Thursday, July 17, 2014

जागी शख्सियत तलाश-हिन्दी कविता(jagi shakhsiyat ki talash-hindi poem;s)




मधुर कर्णप्रिय शब्द बोले
ऐसे मुख की तलाश जारी है
पर कोई बोलता नहीं है,

किसी से अपनी बात
खुलकर कह सकें
ऐसे कान की तलाश जारी है
पर कोई खोलता नहीं है,

कोई हमारे जज़्बात को समझे
ऐसे दिल की तलाश जारी है
पर शब्दों कोई तोलता नहीं है,

कहें दीपक बापू जिंदा इंसानों में
जागी शख्सियत की तलाश जारी है
मगर कोई डोलता नहीं है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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Monday, July 7, 2014

तरक्की के आसमान का पैमाना-हिन्दी व्यंग्य कवितायें(tarakki ke asman ka paimana-hindi satire poem's)



तरक्की का आसमान हमें वह दिखाते हैं,
गरीबी की बात करो तो मजबूरी में जीना सिखाते हैं।
कागज पर लिख रखे हैं उन्होंने तरक्की के पैमाने,
अपनी असलियत की बात करो तो बनते अनजाने,
रंगे हुए लोहे के सामान को जमा कर लिया है,
सब उधार का है  दिखाते जैसे कमा कर लिया है,
कहें दीपक बापू औकात की बात करो तो सीना तानते
पैसे का सवाल हो तो गरीबों की सूची में भी नाम लिखाते हैं।
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पता नहीं लोग कहां हुई तरक्की पर चर्चा करते हैं,
हम आज  भी हर जगह पेन से कागज पर पर्चा भरते है।
कहें दीपक बापू कागजी शेरों का हाथ में दी व्यवस्था
तरक्की बंद कर देते हैं वह अल्मारी मे
मजबूर को बेबस बनाकर जो अपना दिल भरते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Wednesday, June 18, 2014

सामान और रिश्ता-हिन्दी व्यंग्य कविता(saman aur rishta-hindi vyangya kavita)



हर सामान महंगा और हर रिश्ता हो रहा है सस्ता,
दिल से जज़बात हो रहे लापला भर रहा सभी का दौलत से बस्ता।
कहें दीपक बापू बरसों से बिगड़ते समाज को कोसते सुना है
हालात यही रहे रहे तो ज़माना हो जायेगा पूरी तरह खस्ता।
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यूं तो आम इंसान हर रिश्ते को हलाल करता है,
जज़्बाती कहलाता मूर्ख जो  हर धोखे  पर मलाल करता है।
कहें दीपक बापू कोई होते जो दिल से चाहते हैं
वरना तो जख्मों का बाज़ार में सौदा भी दलाल करता है।
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सच नहीं रहा अब  यह कि इश्क अंधा होता है,
पर्दे की  कहानियों में विज्ञापन का यूं ही नहीं धंधा होता है।
कहें दीपक बापू सौंदर्य प्रसाधन से सजे चेहरों के आशिक बहुत
नीयत जिसकी पवित्र हो ऐसा कोई कोई ही बंदा होता है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Sunday, June 8, 2014

गर्मी में वर्षा लाने के लिये लिखने का टोटका-हिन्दी लेख(garmi mien varsha lane kie liye likhane ka totka-hindi article)



         देश में गर्मी पड़ना कोई नयी बात नहीं है।  सब जानते हैं कि जून का माह सबसे ज्यादा गर्म रहता है।  हिन्दू संवत् के अनुसार यह जेठ का महीना होता है जिसकी पहचान ही आग बरसाती गर्मी से होती है। जिन लोगों ने नियमित रूप से इस गर्मी का सामना किया है वह जानते हैं कि वर्षा ऋतु के आगमन का मार्ग यही जेठ का महीना तय करता है।  गर्मियों की बात करें तो नौतपा यानि नौ दिन तो भीषण गर्मी की वजह से ही पहचाने जाते हैं। हमारा बरसों से  यह अनुभव रहा है इन नौतपा में जमकर गर्म हवा चलती है।  धर की जिस वस्तु पर हाथ रखो वही गर्म मिलती है भले ही छाया में रखी हो।  इतना ही नहीं रात में भी गर्म हवा चलती है।  यह सब झेलते हैं यह सोचकर कि नौ दिन की ही तो बात है यह अलग बात है कि आजकल नौतपा इतने नहीं तपते जितने बाद के दिन तपाते हैं।  नौतपा समाप्त होते ही बरसात का इंतजार प्रारंभ हो जाता है। इस बार बरसात विलंब से आयेगी यह मौसम विशेषज्ञों ने बता दिया है इसलिये हम इसके लिये तैयार हैं कि जब तक पहली बरसात होगी तब तक यह झेलना ही है।
           वैसे देखा जाये तो पूरे विश्व में गर्मी का प्रकोप बढ़ा है।  माना यह जा रहा है कि दुनियां के सभी देश जो गैसों का उत्सर्जन कर रहे हैं उससे ओजोन परत में बड़ा छेद हो गया है। ओजोद परत वह है जो सूरज की किरणों को परावर्तित कर धरती पर आने देती है। जिस तरह हम देश की अनेक कालोनियों में देखतेे हैं कि लोग अपनी छतो पर एक हरी चादर लगा देते हैं जिससे कि सूरज की किरणे उनके आंगन पर सीधे न पड़ें और ठंडक रहे। यही काम धरती के लिये ओजोन परत करती है।  इसके जिस हिस्से मे छेद हो गया है वहां से सूरज की किरणें सीधे धरती पर आती हैं और यही विश्व में पर्यावरण प्रदूषण का कारण है।  विश्व के जिन हिस्सों में हमेशा बर्फ जमी रहती थी वहां इस गर्मी का प्रभाव होने से वह पिघल रही हैं। जिससे बरसात भी अधिक होती है।  यही कारण है कि आज जहां हम आग बरसते देख रहे हैं वहीं कुछ दिन में बाढ़ की स्थिति भी नजर आ सकती है।
        विशेषज्ञ पर्यावरण असंतुलन की जो बात करते हैं वह इसी ओजोन परत में बढ़ते छेद के कारण है।  हमने लू को झेला है। पहले सड़क पर चलते हुए ऐसा लगता था जैसे कि आग की भट्टी के थोड़ा दूर से निकल रहे हैं पर तो ऐसा लगता है जैसे उसके एकदम पास से चल रहे हैं।  एक समय यह तपिश असहनीय पीड़ा में बदल जाती है। अगर शरीर में पानी या खाना कम हो तो यकीनन आदमी बीमार हो जाये। संकट दूसरा भी है कि पहले की तरह निरंतर गर्मी से लड़ने की आदत भी नहीं रही।  दिन में कूलर या वातानुकूलन यंत्र की शरण लेनी ही पड़ती है या मिल ही जाती है।  हमने अपने पूरे शैक्षणिक जीवन में कूलर नहीं देखा था।  तपते कमरे में हमने पढ़ाई की है।  पूरे महीने भर तक इस गर्मी को झेलने की आदत रही है पर अब उकताहट होने लगती है। कभी कूलर या वातानुकूलन यंत्र की सीमा से बाहर आये तो पता लगा कि गर्मी ने पकड़ लिया या कभी गर्मी से इनकी सीमा में गये तो जुकाम का शिकार हो गये। इस समय बिजली की खपत बढ़ जाती है पर उत्पादन या आपूर्ति उस अनुपात में न बढ़ने से कटौती शुरु हो जाती है। यही कारण है कि बड़े शहर आमतौर से संकट का सामना करते हैं।  गांवों में लोग अपनी पुरानी आदत के चलते कम परेशान होते हैं पर शहर का आदमी तो बिजली के अभाव में कुछ ही घंटों में टूटने लगता है।
         दूसरी बात यह कि छतो पर सोने की आदत लोगों को नहंी रही। देखा जाये तो गर्मी के दिन छत पर सोने के लिये ही हैं।  इस समय मच्छर भीषण गर्मी में काल कलवित हो जाते हैं इसलिये उनके परेशान करने की संभावना नहीं रहती।  जिन लोगों पर छत की सुविधा है वह बिजली न होने पर सो सकते हैं पर जिनको नहीं है उनके लिये तो मुश्किल ही होती है।
      हम अंतर्जाल पर सात वर्षों से लिख रहे हैं।  प्रथम दो वर्षों में हमने गर्मी पर कविता लिखी तो उसी दिन वर्षा हो गयी।  मित्रों ने इस पर बधाई भी दी थी। पांच वर्षों से इस पर कभी सोचा नहीं पर इस बार की गर्मी से त्रस्त ही कर दिया है।  कल हमने गर्मी पर एक कविता लिखी तो आशा थी कि बरसात हो जायेगी-हालांकि विशेषज्ञों ने बता दिया है था कि तीन चार दिन आसार नहीं है। हमने आज यह लेख इस उम्मीद में लिखा है कि शायद बरसात हो जाये। कविता छोटी थी जबकि लेख बड़ा है इसलिये शायद इसका असर हो।  जब दुनियां टोटका कर सकती है तो हम तो स्वांत सुखाय लेखक हैं तो क्यों नहीं अपना स्वाभाविक टोटका आजमा सकते।


दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Tuesday, May 20, 2014

अच्छे दिन आने का मतलब-हिन्दी हास्य कविता(achche din aane ka matalab-hindi comedy poem's)



प्रबंधक ने महिला लिपिक से कहा
‘‘अपना मुरझाया चेहरा चमका लो
मुख्यालय ने तुम्हारा वेतन बढ़ा दिया है,
अब तो तुम करना जमकर खरीददारी
मैंने तुम्हारी वेतनवृद्धि को भी रजिस्टर में चढ़ा दिया है,
संभव है मेरा यहां से स्थानांतरण भी हो जाये
तय बात है तुम्हारे अच्छे दिन आने वाले हैं।’’
सुनकर खुश हो गयी लिपिक और चहकते हुए बोली-‘‘
आपके आदेशों का पालन करते हुए मैं तंग आ गयी,
पता नहीं चला चेहरे पर कब मुर्दानगी छा गयी,
वेतनवृद्धि पर जश्न मनाने की परवाह नहीं है
आपका स्थानांतरण होने की खबर थोड़ी अच्छी लगी
जब आयेगी तक मान लूंगी
मेरे अच्छे दिन आने वाले हैं।’’
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Monday, May 12, 2014

आशिकों का कातिल बन जाना-तीन हिन्दी क्षणिकायें(ashikon ka quatil ban jana-short hindi poem's)



आशिकों के कातिल बन जाने की खबर रोज आती है,
टीवी पर विज्ञापनों के बीच सनसनी छा जाती है।
कहें दीपक बापू दिल कांच की तरह टूट कर नहीं बिखरते
अब भड़ास अब गोली की तरह चलकर आग बरसाती है।
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आशिक नाकाम होने पर अब मायूस गीत नहीं गाते है,
कहीं गोली दागते कहीं जाकर चाकू चलाते हैं।
कहें दीपक बापू इश्कबाज हो गये इंकलाबी
नाकाम आशिक कलम छोड़कर  हथियार चलाते हैं।
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आशिकों ने प्रेमपत्र लिखने के लिये कलम उठाना छोड़ दिया है,
एक हाथ का मोबाइल दूसरे का चाकू से नाता जोड़ दिया है,
कहें दीपक बापू इश्क पर क्या कविता और कहानी लिखें,
टीवी पर चलती खबरों ने उसे सनसनी की तरफ मोड़ दिया है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Monday, May 5, 2014

बेबसी में इंसान गद्दार हो जाता है-हिन्दी कवितायें(bebasi mein insan gaddar ho jaata hai-hindi kavitaen)



जिंदगी में आते हैं ऐसे भी मौके

 जब दिल की बात कहना चाहते  पर कह नहीं पाते,

खामोशी में ताकत बहुत पर उसका साथ भी ज्यादा सह नहीं पाते।

कहें दीपक बापू हालत जब मुश्किल हों

होठों में बुदबुदा लेते हैं

जब सामने खड़ा दृश्य देखने की चाहत नहीं होती

चाहें तो आंखें भी बंद नहीं कर पाते।

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खूबसूरत रास्तों पर चलते हुए

तंग गलियों से भी सामना हो जाता है,

हमेशा सूघते हुए फूलों की खुशबू

नाक का सामना बदबू से भी हो जाता है।

कहें दीपक बापू इंसान हमेशा सहज नहीं होता 

अपना भरोसा नहीं निभाता

बेबसी में वह गद्दार भी हो जाता है।

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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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