कह गये कबीरदास सूत न कपास, जुलाओं में लट्ठम लट्ठा।
‘दीपकबापू’ खायें नकली दूध दही, लड़कर फैला रहे मट्ठा।।
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दिल बहलाने का बड़ा व्यापार, चमकदार चेहरे ठगें बनकर यार।
‘दीपकबापू’ काबलियत देखें नहीं, अदाओं पर ही फिदा मूर्ख हजार।।
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होठों पर व्यवसायिक हंसी लाते, शब्दों से पाप का दंड चतुर बचाते।
‘दीपकबापू’ इधर उधर की बात करें, सच से हारे झूठे दाव लगाते।।
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.वातावरण में रहें दोनों प्राण अप्राण, बहने में ही वायु की होती शान।
‘दीपकबापू’ चक्षुदृष्टि चमकदार रखें, वरना अंधेरे में भी कुंआ जान।।
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अच्छी कभी खबर नहीं होती, खुशी की कोई कीमत नहीं होती।
‘दीपकबापू’ दर्द की ही दवा लेते, तबाही पर सनसनी कहीं होती।।
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सिंहासन पर रहे संघर्ष जारी, कभी शेर बैठे कभी सियार की बारी।
‘दीपकबापू’ खड़े दृष्टा की तरह, राजमार्ग के रथ पर बदलती सवारी।।
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चाणक्य जैसे सब बनना चाहें, पकड़ लेते तख्त की राहें।
‘दीपकबापू बैरागी का भेष बनायें, भोग में लिप्त भरते आहें।।
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तन की सफाई कर ली, मन की गंदगी हटाना भूल गये।
‘दीपकबापू’ धन कमाया खूब, दिल का दर्द घटना भूल गये।।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
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5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका
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