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Wednesday, July 1, 2015

सड़कछाप के हितैषी-हिन्दी व्यंग्य कविता(sadak chhap ke hitaishi-hindi satire poem)

विकास पर आंसू बहाने वाले
विद्वानो की रोटी
भूखों के नाम पर चल ही जाती है।

सड़कछापों के हितैषियों की
महंगी विदेशी गाड़ियां भी
शहर में चल ही जाती है।

कहें दीपक बापू तख्त पर
बैठे इंसान कभी बूढ़े नहीं होते
दौलत और शौहरत के मद में
चाहे उनकी अक्ल ढल ही जाती है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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Friday, June 26, 2015

हवा और जल की ताकत-हिन्दी कविता(hawa aur jal ki taqat-hindi poem)

शहर की गंदगी ढोने वाले
नालों पर तरक्की की
इमारतें खड़ी हैं।

वर्षा ऋतु में उत्साहित जल
ढूंढता सड़क पर
अपनी सहचरिणी रेत
 जो पत्थरों में जड़ी है।

 कहें दीपक बापू हवा और जल
हमेशा चहलकदमी नहीं करते
अपने पथों का कर भी नहीं भरते
विकास के बांध खेलने के लिये
उनके सामने
बन जाते खिलौना
इंसान के कायदों से
प्रकृत्ति की हस्ती बड़ी है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Sunday, June 21, 2015

काली दौलत के कद्रदान-हिन्दी कविता(kali daulat ke kadradan-hindi poem)


चौराहे पर दिखाते
दबंग का किरदार
घर के बाहर उनके
दरबान खड़ा है।

भलाई के नारे से
जुटा ले आम इंसानों की भीड़
सौदागरों के लिये
वही मेहरबान बड़ा है।

कहें दीपक बापू भरोसे पर
दुनियां चलती है,
गद्दारी भी साथ ही पलती है,
स्वच्छ छवि बनाते सभी
दिलसे काली दौलत का
हर कोई कद्रदान बड़ा है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Sunday, June 14, 2015

नकली सन्यासियों के हिमालय-हिन्दी व्यंग्य कविता(naqali sanyasiyon ki himalay-hindi vyangya kavita)

ईमानदार हो या नहीं
ज़माने को बहलाने के लिये
दिखना जरूरी है।


किसी के जिस्म पर रहम करें
मगर दौलत और शोहरत के लिये
इंसानों के जज़्बातों से
खेलना जरूरी है।

कहें दीपक बापू सबसे ऊंचा हिमालय
त्यागियों का ही आश्रयदाता है
जज़्बातों के सौदागरों की छवि
सन्यासी जैसी दिखाने के लिये
नकली हिमालय बनाना जरूरी है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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