Sunday, August 19, 2012

ज़माने के जज़्बात और हालात-हिन्दी कविता --------------------


वह चीखकर अपना दर्द
ज़माने को  सुना हैं,
भीड़ लगी उनके घर के दरवाजे पर
लोग तरह तरह के इलाज पर
एक दूसरे के कान में गुनागुना रहे हैं,
लगता नहीं उनका मसला  हल होगा।
चर्चा होगी पूरे शहर में
मगर घाव उनका वहीं होगा।
कहें दीपक बापू
अपना गम चौराहे पर सुनाने से
पहले सोचना होगा
लोगों के दिल में जज़्बात हैं भी कि नहीं
वरना खामोशी से अपनी हालातों को पीना होगा।
----------------------
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’
ग्वालियर मध्यप्रदेश

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

८.हिन्दी सरिता पत्रिका 


Friday, August 10, 2012

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर चिंत्तन करना भी आवश्यक-हिंदी लेख (shri krishna janmashtami par hindi lekh-chinttan karna bhee jaroori-hindi article)

    आज पूरे भारत में भगवान श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाई जा रही है।  आज के दिन धार्मिक रुचि वाले लोग मंदिरों में जाकर अपने इष्ट की पूजा अर्चना करते हैं।  कई जगह गोवर्धन मंदिर भी होते हैं जहां  अनेक श्रद्धालु परिक्रमा करते हैं।  भगवान श्रीकृष्ण का रूप ऐसा ही है कि उनकी चारों प्रकार के भक्त-आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी-आराधना करते हैं।  सामान्य जीवन व्यतीत करने वाला हो या योग साधक भगवान श्रीकृष्ण से प्रेरणा ग्रहण करता है।
             जहां सकाम धार्मिक भक्त मंदिरों में जाकर अपने हृदय की भावनाओं में प्रकाश की अनुभूति करते हैं वही योग साधक तथा गीता पाठक भगवान श्रीकृष्ण के महाभारतकाल में दिये गये संदेश पर चिंत्तन करने का लीन होने का प्रयास करते हैं।  सच बात तो यह है कि भगवान श्रीकृष्ण का योगेश्वर का रूप अत्यंत रहस्यमय रहा हैं।  यह अलग बात है कि अगर तत्वज्ञान का श्रद्धा के साथ अध्ययन किया जाये तो उसे सामान्य बुद्धि में सहजता के साथ उसकी अनुभूति की जा सकती है। श्रीमद्भागवत गीता में उनका संदेश इस संसार की अनमोल विरासत है।  उसमें ज्ञान और विज्ञान के ऐसे सू.त्र हैं जिनको समझा जाये तो संसार में सार्थक और निरर्थक विषयों का अंतर स्पष्ट रूप से सामने आ जाता है। अगर श्रद्धा के साथ उसका अध्ययन किया जाये तो राजनीति, अर्थ, काम, समाज तथा स्वास्थ्य से संबंधित उसमें जो ज्ञान है उसका विस्तार अपने बुद्धि से ही किया जा सकता।  फिर बड़े शास्त्र पढ़ने से कोई प्रयोजन नहीं रह जाता।
    वैसे तो भगवान श्रीकृष्ण के अनेक प्रसंग बताये जाते हैं पर महाभारत युद्ध के समय श्री अर्जुन को दिया गया उनका ज्ञान अत्यंत प्रसिद्ध है।  इससे यह पता चलता है कि उन्होंने अपने जीवन काल में केवल बाललीलाऐं या क्रीड़ायें ही नहीं की वरन् तत्वज्ञान की ऐसी स्थापना की जिसे आज भी प्रासांगिक माना जाता है।
    हैरानी तो भारतीय समाज को देखकर होती है।  आज के भौतिक जाल में फंसा भारतीय समाज भक्ति के संक्षिप्त मार्ग ढूंढने लगा है।  ज्ञान के लिये अध्ययन से अधिक श्रवण पर निर्भर हो गया है।  उससे अधिक बुरी बात तो यह है कि ज्ञान संदेश नारों की तरह दिया जाता है। मोह मत पालो, लोभ मत करो, काम और क्रोध से बचो आदि आदि।  इनसे कैसे बचें? इसका कोई मार्ग नहीं बताता।  सब मानते हैं कि योगासन, ध्यान, प्राणायाम तथा संयम जीवन में श्रेष्ठ मार्ग की तरफ ले जाते हैं मगर जीवन में उस पर चलते हैं कितने लोग हैं? उंगलियों पर गिनती करने लायक संख्या उन ज्ञानियों की होती है और उन्हें समाज से प्रथक मानकर उपेक्षित कर दिया जाता है।  जीवन मे आनंद का अर्थ आध्यात्मिक शांति नहीं वरन् दूसरे को अपनी भौतिक उपलब्धि से प्रभावित करना मान लिया गया है।  जहां भौतिक साधनों की प्राप्ति का शोर होता है वहां पहुंचकर आदमी इस बात का प्रयास करता है कि उसकी आवाज सबसे अधिक बुलंद हो और न होने पर क्रोध के साथ निराशा का शिकार हो जाता है।  जहां आदमी को शंाति से बैठने की सुविधा मिलती है वहां यह सोचता है कि वह कैसे अपनी आवाज को दूसरे की अपेक्षा अधिक शोर करने वाली बनाये।  इसके विपरीत योग साधकों और गीता पाठकों के लिये सांसरिक विषय त्याज्य नहीं होते वरन् वह उनके साथ अपनी शर्तो पर जुड़ते हैं।  इसलिये सामान्य मनुष्यों की बजाय वह शांति और आनंद से जीते हैं।
             श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर समस्त ब्लॉग लेखक मित्रों तथा पाठकों को बधाई। यह दिन उनको सांसरिक विषयों में सफलता के साथ  आध्यामिक ज्ञान में रूचि प्रदान करें।   
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

८.हिन्दी सरिता पत्रिका 


Tuesday, March 13, 2012

शैतानीयत-हिन्दी कविता (shaitaniyat-hindi kavita)

भूखे इंसान से भला इस दुनियाँ में कौन डरता है,
सारे राह कत्ल तो हवस का गुलाम करता है।
रोटी की तलाश में हर आदमी हो जाता बेबस
खजाने भरने का मोह उसमें शैतानियत भरता है।
कहें दीपक बापू अन्न और जल की कमी नहीं है
इंसान दूसरे को तरसता देख दिल खुश करता है।
---------------------------------------
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

८.हिन्दी सरिता पत्रिका

Wednesday, February 29, 2012

अपने कदम आहिस्ता बढ़ाओ-हिन्दी कविता (apne kadam aahista badhao-hindi kavita)

ज़िंदगी के रास्ते पर चलना
इतना आसान नहीं
जितना लोग समझ लेते हैं,
यही वजह है कमजोर दिल वाले
थोड़ी मुश्किल में ही
अपनी दम खुद ही तोड़ देते हैं।
कहें दीपक बापू
आहिस्ता आहिस्ता कदम बढ़ाओ
कछुए के तरह
खरगोश की तरह उछलते
रहना अच्छा लगता है
मगर जिन कदमों से
चलना है दूर तक
उनको ही गम देते हैं। 
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

८.हिन्दी सरिता पत्रिका

ज़िंदगी का मज़ा -हिन्दी कविता (zindagi ka maza-hindi kavita or poem)

शराब की दुर्गंध में भी
दिल बहलाने की कोशिश
गुलाब की सुगंध से
साँसों को सहलाने की ख्वाहिश
इंसानी दिमाग बस यूं ही नचाता है।
कहें दीपक बापू
जब तक जज़्बातों को
दिल तक उतारने की कूब्बत नहीं है
ज़िंदगी का मज़ा जुबान से फिसलकर
बाहर ही फैल जाता है।
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

८.हिन्दी सरिता पत्रिका

Sunday, February 19, 2012

मुफ्त का खेल-हिन्दी हास्य कविता (mufta ka khel,game for free-hindi hasya kavita,hindi comedy poem)

उस्ताद ने शागिर्द से कहा
" इस साल के सालाना जलसे के
अपने प्रचार पत्र में तुमने
यह घोषणा कैसे डाल दी है।
हम गरीब बच्चों को
मुफ्त कापियां पेन और किताबें
मुफ्त बांटेंगे,
कभी सोचा है कि
हम चंदे का इस्तेमाल अगर
ऐसा करेंगे तो
क्या खुद पूरा साल धूल चाटेंगे,
विरोधियों को हंसने वाली
यह बैठे बिठाये कैसी चाल दी है."
सुनकर शागिर्द बोला
"आपके साथ काम करने में
यही परेशानी है,
मेरी चालों से कमाते
पर फिर भी शक जताते
यह देखकर होती हैरानी है,
लोगों के भले का हम दंभ भरते,
छोड़ भलाई सारे काम करते,
पढ़ने वाले गरीब बच्चे
भला हमारे पास कब आयेंगे,
सामान खत्म हो गया
अगर आया कोई भूले भटके तो
उसे बताएँगे,
देश में जितने बढ़े है गरीब,
समाज सेवकों के चढ़े हैं नसीब,
लोगों की इतनी नहीं बढ़ी समस्याएँ,
जितनी उनके लिए बनी हैं समाज सेवी संस्थाएं,
ऐसे में यह मुफ्त मुफ्त का खेल
अब जरूरी है,
सस्ते में दवाएं बांटने का कम हो गया पुराना
इसलिए नया दाव लगाना एक मजबूरी है,
विरोधियों के सारे विकेट उड़ा दे
मैंने यह ऐसी बाल की है।"
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

८.हिन्दी सरिता पत्रिका

Thursday, January 26, 2012

राजतंत्र में धनतंत्र का जोड़ लगता है जनतंत्र-हिन्दी लेख (rajtantra, dhantantra +jantantra-hindi lekh or article on 26 jawary 26 january republic day of india)

        विश्व में आधुनिक लोकतांत्रिक प्रणाली ब्रिटेन की देन है। भारत ने राजनीतिक रूप से जरूर ब्रिटेेन से स्वतंत्रतता पायी पर मानसिक रूप से कभी यहां राजकीय कर्म में प्रबंध कौशल या व्यवसायिक कला का दर्शन नहीं हुआ। एक बात याद रखने की है कि वर्तमान चुनाव प्रणाली अंग्रेजों के समय में ही विकसित हो गयी थी। यही प्रणाली भारत मे आजादी के बाद भी चली। कहने को हमारे पास अपना संविधान है पर विशेषज्ञ यह बताना नहीं भूलते कि आज भी कानूनों का अधिकतर हिस्सा अंग्रेजों का ही बना हुआ है। कहने का अभिप्राय यह है कि हम आज भी वैचारिक रूप से औपनिवेश राज्य के स्वामी हैं।
         हम यहां चुनाव प्रणाली के बारे में विचार नहीं कर रहे बल्कि हम उस जनतंत्र के स्वरूप का आंकलन कर रहे हैं जिसे अंग्रेजों ने बनाया है। जब तक प्रचार माध्यम विकसित नहीं थे हम अमेरिका और ब्रिटेन की जनतांत्रिक व्यवस्था पर मंत्रमुग्ध थे पर अब यह लगने लगा कि यह सब भ्रम था। ब्रिटेन के बारे मेें कहा जाता है कि वहां के लोग अपनी पुरानी परंपराओं के पोषक हैं। इसके दो प्रमाण हैं एक तो यह कि उन्होंने जनतंत्र का अपनाया पर राजतंत्र को छोड़ा नहीं। दूसरा यह कि अपने क्रिकेट खेल को आज भी वह प्राकृतिक पिच पर ही खेलते हैं वहां उन्होंने कृत्रिम घास या टर्फ को कभी स्वीकार नहीं किया। इतना ही लंबे समय तक तो वह दिन में ही क्रिकेट खेल जारी रखा पर रात्रिकालीन दूधिया रौशनी का चमकने नहीं दिया। इधर हम हैं कि अपनी सारी पंरपराओं को दकियानूसी मानकर छोड़ते जा रहे हैं।
            बात अगर ब्रिटेन के जनतंत्र की है तो हमें लगता है कि राजतंत्र को उन्होंने भले ही नाममात्र का रहने दिया पर धनतंत्र को राज्य कर्म से ऐसा जोड़ दिया कि किसी को आभास तक नहीं होता कि वहां का जनतंत्र वास्तव में एक ऐसी प्रणाली है जिसमें धनपतियों को राजा जैसा सम्मान मिलता है। उन्होंने भी अपने यहां सर नाम की एक उपाधि चला रखी है जिसे कुछ पूंजीपति प्राप्त कर चुके हैं। इनमें एक भारतीय भी शामिल है। ब्रिटेन तथा अमेरिका के साथ भारत के लोकतंत्र में बस एक ही अंतर है कि वहां धनपति प्रत्यक्ष रूप से राजनेताओं को प्रायोजित करते हैं। अभी अमेरिका के राष्ट्रपति ने चंदा मांगने के लिये गाना भी गाया था। भारत में यह कार्य अप्रत्यक्ष रूप से होता दिखता है।
            मूल रूप से ब्रिटेन को पूंजीवादी देश माना जाता है। इसके बावजूद वहां श्रमिक क्षेत्रों से अंसतोष की घटनायें सामने आती हैं। अमेरिका तथा ब्रिटेन में लंबे समय तक वामपंथ का भूत दिखाकर वहां की जनता को डराया गया पर इसके बावजूद वहां वामपंथी विचाराधारा के पोषक तत्व पैदा हुए हैं। यहां तक कि मजदूरों का मसीहा कार्ल मार्क्स तो ब्रिटेन में रहा था। आधुनिक विश्व में ब्रिटेन ने राजतंत्र के साथ धनतंत्र को इस तरह जोड़ा कि वह जनतंत्र हो गया है। पुराने समय धनपति भले ही धन खूब कमाते थे पर उनकी प्रतिष्ठा कभी राजा जैसी नहीं हो पाती थी। ऐसा लगता है कि ब्रिटेन के पूंजीपतियों ने राजतंत्र को कमजोर कर अपने धनतंत्र की आड़ में जनतंत्र के सहारे राज्य पर अपनी पकड़ बनायी। चुनाव चाहे जहां भी हों पैसे के बिना नहीं जीते जा सकते। यह पैसा अंततः धनपतियों के पास से ही आना है। चुनाव लड़ने वालों को धनपति अपने धन से राजा बनाते हैं जो अंततः उनके मातहत होते हैं। इस तरह ब्रिटेन में जनतंत्र प्रणाली के माध्यम से धनतंत्र ने राजतंत्र में अपना हिस्सा प्राप्त किया। जिस वैश्विक आर्थिक उदारीकरण की बात हम करते हैं वह इसी धनतंत्र की देन है। हम हम कहते हैं कि आर्थिक ताकत के कारण भारत की कोई देश उपेक्षा नहीं कर सकता तो इसका कारण यह है कि विश्व अर्थव्यवस्था में कहीं न कहीं भारतीय धनपतियों का प्रभाव इस तरह है कि उसे ब्रिटेन या अमेरिका के राजस पुरुष अनदेखा कर नहीं चल सकते। यह अलग बात है कि हमारे देश के बुद्धिमान लोग इस पर देश का सम्मान बढ़ता बताकर उछलकूदते हैं पर हम जैसे आम लेखक जानते हैं कि यह सब एक छलावा है।
          प्रगतिशील तथा जनवादी लेखक अमेरिका और ब्रिटेन का विरोध इस आधार पर करते हैं कि वह पूंजीवादी और साम्राज्यवादी हैं पर वर्तमान समय में जिस तरह धनतंत्र काम कर रहा है उसे वह नहीं समझ पाते। हम तो यह कहते हैं कि अमेरिका और ब्रिटेन भी अब एक स्वतंत्र राजकीय व्यवस्था में नहीं चल रहे बल्कि वह धनतंत्र का उपनिवेश भर रह गये हैं। न हमारे पास आंकड़े हैं न हम वहां कभी गये हैं। समाचार पत्र और टीवी चैनलों पर समाचारों को देखकर उनकी कड़ियां जोड़कर विश्लेषण करते हैं तो पाते हैं कि अनेक शक्तिशाली देशों के राजस पुरुष कहीं न कहीं धनपतियों के मुखौटे भर हैं। वह बोलते हैं तो किसी का लिखा लगता है। वह जब चलते हैं तो लगता है कि निर्देशक ने बताया है। उनकी दिनचर्यायें ही अभिनय का हिस्सा लगती हैं। कई शक्तिशाली देशों के शासनाध्यक्ष तो ऐसी हरकतें करते हैं कि कामेडी के महानायक भी शरमा जायें।
         भारत में चुनाव सुधारों की मांग उठने लगी हैं। इसका मतलब यह है कि कुछ लोग इस जनतंत्र में छिद्र देख रहे हैं। यह जनतंत्र ब्रिटेन से ही लिया गया है। छिद्र तो वहां भी होंगे। हमें यहां बैठकर नहीं दिखता। जो वहां देखते हैं उनको विश्लेषण नहीं करना आता। हमारी बात से अनेक लोग असहमत हो सकते हैं क्योंकि हमने कभी विदेशी दौरा नहीं किया मगर देश में घूमते घूमते यह अनुभव किया है कि जब यहां की व्यवस्था वहां के सिद्धांतों पर आधारित है तो वह उन समस्याओं से कैसे बच सकते हैं जिनसे हम दो चार होते हैं। राजतंत्र और धनतंत्र के मिले रूप का नाम जनतंत्र है और एक आदमी के रूप में हमें यह अनुभव होता है कि यही हमारी नियति है कि राज्य हमारा आसरा है हम उसका सहारा हों या न हों। जिनको राजतंत्र का सहारा है वह शक्तिशाली लोग राजस बोध के साथ व्यवहार करेंगे। हमें तो अध्यात्मिक रूप से ज्ञान प्राप्त कर सात्विक रहने का प्रयास करना चाहिए। लोकतंत्र में लोकप्रियता का नकदीकरण करने के लिये तमाम तरह के प्रपंच किये जाते हैं और जिनको नकदीकरण नहीं करना वह जनमानस में अपनी उछलकूद नहीं दिखाते। जो कर रहे हैं उनको इसका अधिकार भी है। 
         गणतंत्र एक शब्द है जिसका आशय लिया जाये तो मनुष्यों के एक ऐसे समूह का दृश्य सामने आता है जो उनको नियमबद्ध होकर चलने के लिये प्रेरित करता है। न चलने पर वह उनको दंड देने का अधिकार भी वही रखता है। इसी गणतंत्र को लोकतंत्र भी कहा जाता है। आधुनिक लोकतंत्र में लोगों पर शासन उनके चुने हुए प्रतिनिधि ही करते हैं। पहले राजशाही प्रचलन में थी। उस समय राजा के व्यक्तिगत रूप से बेहतर होने या न होने का परिणाम और दुष्परिणाम जनता को भोगना पड़ता था। विश्व इतिहास में ऐसे अनेक राजा महाराज हुए जिन्होंने बेहतर होने की वजह से देवत्व का दर्जा पाया तो अनेक ऐसे भी हुए जिनकी तुलना राक्षसों से की जाती है। कुछ सामान्य राजा भी हुए। आधुनिक लोकतंत्र का जनक ब्रिटेन माना जाता है यह अलग बात है कि वहां प्रतीक रूप से राजशाही आज भी बरकरार है।
          मूल बात यह है कि हम गणतंत्र में मनुष्य समुदाय पर एक नियमबद्ध संस्था शासन के रूप में रखते हैं। विश्व के जीवों में एक मनुष्य ही ऐसा है जिसे राज्य व्यवस्था की आवश्यकता है। इसकी वजह साफ है कि सबसे अधिक बुद्धिमान होने के कारण उसके ही अनियंत्रित होने की संभावना भी अधिक रहती है। माना जाता है कि राज्य ही मनुष्य का नियंता है जिसके बिना वह पशु की तरह व्यवहार कर सकता है। राज्य करना मनुष्य की प्रवृत्ति भी है। उसमें अहंकार का भाव विद्यमान रहता है। सभी मनुष्य एक दूसरे से श्रेष्ठ दिखना चाहते हैं और राज्य व्यवस्था के प्रमुख होने पर उनको यह सुखद अनुभूति स्वतः प्राप्त होती है। जिन लोगों को प्रमुख पद नहीं मिलता वह छोटे पद पर बैठकर बाकी छोटे लोगों को अपने दंड से शासित करते है। इस तरह यह क्रम नीचे तक चला आता है। वहां तक जहां से आम इंसान की पंक्ति प्रारंभ होती है। इस पंक्ति के ऊपर बैठा हर शख्स अपने श्रेष्ठ होने की अनुभूति से प्रसन्न है पर साथ ही अपने से ऊपर बैठे आदमी की श्रेष्ठता पाने का सपना भी उसमें रहता है। इस तरह यह चक्र चलता है। जो राज्य व्यवस्था से नहीं जुड़े वह भी कहीं न कहीं अपनी श्रेष्ठता दिखाने के व्यसन में लिप्त हैं।
          राज्य कर्म अंततः राजस भाव की उपज है। उसमें सात्विकता बस इतनी ही हो सकती है जितना आटे में नमक! इससे अधिक की अपेक्षा अज्ञान का प्रमाण है। राज्य कर्म में ईमानदारी एक शर्त है पर उसे न मानना भी एक कूटनीति है। प्रजा हित आवश्यक है पर अपनी सत्ता बने रहने की शर्त उसमें जोड़ना आवश्यक है। अकुशल राज्य प्रबंधकों के के लिये ईमानदारी और प्रजा हित अंततः गौण हो जाते हैं। राज्य कर्म में एक सीमा तक ही सत्य भाषण, धर्म के प्रति निष्ठा और दयाभाव दिखाया जा सकता है। छल, कपट, प्रपंच तथा क्रूर प्रदर्शन राज्य कर्म करने वालों की शक्ति का प्रमाण बनता है। वह ऐसा न करें तो उनको सम्मान नहीं मिल सकता। न्याय के सिद्धांत सुविधानुसार चाहे जब बदले जा सकते हैं।
         सभी राजस कर्म करने वाले असात्विक हैं यह मानना ठीक नहीं है पर इतना तय है कि उनमें एक बहुत वर्ग ऐसे लोगों का रहता है जो अपने लाभ के लिये इसमें लिप्त होते हैं जिसे राजस भाव माना जाता है। आज के समय में तो राजनीति एक व्यवसाय बन गया है। यह अलग बात है कि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान से परे बुद्धिमान लोग उसमें सत्य, अहिंसा तथा दया के भाव ढूंढना चाहते है।
           विश्व में अधिकतर लोग चाहते हैं कि उन्हें राजसुख न मिल पाये तो उनकी संतान को प्राप्त हो। राजसुख क्या है? यह सभी जानते हैं। दूसरे पर हमारा नियम चले पर हम पर कोई नियम बंधन न हो! लोग हमारी माने पर हम किसी की न सुने। किसी में हमारी आलोचना की हिम्मत न हो। बस हमारी पूजा भगवान की तरह हो। इसी भाव ने राज्य व्यवस्था को महत्वपूर्ण बना दिया है।
           राज्य संकट पड़ने पर प्रजा की मदद करता है। गणतंत्र का मूल सिद्धांत है पर यह एक तरह का भ्रम भी है। प्रजा कोई इकाई नहीं बल्कि कई मनुष्य इकाईयेां का समूह है। मनुष्य अपने कर्म के अनुसार फल भोगता है। वह इंद्रियों से जैसे दृश्य चक्षुओं से, सुर कर्णों से, भोजन मुख से तथा सुगंध नासिका से ग्रहण करने के साथ ही अपने हाथ से जिन वस्तुओं का स्पर्श करता है वैसी ही अभिव्यक्ति उसकी इन्हीं इद्रियों से प्रकट होती है। विषैले विषयों से संपर्क करने वालों से अमृतमय व्यवहार की अपेक्षा केवल अपने दिल को दिलासा देने के लिये ही है। मनुष्य को अपना जीवन संघर्ष अकेले ही करना है। ऐसे में वह अपने साथ गणसमूह और उसके तंत्र के साथ होने का भ्रम पाल सकता है पर वास्तव में ऐसा होता नहीं है।
       उससे बड़ा भ्रम तो यह है कि गणतंत्र हम चला रहे हैं। धन, पद और अर्थ के शिखर पुरुषों का समूह गणतंत्र को अपने अनुसार प्रभावितकरते हैं जबकि आम इंसान केवल शासित है। वह इस गणतंत्र का प्रयोक्ता है न कि स्वामी। स्वामित्व का भ्रम है जिसमें जिंदा रहना भी आवश्यक है। अगर आदमी को अकेले होने के सत्य का अहसास हो तो वह कभी इस भ्रामक गणतंत्र की संगत न करे। जिनको पता है वह सात्विक भाव से रहते हैं क्योंकि जानते हैं कि सहनशीलता, सरलता और कर्तव्यनिष्ठ से ही वह अपना जीवन संवार सकते हैं। जिनको नहीं है वह आक्रामक ढंग से अभिव्यक्त होते है। वह अनावश्यक रूप से बहसें करते है। वाद विवाद करते हैं। निरर्थक संवादों से गणतंत्र को स्वयं से संचालित होने का यह भ्रम हम अनेक लोगों में देख सकते है।
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior

writer aur editor-Deepak 'Bharatdeep' Gwalior


कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

८.हिन्दी सरिता पत्रिका

इस लेखक के समस्त ब्लॉग यहाँ एक जगह प्रस्तुत हैं

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर

दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका

दीपक भारतदीप का चिंतन