गूगल के फायरफाक्स के जरिये दोनों हाथों की सक्रियता से ही यह काम करें और अधिक से अधिक टेब और बैक स्पेस से काम करें। टीवी और क्लब स्तरीय क्रिकेट प्रतियोगिता के मैचों से इतना उकता गये हैं कि इंटरनेट के अलावा कोई दूसरा साधन हमारे समझ में ही नहीं आता। यह तो अपने गुरुजनों के आभारी है कि उन्होंने हमारे अंदर लेखक को स्थापित कर दिया जिससे यहां लिखने का मजा लेते हैं वरना तो बेकार में उंगलियों के सहारे माउस पर नाच रहे होते।
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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Monday, December 28, 2009

अंतर्जाल पर लिखने के तीन वर्ष पूरे-संपादकीय (three year hindi writing on internet-hindi editoial)

अंतर्जाल पर लिखते हुए तीन वर्ष का समय हो गया। कहना कठिन है कि अपना उद्देश्य कहां तक प्राप्त किया। वैसे ही लिखने को लेकर अपनी सफलता या असफलता का विचार नहीं किया। न ही इस बात पर विचार किया कितने लोगों ने पढ़ा? अलबत्ता अपने जीवन में लिखना शुरु करने से आज तक एक बात का अनुभव किया कि इस संसार में ऐसे मित्र लेखन के क्षेत्र में ही मिलते हैं जो आपके प्रशंसक और आलोचक होने के साथ ही व्यक्तिगत रूप से हितैषी होते हैं। अंतर्जाल पर छद्म नामों को लेकर समस्या न हो तो यह कहना सरल है कि यहां भी इस लेखक को बहुत अच्छे मित्र अधिक संख्या में मिले। कम से कम एक बात में उन्होंने निभाया कि ‘जबरन सफल’ बनाने का कोई प्रयास न कर नये प्रयोगों के लिये प्रेरणा तो दी।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि अभी अपनी सफलता के दावे करना मूर्खता होगी तो अपनी असफलता को लेकर कुंठा पालना उससे भी अधिक मूर्खता! इस लेखक के पांच ब्लाग गूगल की पैज रैंक में चार अंक ले चुके हैं।
1.शब्द लेख सारथी पत्रिका
2.दीपक बापू कहिन
3.ई-पत्रिका
4.शब्द पत्रिका
5.शब्द लेख पत्रिका
कुल बीस ब्लाग/पत्रिका में 12 अन्य तीन अंक लिये हुए हैं। पांच ब्लाग का चार अंक में होना शायद इतना अधिक सफल होना न लगे-क्योंकि अंतर्जाल पर हिन्दी लिखने को लेकर अनेक भ्रम है-मगर अपने लेखकीय कर्म से एक बात अनुभव कर ली है कि अंग्रेजी पर बहुत कुछ समाग्री इस अंतर्जाल पर है पर इसका मतलब यह नहीं है कि उसके ब्लाग या वेबसाईटें हिन्दी से अधिक पाठक जुटाती हैं। ब्लाग/वेबसाईटें की रैंक बताने वाली एक वेबसाईट पर इस लेखक का एक ब्लाग साहित्य श्रेणी में है जो कल चतुर्थ वरीयता तक पहुंचा था और उसके पीछे 106 ब्लागों में बहुत सारे अंग्रेजी के थे। हिन्दी की एक व्यवसायिक वेबसाईट भी उसके बहुत पीछे थी। इस रैंकिंग वाली साईट पर अपने ब्लाग पंजीकृत करने पड़ते हैं इसलिये जो पंजीकृत नहीं है उनसे मुकाबला करना ठीक नहीं हैं पर इतना जरूर है कि हिन्दी के ब्लाग को अंग्रेजी से बढ़त नहीं मिलेगी यह सोचना भी गलत है-इससे यह बात समझ में आती है। इसी वेबसाईट पर अन्य श्रेणियों में भी इस लेखक के ब्लाग पंजीकृत हैं और उन्होंने अंग्रेजी ब्लागों पर बढ़त बनायी है।
अगर देश के हिन्दी विद्वान या संगठित क्षेत्रों की संस्थायें हिन्दी ब्लाग लेखक को अदना समझ रही हैं तो यह उनका अल्पज्ञान है। आधुनिक काल के लेखकों को लेकर भले ही संगठित प्रकाशन संस्थायें अभी भी आशावादी बनी हुईं हैं पर उनको यह जानकर निराशा होगी कि वैश्विक काल में दाखिल हो चुकी हिन्दी के लिये अब भी स्वर्ण काल या भक्ति काल की रचनायें ऊर्जा प्रदान करेंगी और आधुनिक काल के लेखकों की रचनायें यहां अधिक सफल नहंी होती दिख रही बल्कि अंतर्जाल पर ‘गागर में सागर’ भरने वाले नये लेखक ही अब उसे आगे ले जायेंगे और यकीनन वह उनके नियंत्रण से बाहर होंगे।
एक रोचक किस्सा है जिसका संबंध अंतर्जाल पर लिखने को लेकर ही है। एक अखबार अक्सर इस लेखक के अध्यात्मिक ब्लाग से रचनायें उठाकर अपने यहां बिना नाम के छाप रहा था। यह अखबार लेखक के घर भी आता था। एक दिन लेखक की नज़र अध्यात्मिक स्तंभ की तरफ गयी तो यह देखकर दंग रह गया था कि वह जस की तस इस लेखक के ब्लाग से उठायी गयी थी। तब इस लेखक ने अन्य दिनों अंक भी चेक किये। उसी अखबार में प्रकाशित एक लेख में उसके स्तंभकार ने ओबामा और गांधी जी पर नोबल पुरस्कार पर लिखे गये इस लेखक के तीन लेखों के अनेक अंशों को जस की तस नहीं छापा तो शब्दों का हेरफेर भी अधिक नहीं थी। दो अक्टूबर गांधी जयंती को लेकर भी इस लेखक के लेख केे अंशों का उसमें उपयोग किया गया था।
इस लेखक ने उसके संपादक को फोन किया। संपादक ने अध्यात्मिक विषयों को लेकर कहा-‘यह तो अच्छी बात है कि आपके संदेशों का प्रसारण सभी जगह हो रहा है।’
इस लेखक ने कहा-‘उससे हम नहीं रोक रहे, मगर लेखक का नाम तो दें।’
उसने बड़ी मासूमियत से कहा-‘उसे वैसे के वैसे नहीं लिया होगा। कुछ तो शब्दों में हेरफेर होगा।’
इस लेखक को हंसी आ गयी। उसने कहा-‘नहीं, वैसे के वैसे ही उठाये गये हैं।
संपादक ने कहा-‘ठीक है! हमने अपने संबंधित संपादक को मना कर देंगे कि वह आपके लेख न ले। ले तो नाम छापे। वैसे हम उसे मना ही कर देंगे कि आपके लेख की कापी न करे।’
उसके बोलने से किसी को दुःख होता पर इस लेखक को हंसी आयी। उस मासूम संपादक ने प्रकाशन माध्यमों में ब्लाग लेखकों की सोच का ज्ञान दिया था और इस मामले में उसे गुरु कहना ठीक रहेगा।
उसकी ईमानदारी पर तारीफ करना चाहिये कि फिर उसने अभी तक ऐसा नहीं किया। अलबत्ता इस लेखक ने उस स्तंभकार की शिकायत नहीं की क्योंकि यह उस संपादक की या अखबार की जिम्मेदारी नहीं थी। फिर स्तंभकार का नाम तो याद रहेगा। अब इस समस्या पर संपादक या स्तंभकार को दोष देना भी गलत लगता है क्योंकि मानवीय प्रवृत्तियों पर भी विचार करना चाहिये। वह संपादक और स्तंभकार मेरी तरह ही सामान्य वर्ग के होंगे। अपने रोजगार से जुड़े होने के कारण शायद वह अंतर्जाल के बारे में इतना नहीं जानते होंगे। जैसा प्रचार माध्यम प्रचारित कर रहे हैं वैसे ही लोग अपने विचार बनाते हैं। यह स्वतंत्र दिखने वाले प्रचार माध्यम क्या हैं, इस पर बहस इस लेख में नहीं करना है पर उनके प्रभाव से इंकार नहीं किया जा सकता। आजादी के बाद बड़े बड़े लेखक हुए हैं पर बताईये किसने कोई अमरकृति दी है और दी है तो भला वह इनसे जुड़ा रहा है? अंग्रेजी शिक्षा पद्धति का नियम है कि उतना ही पढ़ो जितना रोजगार के काम आये। जितना पढ़ो उतना ही सोचो वरना कहीं के नहीं रहोगे। कहने का तात्पर्य यह है कि एक तयशुदा प्रारूप है जिस पर सभी चले रहे हैं और नये प्रयोगों से हर कोई घबड़ाता है। दूसरी बात यह है कि जिसके पास भी थोड़ी बहुत शक्ति है वह उसका उपयोग करना चाहता है। किसी दूसरे को बढ़ाने की मनोवृत्ति अब नहीं रही जिस तरह तीन साल इस लेखक को लगे हैं उतने शायद ही अन्य कोई बर्बाद करना चाहे-क्योंकि इसके लिये यह जरूरी है कि आपका नियमित रोजगार होना चाहिये।
फिल्म, टीवी चैनल और पत्रकारिता में मौलिक लेखकों का अभाव है तो चिंतक के नाम शून्य। चिंतक कौन हैं? जो पुराने विचारों को ही आगे बढ़ा रहे हैं पर नये संदर्भों में व्याख्या करने के लिये जिस बौद्धिक क्षमता की जरूरत है वह कितनों में है? दरअसल हिन्दी में तत्काल कमाने की चाहत ने इसे आर्थिक संरक्षण से परे कर दिया है और जो मिल रहा है वह कोई नया प्रयोग करने की इजाजत नहीं देगा पर अंतर्जाल पर इसकी गुंजायश है अगर आप धन कमाने की इच्छा की बजाय लिखने में अधिक रुचि रखते हैं। वैसे भी समाचार पत्र पत्रिकाओं में लिफाफा भेजकर थक जाने से अच्छा है कि यहां टंकित कर थका जाये। इसके अलावा एक बाद दूसरी भी है कि अगर आप किसी पद, पैसे और प्रतिष्ठा के शिखर पर हैं तो आपको समाचार पत्र पत्रिकाओं में स्थान नियमित रूप से मिल सकता है वरना तो एकाध बार छपे फिर भूल जाओ। समाचार पत्र पत्रिकाओं में पत्रकार के रूप में कार्यरत लोगों को कितना संघर्ष करना पड़ रहा है यह बात अंतर्जाल पर ही उनके लेखों से पता लगता है पर क्या कोई अन्य प्रकाशन उनको अपने यहां स्थान देगा? सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर आप शिखर पुरुष नहीं हैं तो हिन्दी में लिखकर ही आप लोकप्रिय न हों यह जाने अनजाने पूंजी बाजार ने तय कर लिया है। अंतर्जाल इस चक्र को तोड़ने जा रहा है। एक आम ब्लाग लेखक को कब तक अदना समझेंगे? नयी पीढ़ी के लेखक इधर आयेंगे तब क्या होगा? संभव है कि आगे चलकर लिखने वाले अंतर्जाल पर ही वैसे लिखना प्रारंभ करें जैसे कि पुराने लेखक अपने शैक्षणिक कागजों पर करते थे।
उस स्तंभकार को गुरु मानना चाहिये जिसने इस लेखक के अंश लेकर यही प्रमाणित किया कि ऐसा चिंतन वह नहीं कर सकता था भले ही उसका नाम चमक रहा हो। पाठक इसे अतिश्योक्ति न समझें। गांधीजी, नोबल और ओबामा पर लिखे गये लेख देखें तो यह बात समझ में आ जायेगी कि उसमें लिखी गयी बातें पहले किसी ने नहीं लिखी थी। देश का विभाजन और उसके बाद हुई हिंसा पर बहुत लिखा गया पर यह किसने लिखा कि अंग्रेज और उनके पिट्ठुओं की यह योजना थी कि गांधी के देश में हिंसा हो ताकि लोगों को बतायें कि इसका संदेश एक धोखा है। उनको डर था कि वह उनके इष्ट देव की जगह गांधी जी पूरे विश्व में पुजने लगेंगे और इसलिये वह इस देश को हानि पहुंचाकर गांधी जी को महत्वहीन करना चाहते थे।
अखबारों में छपने का मोह वैसे ही नहीं रहा। इतना छप चुके पर यहां लिखने का मतलब यह था कि समझदार लोगों को अपने मन की बात बतायें ताकि उनका विस्तार होता रहे। चिंतन के बारे में क्या कहें? लिखता और सोचता कोई और है हम टाईप करते हैं। एक दृष्टा की तरह जीने की आदत होती जा रही है। हमारे एक निजी मित्र एल.एन. त्रिवेदी ने -जिन्होंने बाद में अनुरक्ति के नाम से ब्लाग बनाया-कहा था कि ‘तुम तो चिंतन लिखा करो कविताओं में मजा नहीं आता।’
सबसे पहले ब्लाग का नाम ही रखा था ‘चिंतन’। उस दिन अंतर्जाल के एक मित्र श्री रवीद्र प्रभात ने भी ‘गंभीर चिंतन’ में हमें विशिष्ट ब्लागर मान लिया तो डर गये। जल्दी अपने को संभाल लिया क्योंकि हम दृष्टा की तरह देखने लगे थे। त्रिवेदी जी और प्रभात जी के बीच में जो था हम उसे देख रहे थे। प्रसंगवश समय पास करने तथा ब्लाग/पत्रिका को अपडेट करने के लिये लिखी गयी कविताओं ने भी कम रंग नहीं जमाया। ऊपर वर्णित पांच ब्लाग में से आखिरी चार वर्डप्रेस के हैं और उनको ऊंचाई पर पहुंचाने में अध्यात्मिक लेखन और इन्हीं कविताओं ने पहुंचाया है। किसी से कोई शिकायत नहीं है। प्रचार माध्यमों में काम रहे पत्रकारों से बस यह आशा करता हूं कि मेरे लेखक को प्रोत्साहित करें तो अच्छा ही है। एक दो अखबार ने अध्यात्मिक ब्लाग छापा है। इसलिये सभी पत्रकार, लेखक, तथा पाठक मित्रों आभार व्यक्त करता हूं। तीन वर्ष पूरे होने पर बस इतना ही।
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप

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