खड़े हैं गरीब
खाली पेट लिये हुक्मत की रसोई के बाहर
जब भी मांगते हैं रोटी
तो जवाब देते हैं रसोईघर के रसोईये
‘अभी इंतजार करो
अभी तुम्हारी थाली में रोटी सजा रहे हैं,
उसमें समय लगेगा
क्योंकि रोटी के साथ
आज़ादी की खीर भी होगी,
खेल तमाशों का अचार भी होगा,
उससे भी पहले
विज्ञापन करना है ज़माने में,
समय लगेगा उसको पापड़ की तरह सज़ाने में,
तुम्हारी भूख मिटाने से पहले
हम अपने मालिकों की छबि
फरिश्तों की तरह बनाने के लिये
अपनी रसोई सजा रहे हैं।
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देश की भूख मिटाना
बन कर रह गया है सपना
मुश्किल यह है कि
रोटी बनाने के नये फैशन आ रहे हैं,
खर्च हो जाता है
नये बर्तन खरीदने में पैसा
पुरानों में रोटी परोसने से लगेगा
नये बज़ट हाल पुराने जैसा,
इधर ज़माने में
गरीब की थाली सजने से पहले ही
नये व्यंजन फैशन में आ रहे हैं,
काम में नयापन जरूरी है
फिर देश की तरक्की देश में अकेले नहीं दिखाना,
ताकतवर देशों में भी नाम है लिखाना,
समय नहीं मिलता
इधर गरीबों और भूखों की पहचान भी बदली है
उनके नये चेहरे फैशन में आ रहे हैं।
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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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1 day ago
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