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Thursday, April 8, 2010

विवाह और विरह का ड्रामा-हिन्दी व्यंग्य-हिन्दी व्यंग्य (vivah aur virah ka drama-hindi vyangya)

हम यह बात तो पहले ही लिख देते कि ‘पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ी तथा भारत की महिला टेनिस खिलाड़िन की यह शादी पंदह को होकर रहेगी’ तो यकीनन अंतर्जाल पर पढ़ने वाले पाठक लोहा मान जाते। ऐसा नहीं हो सका क्योंकि डार्विन के विकासवाद को लिखे एक लेख-जिसमें व्यंग्य और चिंतन दोनों प्रकार का भाव शामिल था-पर मित्र ब्लाग लेखकों ने अपनी टिप्पणियों से हड़का नहीं दिया जिससे यह सोचकर रुकना पड़ा कि एक दिन में एक साथ दो मूर्खतापूर्ण लेख प्रस्तुत नहीं करना चाहिये। दरअसल कुछ दिन पहले उन्मुक्त जी ने एक लेख में डार्विन के विकासवाद सिद्धांत को पतंजलि योग के संदर्भ में देखने का आग्रह हमसे सार्वजनिक रूप से पाठ लिखकर किया था। विकासवाद पर हमारी स्मृतियों में पहले से ही कुछ था पर विज्ञान के विषय में कोरे होने कारण वैसे भी कभी कुछ नहीं लिखते। उस दिन लिखा। एक विद्वान वकील ब्लाग लेखक मित्र ने कड़ी टिप्पणी की कि‘आप इस विषय पर कुछ नहीं जानते। आपने निराश किया।
टिप्पणियां दूसरी भी आईं पर हमारे मन में यह शक हो गया कि हम लिखने में कोई गलती कर गये हैं। संयोगवश दूसरे ब्लाग पर उन्मुक्त जी की टिप्पणी भी आयी पर उसमें उन्होंने कहीं हमारे विकासवाद के सिद्धांतों की जो स्मृतियां हैं उन पर आपत्ति नहीं की। इधर पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाड़ी तथा भारत की एक टेनिस महिला खिलाड़ी-जिसे विश्व में नबेवीं वरीयता प्राप्त है-की शादी का नाटक सामने आ गया। इसी पाकिस्तानी खिलाड़ी से भारत के उसी शहर की एक लड़की के साथ पहले ही हो चुकी शादी की चर्चा भी हो रही थी जहां वह महिला टेनिस खिलाड़ी रहती है। वह भारत की महिला खिलाड़िन से शादी करने के पूर्व तलाक चाहती थी। इस पर भारत के संगठित प्रचार माध्यमों-टीवी, रेडियो और समाचार पत्र पत्रिकाओं- ने ढेर सारे समाचार प्रकाशित किये। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि विज्ञापनों का व्यापार खूब हुआ। जब कोई खास खबर होती र्है-या प्रायोजित कर बनाई जाती है-तब हर मिनट में विज्ञापन आता है। विज्ञापनदाताओं के इससे कोई मतलब नहीं होता कि किस कार्यक्रम में उनके विज्ञापन दिखाये गये बल्कि उनके प्रबंधक तो यह देखते हैं कि उस समय कितने दर्शक उसे देख रहे होंगे। इस लेखक ने कई बार यह बात लिखी है कि ऐसा लगता है कि आर्थिक तथा मनोरंजन क्षेत्र के विशेषज्ञ बकायदा योजना पूर्वक खबरें तैयार करवाते हैं या फिर कोई उनके लिये कोई स्वयंसेवी संगठन है तो निरंतर इसके लिये लगा रहता है जिसे इनसे रकम प्राप्त होती है।
यह शादी होकर रहेगी-यह बात हम उसी दिन लिखते अगर एक दिन पहले वर्डप्रेस पर प्रकाशित पाठ को अगले दिन ब्लागस्पाट पर बेफिक्री से नहीं  प्रकाशित करते। वह ब्लाग अनेक अन्य लेखक मित्रों के बीच में जाता है। ऐसे में चुनौती देती टिप्पणी-वह भी एक जानकारी ब्लाग लेखक से मिले-दिमागी रूप से हिला देती है। हमने डार्विन के विकासवाद पर अपने ही एक अन्य गुरु मित्र श्री एल.एम त्रिवेदी जी-जो अब ब्लाग पर अब कवितायें भी लिखते हैं-की शरण ली। उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि हमारी सोच ठीक है और विकासवाद का सिद्धांत वही है जैसा कि हम सोच रहे थे। उन्होंने कहा कि तुम तो उस ब्लाग का लिंक मेरे ब्लाग पर दे जाओ या ईमेल पर भेजो मैं पढ़कर उस टिप्पणी दूंगा।
इधर हमारे दिमाग में यह शादी का चक्कर भी फंसा हुआ था। फिर कुछ लिखने का समय नहीं मिला क्योंकि एक आम लेखक के लिये ढेर सारे अन्य संकट भी हुआ करते हैं। टीवी तो अब देखना बंद सा हो गया। कहते हैं कि एक झूठ सौ बार बोला जाये तो अपने को भी सच लगने लगता है। यही हाल हमारा है। अधिकतर खबरें और बयान समय पास करने के लिये प्रायोजित करने के लिये प्रस्तुत किये जाते हैं यह बात लिखते और कहते हुए हमारे दिमाग में इस तरह घर कर गयी है कि कहना ही क्या? हर खबर या बयान के पीछे हमें बस प्रायोजन ही नज़र आता है।
जिस पाकिस्तानी क्रिकेटर की शादी और तलाक का यह ड्रामा हुआ उस पर उसी के देश के पुराने तेज गेंदबाज ने फिक्सर होने का आरोप लगाया बल्कि यहां तक भी कह डाला कि वह अब टेनिस में फिक्सिंग का धंधा शुरु करने वाला है। कथित दूल्हा पाकिस्तानी क्रिकेट के चरित्र पर क्या लिखें? जिस समय यह पंक्तियां लिखी जा रही हैं उस पर अनुशासनहीनता के आरोप में एक साल का प्रतिबंध लगा हुआ है। यानि वह अपने ही देश में खलनायक है। पंद्रह अप्रैल को उसकी शादी के अवसर पर तोहफे के रूप में इस प्रतिबंध से मुक्ति देने के प्रस्ताव पर भी चल रहा है।
पुरानी शादी को लेकर चल रहे विवाद में पहली पत्नी का प्रचार आक्रमण-जी हां, यह शब्द व्यापक अर्थ में लें-का सामना कर रहे उस पाकिस्तानी क्रिकेटर और अपने होने वाले पति की बचाव में उतरी महिला टेनिस खिलाडी ने बचाव करते हुए कहा कि ‘वह लोग (पहली बीबी और उसके माता पिता) कैसे सामने आयेंगे यह बताने कि उन्होंने एक इंसान(पाकिस्तानी क्रिकेटर) को बेवकूफ बनाया है?
हम पाकिस्तानी क्रिकेट की पहली और संभावित पत्नी पर कुछ नहीं लिखेंगे। क्योंकि हमारा मानना है कि छोटी उमर की लडकियां इतनी चालाक नहीं होती कि वह कोई स्वयं दांव पैंच खेंलें पर उनको बरगला कर शातिर लोग अपने पक्ष में कर ही लेते हैं। इस शादी तलाक नाटक में हमें नहीं  लगता कि लड़कियों की कोई सीधी भूमिका इस नाटकबाजी में होगी पर उनका इस्तेमाल किया गया है यह बात तय लगती है।
शक के कई कारण है। इस शादी नाटक पर ढेर सारा सट्टा लगा-यह बात संगठित प्रचार माध्यम स्वयं कह रहे हैं। इस नाटक के केंद्र बिन्दु में पाकिस्तान और मध्य एशियाई देशों का नाम अनेक बार आया और तीनों पात्र कहीं न कहीं उनसे जुड़े हुए थे। फिर क्रिकेट और टेनिस जैसे वह खेल जुड़े हुए हैं जिन पर बाजार तथा प्रचार माध्यमों का प्रत्यक्ष नियंत्रण है-संगठित प्रचार माध्यम कई बार यह बता चुके हैं कि इन पर सट्टा चलता है।
टीवी चैनलों और अखबारों की सुर्खियों में इस शादी तलाक नाटक को लाया गया दर्शकों और  पाठकों  के मनोरंजन के लिये-जिसमें व्यतीत समय पर करोड़ों रुपयों की आय होती है। पाकिस्तान के जिस पुराने तेज गेंदबाज ने अपने ही पाकिस्तानी दूल्हा क्रिकेटर पर यह भी आरोप लगाया कि उसने नया प्यार पाने के लिये 18 लाख डालर खर्च किये। इधर यह भी समाचार है कि भारत की महिला खिलाड़ी उस पाकिस्तानी से शादी कर दुबई में बसना चाहती है। फिर ऐसा दूल्हा जिस पर उसके ही देश के खिलाड़ी फिक्सिंग का आरोप लगा रहे हों तब लगता है कि उसने इस नाटक में वारे न्यारे किये होंगे। एक बात याद रखने वाली बात है कि भारत के बाहर अन्य देशों के खिलाड़ियों को इतने विज्ञापन नहीं मिलते इसलिये उनके पास अमीर होने के ऐसे ही नुस्खे हैं। क्रिकेट खिलाड़ी ने स्वयं यह नाटक न रचा हो पर उसके पीछे स्थित किसी प्रबंधकीय समूह ने यह सब रचा हो। वैसे भी वह मुखौटा ही लग रहा था।

इस नाटक मंडली के भारत से जुड़े सदस्यों ने मध्य एशिया के अमीरों को धर्म आधार विषय बनाकर खुश कर दिया होगा। मध्य एशिया के शिखर पुरुषों की यह खूबी है कि वह केवल पैसे से  नहीं  बल्कि अपने मजहब का प्रचार देखकर भी उछलते हैं। पांच छह दिन भारतीय टीवी चैनलों पर एक मजहब के ठेकेदार ही आते रहे। अन्य मजहब के लोगों को तो मानो यह बताया जा रहा था कि जैसे यह आपका कोई विषय नहीं है और न लेना देना। आपकी औकात तो दर्शक की है जिसे चाहे नाटक दिखायें चाहें विज्ञापन। इसलिये अपने दिमाग के दरवाजे बंद कर हमारा यह धार्मिक और आर्थिक कार्यक्रम देखो।
हम यह पहले ही दिन लिखते पर एक ही दिन दो मूर्खतायें नहीं करना चाहिये। कम से कम अंतर्जाल पर जहां टिप्पणियों की सुविधा है। वैसे श्री त्रिवेदी जी से दोनों मसलों पर हमारी चर्चा हुई थी। उन्होंने हौंसला बढ़ाया तो अब सोच रहे हैं कि कुछ अन्य विषयों पर भी इस तरह लिखा जाये। बात गलत निकले तो हार मान लो। सच निकले तो वाह वाह तो्र होगी ही।
वैसे पहले दिन से हमने अनुमान लगाया था वह एक समय गलत होता दिख रहा था तब लगा कि अच्छा हुआ नहंी लिखा पर बाद में जब परिणाम सामने आया तो लगा कि एक मौका अपने हाथ से निकल गया। बहरहाल अब ऐसे सीधे प्रसारित नाटकों का अंत का अनुमान पहले लगाना आसान नहीं है क्योंकि इस पर भी सट्टा चलता है और इसमें अभिनय करने वाले पात्रों की डोर उनके हाथों में ही होती है।
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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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Saturday, March 27, 2010

नेपाल का हिन्दू राष्ट्र के रूप में न रहना-विशेष हिन्दी लेख (nepal, india and hindu nasoinlism-special hindi article)

नेपाल कभी हिन्दू राष्ट्र था जिसे अब धर्मनिरपेक्ष घोषित किया गया है। वहां की निवासिनी और भारतीय हिन्दी फिल्मों की अभिनेत्री मनीक्षा कोइराला ने अब जाकर इसकी आलोचना की है। उनका मानना है कि नेपाल को एक हिन्दू राष्ट्र ही होना चाहिए था। दरअसल नेपाल की यह स्थिति इसलिये बनी क्योंकि वह राजशाही का पतन हो गया। वहां के राजा को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता था या हम कहें कि उनको ऐसी प्रतिष्ठा दी जाती थी। दूसरी बात यह है कि नेपाल के हिन्दू राष्ट्र के पतन को एक व्यापक रूप में देखा जाना चाहिए न कि इसके केवल सैद्धान्तिक स्वरूप पर नारे लगाकर भ्रम फैलाना चाहिये। इसलिये यह जरूरी है कि हम हिन्दुत्व की मूल अवधारणाओं को समझें।
वैसे हिन्दुत्व कोई विचाराधारा नहीं है और न ही यह कोई नारा है। अगर हम थोड़ा विस्तार से देखें तो हिन्दुत्व दूसरे रूप में प्राकृतिक रूप से मनुष्य को जीने की शिक्षा देने वाला एक समग्र दर्शन है। अंग्रेजों और मुगलों ने इसी हिन्दुत्व को कुचलते हुए भारतवर्ष में राज्य किया किया। अनेक डकैत और खलासी यहां आकर राजा या बादशाह बन गये। अंग्रेजों ने तो अपनी ऐसी शिक्षा पद्धति का निर्माण किया जिससे कि यहां का आदमी उनके जाने के बाद भी उनकी गुलामी कर रहा है। देश के शिक्षित युवक युवतियां इस बात के लिये बेताब रहते हैं कि कब उनको अवसर मिले और अमेरिका या ब्रिटेन में जाकर वहां के निवासियों की गुलामी का अवसर मिले।
मुगलों और अंग्रेजों ने यहां के उच्च वर्ग में शासक बनने की ऐसी प्रवृत्ति जगा दी है कि वह गुलामी को ही शासन समझने लगे हैं। अक्सर समाचार पत्र पत्रिकाओं में ऐसी खबरे आती हैं कि अमुक भारतवंशी को नोबल मिला या अमुक को अमेरिका का यह पुरस्कार मिला। अमुक व्यक्ति अमेरिका की वैज्ञानिक संस्था में यह काम कर रहा है-ऐसी उपलब्धियों को यहां प्रचार कर यह साबित किया जाता है कि यहां एक तरह से नकारा और अज्ञानी लोग रहते हैं। सीधी भाषा में बात कहें तो कि अगर आप बाहर अपनी सिद्धि दिखायें तभी यहां आपको सिद्ध माना जायेगा। उससे भी बड़ी बात यह है कि आप अंग्रेजी में लिख या बोलकर विदेशियों को प्रभावित करें तभी आपकी योग्यता की प्रमाणिकता यहां स्वीकार की जायेगी। नतीजा यह है कि यहां का हर प्रतिभाशाली आदमी यह सोचकर विदेश का मुंह ताकता है कि वहां के प्रमाणपत्र के बिना अपने देश में नाम और नामा तो मिल ही नहीं सकता।
मुगलों ने यहां के लोगों की सोच को कुंद किया तो अंग्रेज अक्ल ही उठाकर ले गये। परिणाम यह हुआ कि समाज का मार्ग दर्शन करने का जिम्मा ढोने वाला बौद्धिक वर्ग विदेशी विचाराधाराओं के आधार पर यहां पहले अपना आधार बनाकर फिर समाज को समझाना चाहता है। कहने को विदेशी विचारधाराओं की भी ढेर सारी किताबें हैं पर मनुष्य को एकदम बेवकूफ मानकर लिखी गयी हैं। उनके रचयिताओं की नज़र में मनुष्य को सभ्य जीवन बिताने के लिये ऐसे ही सिखाने की जरूरत है जैसे पालतु कुत्ते या बिल्ली को मालिक सिखाता है। मनुष्य में मनुष्य होने के कारण कुछ गुण स्वाभाविक रूप से होते हैं और उसे अनेक बातें सिखाने की जरूरत नहीं है। जैसे कि अहिंसा, परोपकार, प्रेम तथा चिंतन करना मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्तियां हैं। कोई भी मनुष्य मुट्ठी भींचकर अधिक देर तक नहीं बैठ सकता। उसे वह खोलनी ही पड़ती हैं।
चार साल का बच्चा घर के बाहर खड़ा है। कोई पथिक उससे पीने के लिये पानी मांगता है। वह बिना किसी सोच के उसे अपने घर के अंदर से पानी लाकर देता है। उस बच्चे ने न तो को पवित्र पुस्तक पढ़ी है और न ही उसे किसी ने सिखाया है कि ‘प्यासे को पानी पिलाना चाहिये’ फिर भी वह करता है। कहने का अभिप्राय यह है कि मनुष्य अपनी सहज प्रवृत्तियों की वजह से सज्जन तो रहता ही है पर समाज का एक वर्ग उसकी जेब से पैसा निकालने या उससे सस्ता श्रम कराने के लिये उसे असहज बनाने का हर समय प्रयास करता है। विदेशी विचारधाराओं तथा बाजार से मनुष्य को काल्पनिक स्वप्न तथा सुख दिखकार उसे असहज बनाने का हमारे देश के लोगों ने ही किया है। इन्ही विचाराधाराओं में एक है साम्यवाद।
इसी साम्यवादी की प्रतिलिपि है समाजवाद। इनकी छत्रछाया में ही बुद्धिजीवियों के भी दो वर्ग बने हैं-जनवादी तथा प्रगतिशील। नेपाल को साम्यवादियों ने अपने लपेटे में लिया और उसका हिन्दुत्व का स्वरूप नष्ट कर दिया। सारी दुनियां को सुखी बनाने का ख्वाब दिखाने वाली साम्यवादी और समाजवादी विचारधाराओं में मूल में क्या है, इस पर अधिक लिखना बेकार है पर इनकी राह पर चले समाज सेवकों और बुद्धिजीवियों ने अपने अलावा किसी को खुश रखने का प्रयास नहीं किया। सारी दुनियां में एक जैसे लोग हो कैसे सकते हैं जब प्रकृत्ति ने उनको एक जैसा नहीं बनाया जबकि कथित विकासवादी बुद्धिजीवी ऐसे ही सपने बेचते हैं।
अब बात करें हम हिन्दुत्व की। हिन्दुत्व वादी समाज सेवक और बुद्धिजीवी भी बातें खूब करते हैं पर उनकी कार्य और विचार शैली जनवादियों और प्रगतिशीलों से उधार ली गयी लगती है। हिन्दुत्व को विचाराधारा बताते हुए वह भी उनकी तरह नारे गढ़ने लगते हैं। नेपाल में हिन्दुत्व के पतन के लिये साम्यवाद या जनवाद पर दोषारोपण करने के पहले इस बात भी विचार करना चाहिये कि वहां के हिन्दू समाज की बहुलता होते हुए भी ऐसा क्यों हुआ?
हिन्दुत्व एक प्राकृतिक विचाराधारा है। हिन्दू दर्शन समाज के हर वर्ग को अपनी जिम्मेदारी बताता है। सबसे अधिक जिम्मेदारी श्रेष्ठ वर्ग पर आती है। यह जिम्मेदारी उसे उठाना भी चाहिए क्योंकि समाज की सुरक्षा से ही उसकी सुरक्षा अधिक होती है। इसके लिये यह जरूरी है कि वह योग्य बुद्धिजीवियों को संरक्षण देने के साथ ही गरीब और मजदूर वर्ग का पालन करे। यही कारण है कि हमारे यहां दान को महत्व दिया गया है। श्रीमद्भागवत गीता में अकुशल श्रम को हेय समझना तामस बुद्धि का प्रमाण माना गया है।
मगर हुआ क्या? हिन्दू समाज के शिखर पुरुषों ने विदेशियों की संगत करते हुए मान लिया कि समाज कल्याण तो केवल राज्य का विषय है। यहीं से शुरु होती है हिन्दुत्व के पतन की कहानी जिसका नेपाल एक प्रतीक बना। आर्थिक शिखर पुरुषों ने अपना पूरा ध्यान धन संचय पर केंद्रित किया फिर अपनी सुरक्षा के लिये अपराधियों का भी महिमा मंडन किया। भारत के अनेक अपराधी नेपाल के रास्ते अपना काम चलाते रहे। वहां गैर हिन्दुओं ने मध्य एशिया के देशों के सहारे अपना शक्ति बढ़ा ली। फिर चीन उनका संरक्षक बना। यहां एक बात याद रखने लायक है कि अनेक अमेरिकी मानते हैं कि चीन के विकास में अपराध से कमाये पैसे का बड़ा योगदान है।
भारत के शिखर पुरुष अगर नेपाल पर ध्यान देते तो शायद ऐसा नहीं होता पर जिस तरह अपने देश में भी अपराधियों का महिमामंडन देखा जाता है उससे देखते हुए यह आशा करना ही बेकार है। सबसे बड़ी बात यह है कि नेपाल की आम जनता ने ही आखिर ऐसी बेरुखी क्यों दिखाई? तय बात है कि हिन्दुत्व की विचारधारा मानने वालों से उसको कोई आसरा नही मिला होगा। नेपाल और भारत के हिन्दुत्ववादी आर्थिक शिखर पुरुष दोनों ही देशों के समाजों को विचारधारा के अनुसार चलाते तो शायद ऐसा नहीं होता। हिन्दुत्व एक विचाराधारा नहीं है बल्कि एक दर्शन है। उसके अनुसार धनी, बुद्धिमान और शक्तिशाली वर्ग के लोगों को प्रत्यक्ष रूप से निम्न वर्ग का संरक्षण करना चाहिये। कुशल और अकुशल श्रम को समान दृष्टि से देखना चाहिये पर पाश्चात्य सभ्यता को ओढ़ चुका समाज यह नहीं समझता। यहां तो सभी अंग्रेजों जैसे साहब बनना चाहते हैं। जो गरीब या मजदूर तबका है उसे तो कीड़े मकौड़ों की तरह समझा जाता है। इस बात को भुला दिया गया है कि धर्म की रक्षा यही गरीब और मजदूर वर्ग अपने खून और पसीने से लड़कर समाज रक्षा करता है।
हमारे देश में कई ऐसे संगठन हैं जो हिन्दुत्व की विचारधारा अपनाते हुए अब गरीबों और मजदूरों के संरक्षण कर रहे हैं। उनको चाहिये कि वह अपने कार्य का विस्तार करें और भारत से बाहर भी अपनी भूमिका निभायें पर वह केवल नारे लगाने तक नहीं रहना चाहिये। इन हिन्दू संगठनों को परिणामों में शीघ्रता की आशा न करते हुए दूरदृष्टि से अपने कार्यक्रम बनाना चाहिये।
नेपाल का हिन्दू राष्ट्र न रहना इतनी बड़ी समस्या नहीं है जितनी परेशानी इस बात पर होने वाली है कि वह एक अप्राकृतिक विचाराधारा की तरफ बढ़ गया है जो वहां की संस्कृति और धर्म के वैसे ही नष्ट कर डालेगी जैसे कि चीन में किया है। भारत और नेपाल के आपस में जैसे घनिष्ट संबंध हैं उसे देखते हुए यहां के आर्थिक, सामाजिक तथा बौद्धिक शिखर पुरुषों को उस पर ध्यान देना चाहिये।
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Saturday, January 16, 2010

सब गडड्मडड् है-हिन्दी व्यंग्य (sab gaddmadd hai-hindi vyangya)

हैती में भूकंप, ज्योतिष, पूंजीवाद और समाजवाद जैसे विषयों में क्या साम्यता है। अगर चारों को किसी एक ही पाठ में लिखना चाहेंगे तो सब गड्डमड्ड हो जायेगा। इसका कारण यह है कि भूकंप का ज्योतिष से संबंध जुड़ सकता है तो पूंजीवाद और समाजवाद को भी एक साथ रखकर लिखा जा सकता है पर चार विषयों के दोनों समूहों को मिलाकर लिखना गलत लगेगा, मगर लिखने वाले लिख रहे हैं।
पता चला कि हैती में भूकंप की भविष्यवाणी सही निकली। भविष्यवक्ताओं को अफसोस है कि उनकी भविष्यवाणी सही निकली। पूंजीवादी देश हैती की मदद को दौड़ रहे हैं पर साम्यवादी बुद्धिजीवी इस हानि के लिये पूंजीवाद और साम्राज्यवाद को जिम्मेदार बता रहे हैं। दावा यहां तक किया गया है कि पहले आये एक भूकंप में साम्यवादी क्यूबा में 10 लोग मरे जबकि हैती यह संख्या 800 थी-उस समय तक शायद पूंजीवादी देशों की वक्र दृष्टि वहां नहीं पड़ी थी। अब इसलिये लोग अधिक मरे क्योंकि पूंजीवाद के प्रभाव से वहां की वनसंपदा केवल 2 प्रतिशत रह गयी है। अभिप्राय यह है कि पूंजीवादी देशों ने वहां की प्रकृति संपदा का दोहन किया जिससे वहां भूकंप ने इतनी विनाशलीला मचाई।
इधर ज्योतिष को लेकर भी लोग नाराज हैं। पता नहीं फलित ज्योतिष और ज्योतिष विज्ञान को लेकर भी बहस चल रही है। फलित ज्योतिष पीड़ित मानवता को दोहन करने के लिये है। ऐसे भी पढ़ने को मिला कि अंक ज्योतिष ने-इसे शायद कुछ लोग खगोल शास्त्र से भी जोड़ते है’ फिर भी प्रगति की है पर फलित ज्योतिष तो पुराने ढर्रे पर ही चल रहा है।
एक साथ दो पाठ पढ़े। चारों का विषय इसलिये जोड़ा क्योंकि हैती के भूकंप की भविष्यवाणी करने वाले की आलोचना उस साम्यवादी विचारक ने भी बिना नाम लिये की थी। यहां तक लिखा कि पहले भविष्यवाणी सही होने का दावा कर प्रचार करते हैं फिर निराशा की आत्मस्वीकृति से भी उनका लक्ष्य ही पूरा होता है। इधर फलित ज्योतिषियों पर प्रहार करता हुए पाठ भी पढ़ा। उसका भी अप्रत्यक्ष निशाना वही ज्योतिष ब्लाग ही था जिस पर पहले हैती के भूकंप की भविष्यवाणी सत्य होने का दावा फिर अपने दावे के सही होने को दुर्भाग्यपूणी बताते हुए प्रकाशित हुई थी। चार तत्व हो गये पर पांचवा तत्व जोड़ना भी जरूरी लगा जो कि प्रकृति की अपनी महिमा है।
मगर यह मजाक नहीं है। हैती में भूकंप आना प्राकृतिक प्रकोप का परिणाम है पर इतनी बड़ी जन धन हानि यकीनन मानवीय भूलों का नतीजा हो सकती है। हो सकता है कि साम्यवादी विचारक अपनी जगह सही हो कि पूंजीवाद ने ही हैती में इतना बड़ा विनाश कराया हो। ऐसी प्राकृतिक विपदाओं पर होने वाली हानि पर अक्सर प्रगतिशील और जनवादी बुद्धिजीवी अपने हिसाब से पूंजीवाद और साम्राज्यवादी को निशाना बनाते हैं। उनको अमेरिका और ब्रिटेन पर निशाना लगाना सहज लगता है। वह इससे आगे नहीं जाते क्योंकि प्रकृति को कुपित करने वालों में वह देश भी शामिल हैं जो ऐसे बुद्धिजीवियों को प्रिय हैं। हमारा तो सीधा आरोप है कि वनों की कटाई या दोहन तो उन देशों में भी हो रहा है जो साम्यवादी होने का दावा करते हैं और इसी कारण कथित वैश्विक तापवृद्धि से वह भी नहीं बचे।
अब विश्व में तापमान बढ़ने की बात कर लें। हाल ही मे पड़ी सर्दी ने कथित शोधकर्ताओं के होश उड़ा दिये हैं। पहले कह रहे थे कि प्रथ्वी गर्म हो रही है और अब कहते हैं कि ठंडी हो रही है। भारत के कुछ समझदार कहते हैं कि प्रकृति अपने ढंग से अपनी रक्षा भी करती है इसलिये गर्मी होते होते ही सर्दी होने लगी। दूसरी भी एक बात है कि भले ही सरकारी क्षेत्र में हरियाली कम हो रही है और कालोनियां बन रही हैं पर दूसरा सच यह भी है कि निजी क्षेत्र में पेड़ पौद्ये लगाने की भावना भी बलवती हो रही है। इसलिये हरित क्षेत्र का संकट कभी कभी कम होता लगता है हालांकि वह संतोषजनक नहीं है। गैसों का विसर्जन एक समस्या है पर लगता है कि प्रकृत्ति उनके लिये भी कुछ न कुछ कर रही है इसी कारण गर्मी होते होते सर्दी पड़ने लगी।
मुख्य मुद्दा यह है कि परमाणु बमों और उसके लिये होने वाले प्रयोगों पर कोई दृष्टिपात क्यों नहीं किया जाता? चीन, अमेरिका और सोवियत संघ ने बेहताश परमाणु विस्फोट किये हैं। इन परमाणु विस्फोटों से धरती को कितनी हानि पहुंची है उसका आंकलन कोई क्यों नही करता? हमारी स्मृति में आज तक गुजरात का वह विनाशकारी भूकंप मौजूद है जो चीन के परमाणु विस्फोट के कुछ दिन बाद आया था। इन देशों ने न केवल जमीन के अंदर परमाणु विस्फोट किये बल्कि पानी के अंदर भी किये-इनके विस्फोटों का सुनामी से कोई न कोई संबंध है ऐसा हमारा मानना है। यह हमारा आज का विचार नहीं बल्कि गुजरात भूकंप के बाद ऐसा लगने लगा है कि कहीं न कहीं परमाणु विस्फोटों का यह सिलसिला भी जिम्मेदारी है जो ऐसी कयामत लाता है। साम्यवादी विचारक हमेशा ही अमेरिका और ब्रिटेन पर बरस कर रह जाते है पर रूस के साथ चीन को भी अनदेखा करते हैं।
हमारा मानना है कि अगर यह चारों देश अपने परमाणु प्रयोग बंद कर सारे हथियार नष्ट कर दें तो शायद विश्व में प्रकृति शांत रह सकती है। विश्व में न तो पूंजीवाद चाहिये न समाजवाद बल्कि सहजवाद की आवश्यकता है। साम्राज्यवादी के कथित विरोधी देश इतने ही ईमानदार है तो क्यों पश्चिमी देशों की वीजा, पासपोर्ट और प्रतिबंधों की नीतियों पर चल रहे हैं। चीन क्यों अपने यहां यौन वेबसाईटों पर प्रतिबंध लगा रहा है जैसे कि अन्य देश लगाते हैं। वह अभी भी आदमी का मूंह बंद कर उसे पेट भरने के लिये बाध्य करने की नीति पर चल रहा है।
जहां तक ज्योतिष की बात है तो अपने देश का दर्शन कहता है कि जब प्रथ्वी पर बोझ बढ़ता है तो वह व्याकुल होकर भगवान के पास जाती है और इसी कारण यहां प्रलय आती है। वैसे पश्चिम अर्थशास्त्री माल्थस भी यही कहता था कि ‘जब आदमी अपनी जनंसख्या पर नियंत्रण नहीं करती तब प्रकृति यह काम स्वयं करती है।’ यह सब माने तो ऐसे भूकंप और सुनामियां तो आती रहेंगी यह एक निश्चिम भविष्यवाणी है। प्रसिद्ध व्यंगकार स्वर्गीय श्री शरद जोशी ने एक व्यंग्य में लिखा था कि ‘हम इसलिये जिंदा हैं क्योंकि किसी को हमें मारने की फुरसत नहीं है। मारने वालों के पास हमसे बड़े लक्ष्य पहले से ही मौजूद है।’
इसी तर्ज पर हम भी यह कह सकते हैं कि धरती बहुत बड़ी है और वह क्रमवार अपनी देह को स्वस्थ कर रही है और जहां हम हैं वहां का अभी नंबर अभी नहीं आया है। कभी तो आयेगा, भले ही उस समय हम उस समय यहां न हों।
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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